O Romeo Movie Review: शाहिद कपूर और तृप्ति डिमरी की फिल्म ओ रोमियो आज रिलीज हो गई है। इस फिल्म को पत्रिका की तरफ से कितने स्टार्स मिले हैं, आइए जानते हैं।
O Romeo Movie Review: शाहिद कपूर की फिल्म थी तो सोचा था कि मजे से 3 घंटे बैठकर मस्त पॉपकॉर्न खाकर एन्जॉय किया जाएगा। शाहिद एक बार फिर अपने कबीर सिंह वाले अंदाज में नजर आएंगे तो सीटियों और तालियों से हॉल गूंज उठेगा लेकिन फिर फिल्म शुरू हुई और धीरे-धीरे सारे अरमान धरे के धरे ही रह गए। जब एक पकाऊ कहानी के साथ उबाऊ एक्शन और क्रिंज डायलॉग्स और कॉमेडी जोड़ दी जाती है तो बनकर तैयार होती है 'ओ रोमियो'।
आज सबसे पहले स्टारकास्ट से शुरुआत करते हैं। शाहिद कपूर और तृप्ति डिमरी की फिल्म 'ओ रोमियो' आज सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। फिल्म में 'लैला मजनू' के हीरो अविनाश तिवारी भी हैं। विक्रांत मैसी, तमन्ना भाटिया, नाना पाटेकर, अरुणा ईरानी, दिशा पटानी जैसे स्टार्स की मौजूदगी भी नजर आती है लेकिन फिल्म की नैया को खराब कहानी और कमजोर स्टोरीलाइन ने पूरी तरह से डुबो कर रख दिया।
फिल्म में नाम बड़े और दर्शन छोटे जैसी फीलिंग आती है। अपनी तरफ से किरदारों ने जो थोड़ी बहुत कोशिश की है उस पर भी बेकार कंटेंट पूरी तरह से पानी फेर देता है। चलिए बात करते हैं अब फिल्म की कहानी के बारे में।
तो फिल्म की कहानी शुरु होती है शाहिद कपूर के कबीर सिंह वाले अंदाज से, उस्तरा का किरदार एक सुपारी लेकर मारने वाला कुख्यात गैंगस्टर है, जो पैसे लेकर टपकाने का काम करता है। उस्तरा का वैसे तो काफी रॉब है, उसके चारों तरफ भाई-भाई कहकर उसके गुंडे घूमते-फिरते रहते हैं लेकिन उसकी डोर है खान साहब यानी नाना पाटेकर के हाथ में। खान साहब को वो कोई भी काम मना नहीं कर सकता है।
फिल्म में तृप्ति डिमरी की एंट्री होती है अफ्शा के रोल में, जहां वो कुछ लोगों को मरवाना चाहती है, इसलिए वो लगातार उस्तरा के पास यही आस लेकर आती रहती है। हालांकि जिन लोगों को अफ्शा मरवाना चाहती है उनके नाम सुनकर उस्तरा उसे वही से भगा देता है। अब आगे फिल्म में पता चलेगा कि वो लोग कौन हैं, उन्हें अफ्शा क्यों मरवाना चाहती है और क्या उनका कोई कनेक्शन उस्तरा से है या नहीं। इसके लिए आपको फिल्म ही देखनी होगी।
फिल्म में एक से बढ़कर एक मंझे हुए कलाकार हैं तो जाहिर सी बात है एक्टिंग के नाम पर तो फैंस को कुछ अच्छा ही देखने को मिलेगा। हालांकि शाहिद कपूर कभी कभी काफी ज्यादा क्रिंज भी लग सकते हैं। जिस तरह से उनके किरदार को दिखाया गया है, वो बिल्कुल भी रिलेटेबल नहीं लगता। एक्टिंग के डिपार्टमेंट में किरदारों ने ठीक-ठाक ही परफॉर्म किया है। यहां पर एक नाम मेंशन करना बहुत जरूरी है और वो है अविनाश तिवारी।
फिल्म लैला मजनू के बाद इन्होंने ओटीटी के कुछ प्रोजेक्ट्स जरूर किए लेकिन इस फिल्म से इन्हें एक बार फिर बड़ा ब्रेक मिला है। कुछ हद तक अविनाश ने अपने किरदार से एक इम्पेक्ट डालने की पूरी कोशिश की है और वो सफल होते हुए भी नजर आते हैं। बस काश फिल्म में उनके लिए करने के लिए कुछ ज्यादा होता तो वो इससे भी ज्यादा असर डाल पाते।
इस फिल्म को विशाल भारद्वाज ने डायरेक्ट किया है। शाहिद कपूर के साथ इससे पहले उनका कोलैब काफी हिट रहा है लेकिन इस फिल्म में सबसे बड़ी शिकायत उन्हीं से है। उनके निर्देशन से कम से कम ये तो उम्मीद नहीं होती कि आपको स्टोरीलाइन काफी फीकी लगेगी। लेकिन इस फिल्म में डायरेक्शन में काफी कमजोरी दिखी है।
बिना सिर पैर के डायलॉग्स, कॉमेडी, क्रिंज कंटेट को जबरदस्ती बीच में घुसाना, कसम से एक बार के लिए तो ऐसा ही लगता है कि जल्दी से थिएटर से फिल्म बीच में ही ऐसे छोड़कर निकल जाए।
फिल्म में गाने तो बहुत हैं लेकिन एक भी गाना ऐसा नहीं है जो जुबान पर चढ़ने लायक हो। हर गाना काफी खराब लगता है। जबरदस्ती का म्यूजिक हर जगह में बजता है। एक्शन और मारधाड़ वाले सीन्स के पीछे पुरानी फिल्मों के गाने बजते हैं जो हमने अब 'धुरंधर' और 'एनिमल' जैसी फिल्मों में देख लिया है। इसलिए म्यूजिक के डिपार्टमेंट में भी इस फिल्म से ज्यादा उम्मीदें लगाना या रखना बेकार ही है।
इस फिल्म को देखने के बाद बस इतना ही कहा जा सकता है कि इस फिल्म को अपने रिस्क पर ही देखें। अगर शाहिद कपूर के बहुत बड़े फैन हैं या एक्शन के फैन हैं को आपको ये फिल्म अच्छी भी लग सकती है लेकिन इसके अलावा फिल्म से कुछ भी एक्स्पेक्ट करके ना जाएं। अगर अपना वीकेंड खराब करना चाहते हैं तो ये फिल्म बिल्कुल देख सकते हैं।