
बूंदी. सरकारी स्कूलों में शैक्षणिक स्तर, योजनाओं के क्रियान्वयन, शिक्षकों की सक्रियता और प्रशासनिक मॉनिटरिंग की तस्वीर सामने आई है। राजस्थान स्कूल शिक्षा परिषद की ओर से अगस्त माह के लिए जारी जिला स्तरीय रैकिंग में शेखावाटी के जिलों का दबदबा बरकरार रहा, जबकि शिक्षा मंत्री के गृह जिले कोटा की स्थिति चिंताजनक रही। 41 जिलों की रैकिंग में कोटा 38वें पायदान पर रहा। बूंदी ने 64 अंक हासिल कर नौवीं रैंक प्राप्त की। रैकिंग में सीकर 78 अंक के साथ पहले स्थान पर रहा। झुंझुनूं 75 अंक के साथ दूसरे और हनुमानगढ़ 75 अंक के साथ तीसरे स्थान पर रहा। चूरू 67 अंक के साथ चौथे तथा पाली और डीडवाना-कुचामन 66-66 अंक के साथ क्रमश: पांचवें और छठे स्थान पर रहे।
दूसरी ओर ब्यावर 44 अंक के साथ सबसे निचले पायदान पर रहा। रैकिंग में 50 अंक से कम स्कोर वाले सात जिले हैं। इनमें जैसलमेर, प्रतापगढ़, टोंक, कोटा, सलंबुर, डीग और ब्यावर शामिल हैं। प्रदेश का औसत स्कोर भी महज 58.20 फीसदी रहा। खास बात यह है कि कोई भी जिला 80 अंक का आंकड़ा पार नहीं कर सका।
शिक्षा विभाग ने रैकिंग प्रणाली में बदलाव करते हुए अब छह प्रमुख मानकों को आधार बनाया है। इनमें विद्यार्थियों की नियमित उपस्थिति को सर्वाधिक 25 प्रतिशत वेटेज दिया गया है। इसके अलावा शाला संबलन निरीक्षण लक्ष्य को 20 प्रतिशत, योग्यता/दक्षता आधारित मूल्यांकन परिणाम को 20 प्रतिशत, शिक्षक ऐप पर शिक्षकों की सक्रियता को 15 प्रतिशत, स्कूलों के बुनियादी ढांचे व भौतिक सुविधाओं को 10 प्रतिशत और ब्लॉक स्तरीय समीक्षा बैठकों को 10 प्रतिशत वेटेज दिया गया है।
जारी रैकिंग में सात जिलों का स्कोर 50 से कम रहा, जबकि 31 जिले 50 से 67 अंक के बीच रहे। इससे स्पष्ट है कि बड़ी संख्या में जिले अभी उच्च प्रदर्शन वाली श्रेणी से काफी दूर हैं। खास तौर पर जब सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं, शैक्षणिक गुणवत्ता और विभिन्न योजनाओं पर लगातार संसाधन खर्च किए जा रहे हैं, तब जिलों के प्रदर्शन में इतना अंतर विभागीय मॉनिटरिंग और क्रियान्वयन की स्थिति पर सवाल खड़े करता है। शिक्षक संघ रेसटा के प्रदेश उपाध्यक्ष गजराज सिंह का कहना है कि विद्यार्थियों की नियमित उपस्थिति, सीखने का स्तर, प्रशासनिक निरीक्षण और बुनियादी सुविधाएं शिक्षा व्यवस्था के मूल स्तंभ हैं। शिक्षा विभाग को इन बिंदुओं पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।