
Rajasthan : नैनवां (बूंदी). राजनीति में सरपंच से विधायक बनना तरक्की की सीढ़ी माना जाता है, लेकिन नैनवां के पूर्व विधायक प्रभुलाल करसोल्या की कहानी उलट है। गांव की पंचायत से विधानसभा तक पहुंचे, दो बार विधायक बने, लेकिन सियासी हालात बदले तो फिर उसी गांव की चौखट पर लौट आए, जहां से राजनीतिक सफर शुरू किया था। विधानसभा की राह बंद हुई तो गांव की राजनीति में वापसी की और दोबारा सरपंच बन गए।
प्रभुलाल करसोल्या ने 1978 और 1981 में लगातार दो बार करवर ग्राम पंचायत के सरपंच का चुनाव जीता। वर्ष 1985 में भाजपा के टिकट पर राजस्थान विधानसभा चुनाव लड़ा और जीत दर्ज कर विधायक बन गए।
विधायक बनने के बाद प्रभुलाल करसोल्या के राजनीतिक सफर में उतार-चढ़ाव जारी रहे। वर्ष 1990 के विधानसभा चुनाव में भाजपा से टिकट नहीं मिलने के कारण वे चुनाव मैदान में नहीं उतरे। तीन साल बाद, वर्ष 1993 में पार्टी ने फिर से उन पर भरोसा जताया। इस बार किस्मत ने साथ नहीं दिया और 207 मतों के मामूली अंतर से हार का सामना करना पड़ा। वर्ष 1995 में उन्होंने पंचायती राज चुनाव में जिला परिषद सदस्य के लिए चुनाव लड़ा और जीतकर जिला परिषद पहुंचे। इसके बाद वर्ष 1998 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर फिर मैदान में उतरे। इस बार उन्होंने जीत दर्ज की और दूसरी बार विधायक बने।
प्रभुलाल करसोल्या के राजनीतिक कॅरियर में सबसे बड़ा बदलाव 2007 में हुए परिसीमन के बाद आया। परिसीमन में नैनवां विधानसभा क्षेत्र का अस्तित्व समाप्त हो गया। इस क्षेत्र की 19 ग्राम पंचायतों और नगरपालिका क्षेत्र को हिंडोली विधानसभा क्षेत्र में शामिल कर दिया गया, जबकि 14 ग्राम पंचायतें केशवरायपाटन विधानसभा क्षेत्र में चली गईं। ऐसे में उन्होंने राजनीति में सक्रिय बने रहने के लिए एक बार फिर गांव की ओर रुख किया। वर्ष 2010 के पंचायती राज चुनाव में प्रभूलाल करसोल्या ने करवर ग्राम पंचायत से सरपंच का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।
प्रभु लाल करसोल्या (91 वर्ष) का फरवरी 2024 में निधन हो गया था। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे।