
Imtiaz Ali Main Wapas Aaunga Sanjay Suri Kashmiri pandit: मशहूर फिल्म निर्माता इम्तियाज अली की हालिया फिल्म 'मैं वापस आऊंगा' इन दिनों दर्शकों के दिलों को झकझोर रही है। विभाजन की कहानी पर आधारित यह फिल्म विस्थापन, अधूरे प्रेम और वियोग की एक ऐसी दास्तां है, जो उस घर की याद दिलाती है जहां कभी वापस नहीं लौटा जा सकता। फिल्म में युवा अभिनेता वेदांग रैना के पिता 'जसमेर' का किरदार निभाने वाले अभिनेता संजय सूरी (Sanjay Suri) की भूमिका भले ही छोटी है, लेकिन वह लोगों के दिलों पर असर डाल रही है। ऐसे में उन्होंने खुद इस फिल्म को अपनी निजी जिंदगी से जुड़ा बताया है। साथ ही बताया कि जब उन्होंने इसकी कहानी सुनी थी तो वह रो गए थे।
एक इंटरव्यू में संजय सूरी ने खुलासा किया कि फिल्म 'मैं वापस आऊंगा' की कहानी उनके लिए सिर्फ एक स्क्रिप्ट नहीं, बल्कि उनके खुद के जीवन का सबसे कड़वा सच है। संजय सूरी से जब पूछा गया कि उन्होंने इस छोटे से रोल के लिए हां क्यों कहा, तो उन्होंने बताया, "यह कहानी और निर्देशक इम्तियाज अली दोनों का एक खूबसूरत मेल था। मेरे लिए हमेशा कहानी सबसे ऊपर होती है।
इस स्क्रिप्ट में एक ऐसी भावनात्मक ईमानदारी थी, जिसने मुझे अंदर तक छू लिया था। वहीं, इम्तियाज अली एक ऐसे निर्देशक हैं जो अपने किरदारों को जज करने के बजाय उनके लिए सहानुभूति रखते हैं। जब मुझे उनसे मिलने का बुलावा आया, तो मुझे लगा कि कुछ बहुत खास होने वाला है। उनके साथ काम करते हुए एक एक्टर खुद को सुरक्षित महसूस करता है।"
संजय सूरी के लिए फिल्म में दिखाया गया विस्थापन और अपनी जड़ों से अलग होने का दुख कोई काल्पनिक विचार नहीं है। 1990 के दौर में कश्मीर में फैले उग्रवाद के दौरान संजय सूरी ने महज 19 साल की उम्र में अपने पिता को खो दिया था, जिनकी आतंकियों ने उनके घर में ही हत्या कर दी थी। इसके बाद उन्हें अपना सबकुछ छोड़कर कश्मीर से पलायन करना पड़ा था।
अपने इसी दर्दनाक अतीत को याद करते हुए संजय ने कहा, "फिल्म का वह रेलवे स्टेशन वाला सीन, जहां जसमेर हर दिन अपने बिछड़े परिवार के इंतजार में स्टेशन लौटता है, उसने मुझे झकझोर कर रख दिया। विभाजन हो, बारामूला का कबाली हमला हो या फिर 1990 का कश्मीर... अनिश्चितता और अचानक बदल गई दुनिया का दर्द हमारे परिवारों ने पीढ़ियों से झेला है। जब मेरे पिता की हत्या हुई, तो मैंने सिर्फ एक पिता को नहीं खोया, बल्कि अपना घर, अपनी पहचान और अपनी जड़ें भी खो दीं। इसलिए जब भी फिल्म का कोई दृश्य इस दर्द को छूता था, तो मेरे लिए सिर्फ एक अभिनेता बने रहना नामुमकिन था; वे भावनाएं पहले से ही मेरे भीतर मौजूद थीं।"