
Snakebite Compensation Scam: सर्पदंश से मौत के नाम पर शासन की आपदा सहायता राशि हड़पने वाले बहुचर्चित फर्जीवाड़े में अब पुलिसकर्मियों (नगरसैनिकों) की भी संलिप्तता सामने आई है। सिविल लाइन पुलिस ने सिम्स पुलिस चौकी में पदस्थ रहे दो पुलिसकर्मी रामकुमार पाटनवार (40) और रामेश्वर भास्कर (53) को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया है। जांच में खुलासा हुआ है कि दोनों का मुख्य काम पोस्टमार्टम के लिए सिम्स अस्पताल पहुंचने वाले हर शव की सूचना तत्काल गिरोह के मुख्य सदस्यों तक पहुंचाना था।
सूचना मिलते ही गिरोह के सदस्य अस्पताल पहुंचकर मृतक के परिजनों को लाखों रुपये के सरकारी मुआवजे का लालच देते थे और मौत की वजह चाहे जो भी हो (हार्ट अटैक, दुर्घटना या बीमारी), उसे सर्पदंश बताने के लिए राजी कर लेते थे। मिली जानकारी के अनुसार आरोपी पुलिसकर्मी सिम्स अस्पताल में जैसे ही कोई शव पोस्टमार्टम के लिए पहुंचता, आरोपी पुलिसकर्मी तुरंत गिरोह के सदस्य को खबर दे देते थे।
सूचना मिलते ही गिरोह का सदस्य अस्पताल पहुंचता और परिजनों को आपदा राहत कोष से मिलने वाली आर्थिक सहायता का लालच देकर सर्पदंश की झूठी कहानी गढ़ने के लिए मना लेता। परिजनों की सहमति मिलते ही डॉक्टर, वकील और राजस्व कर्मियों का सिंडिकेट सक्रिय हो जाता था। फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट, कूट रचित दस्तावेज और झूठे पंचनामे तैयार कर आपदा राहत की सरकारी राशि स्वीकृत कराई जाती थी। बाद में यह रकम गिरोह और परिजनों के बीच बांट दी जाती थी।
एएसपी पंकज पटेल के अनुसार, गिरफ्तार दोनों नगरसैनिकों की भूमिका सिर्फ सूचना देने तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे परिजनों को समझाने और गिरोह से उनका संपर्क कराने में भी सीधे शामिल थे। पुलिस का मानना है कि यदि समय पर शव की जानकारी नहीं मिलती तो गिरोह यह खेल नहीं खेल पाता। इसलिए सिम्स चौकी का यह सूचना तंत्र ही इस पूरे रैकेट की सबसे अहम कड़ी था।
इस मामले में पुलिस पहले ही डॉक्टर, अधिवक्ता, तहसील व एसडीएम कार्यालय के कर्मचारियों को गिरफ्तार कर चुकी है। अब पुलिस दोनों आरोपियों को रिमांड पर लेकर पूछताछ करेगी। इससे यह पता लगाया जाएगा कि सूचना देने के बदले उन्हें कितना कमीशन मिलता था और अस्पताल से लेकर राजस्व कार्यालयों तक इस सिंडिकेट में और कौन-कौन से बड़े चेहरे शामिल हैं।