वनराज टी-91 को अपने पुरखों का गढ़ रहा रामगढ-विषधारी वन्यजीव अभयारण्य रास आ गया।
बूंदी.
वनराज टी-91 को अपने पुरखों का गढ़ रहा रामगढ-विषधारी वन्यजीव अभयारण्य रास आ गया। 307 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले अभयारण्य में बाघ स्वछंद विचरण करता हुआ घूम रहा है। सूत्रों के अनुसार रामगढ़ अभयारण्य में एक दशक से बाघों को बसाने की संभावना तलाशी जा रही थी। वर्ष 2009 में राज्य के प्रधान वन संरक्षक अभिजीत घोष ने जिला वन मंडल अधिकारी से बाघ बसाने की संभावनाओं को लेकर रिपोर्ट भी मांगी थी।
रिपोर्ट में बाघों को बसाने के लिए कुछ कठिनाइयां दर्शाई गई थी। कठिनाइयों को दूर करने के बाद फरवरी 2011 में नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी ऑफ इण्डिया (एनटीसीए) ने रामगढ़ अभयारण्य को बाघ परियोजना में शामिल करने की सैद्धांतिक सहमति दे दी थी। रामगढ़-विषधारी के जंगल को 198 2 में वन्यजीव अभयारण्य का दर्जा दिया था।
दर्जा मिलने तक इस जंगल में 14 बाघों व 90 बघेरों की उपस्थिति थी। अभयारण्य में 198 5 से ही बाघों की संख्या में कमी आती गई। 1999 तक एक ही बाघ बचा था, जो भी लुप्त हो गया।
यहां पर घूम रहा
तलवास के आंतरी के जंगल में 27 नवम्बर को तालाब के पास बाघ के पगमार्क मिले थे। कुछ दिन बिताने के बाद दिसम्बर माह के पहले सप्ताह में रामगढ़ अभयारण्य के जंगल में पहुंचा। तब से ही वनराज अभयारण्य में ही विचरण कर रहा है। 14 दिसम्बर को बड़ोदिया के पास पगमार्क नजर आए। उसके दो दिन बाद फूलसागर के पास पगमार्क नजर आए। फिर वह खटकड़ के जंगल में पहुंच गया। दो दिन बाद ही 18 दिसम्बर को लुहारपुरा गांव की पहाड़ी पर पगमार्क मिले। गुरुवार रात आठ बजे नैनवां-बूंदी मार्ग पर मेज नदी पर स्थित धुंधलेश्वर की महादेव के पास के पहाड़ से उतरा और नैनवां-मार्ग की सडक़ पर कुछ देर खड़ा रहा। बाद में रामगढ अभयारण्य के अन्दर प्रवेश कर गया।वनराज अभयारण्य में ही विचरण कर रहा है। अभयारण्य में बाघ स्वछंद विचरण करता हुआ घूम रहा है।