
Ikka Movie Review: सनी देओल की फिल्म 'इक्का' अपने नाम की तरह बाजी पलटने का वादा करती है, लेकिन बड़े पर्दे पर वह असर छोड़ने में सफल नहीं हो पाती। कमजोर कहानी, बिखरी हुई पटकथा और साधारण कोर्टरूम ड्रामा फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरियां बनकर सामने आते हैं। दमदार कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद फिल्म दर्शकों को आखिर तक बांधे रखने में संघर्ष करती है।
फिल्म में अर्जुन मेहरा (सनी देओल) मुंबई का मशहूर वकील है, जिसे लोग 'इक्का' के नाम से जानते हैं। वह मुश्किल से मुश्किल केस को अपनी आखिरी चाल से पलट देने के लिए प्रसिद्ध है।
उसकी जिंदगी तब बदल जाती है जब 13 साल बेटी समायरा को एडवांस स्टेज कैंसर होने का पता चलता है। इसी बीच उद्योगपति और चुनावी उम्मीदवार हर्षवर्धन गौर के बेटे शौर्यमन गौर (अक्षय खन्ना) पर एक युवती की हत्या की कोशिश का आरोप लगता है।
पहले अर्जुन यह केस लेने से इनकार करता है, लेकिन बेटी के इलाज और बोन मैरो ट्रांसप्लांट की मजबूरी उसे अपना फैसला बदलने पर मजबूर कर देती है। अदालत में उसका मुकाबला वकील मदुरा बनर्जी (तिलोत्तमा शोम) से होता है और यहीं से कोर्टरूम ड्रामा शुरू होता है।
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी अधूरी पटकथा है। कई ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब कहानी में नहीं मिलते।
-शौर्यमन की बार काउंसिल सदस्यता क्यों रद्द हुई?
-अर्जुन और शौर्यमन की दुश्मनी की असली वजह क्या थी?
-हत्या की कोशिश वाले मामले की पूरी सच्चाई क्या है?
-पुलिस जांच और सबूत इतने कमजोर क्यों दिखाए गए?
इन सवालों का संतोषजनक जवाब न मिलने से कहानी का प्रभाव लगातार कमजोर पड़ता जाता है।
फिल्म का सबसे अहम हिस्सा अदालत की कार्यवाही है, लेकिन यही हिस्सा सबसे कमजोर नजर आता है। अदालत में पेश किए गए सबूत, गवाह और दोनों पक्षों की दलीलें दर्शकों में तनाव या रोमांच पैदा नहीं कर पातीं। कई दृश्य ऐसे लगते हैं जहां जांच प्रक्रिया और कानूनी पहलुओं को काफी सतही तरीके से दिखाया गया है।
फिल्म में बेटी की बीमारी, मां की पीड़ा और परिवार की मजबूरी जैसे कई भावनात्मक पहलू मौजूद हैं, लेकिन उन्हें प्रभावशाली तरीके से पेश नहीं किया गया। दर्शक किसी भी किरदार से गहराई से जुड़ नहीं पाते, जिससे कहानी का भावनात्मक असर काफी कम हो जाता है।
करीब 3 दशक बाद सनी देओल एक बार फिर वकील की भूमिका में नजर आते हैं। उनके अभिनय में ईमानदारी दिखती है, लेकिन कमजोर लेखन उनके किरदार को मजबूती नहीं दे पाता। अक्षय खन्ना अपने किरदार में प्रभाव छोड़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन उनका रोल भी पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता। दीया मिर्जा और तिलोत्तमा शोम अपने हिस्से का काम ठीक तरह से निभाती हैं, हालांकि उन्हें भी सीमित अवसर मिलते हैं।
'इक्का' एक ऐसी फिल्म है जिसमें दमदार कलाकार तो हैं, लेकिन उतनी ही मजबूत कहानी नहीं। फिल्म का क्लाइमैक्स बाजी पलटने की कोशिश जरूर करता है, लेकिन तब तक दर्शकों की दिलचस्पी काफी हद तक कम हो चुकी होती है। अगर पटकथा और कोर्टरूम ड्रामा पर ज्यादा मेहनत की जाती, तो यह फिल्म कहीं ज्यादा असरदार बन सकती थी। बता दें कि यह फिल्म 10 जुलाई को OTT प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई है।