
Diamond Price in India: धनतेरस, दिवाली और शादी-विवाह का सीजन नजदीक आते ही बाजार में ज्वेलरी की मांग बढ़ने लगी है। अब तक सोने और चांदी को खरीदारी के लिए सबसे पसंदीदा विकल्प माना जाता रहा है, लेकिन इस बार डायमंड ज्वेलरी भी ग्राहकों को आकर्षित कर रही है। खास बात यह है कि सोने-चांदी की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव के बीच हीरों के दाम कुछ समय से स्टेबल हैं। इससे ग्राहकों की दिलचस्पी बढ़ी है।
ज्वेलरी इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि इस साल नवंबर और दिसंबर में डायमंड ज्वेलरी की बिक्री में अच्छी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। युवाओं की बदलती पसंद भी इसकी बड़ी वजह हैं। जी बिजनेस की एक रिपोर्ट में किरण जेम्स के एमडी दिनेश लखानी के हवाले से बताया गया कि हीरों की कीमतें अब निचले स्तर पर पहुंच चुकी हैं और आगे इनमें तेजी आ सकती है। उन्हें नवंबर और दिसंबर में शादी के सीजन के कारण डायमंड जड़ित ज्वेलरी की बिक्री में अच्छी बढ़ोतरी की उम्मीद है।
डायमंड ज्वेलरी की बढ़ती मांग के पीछे ग्राहकों की बदलती पसंद अहम भूमिका निभा रही है। खासकर Gen Z यानी नई पीढ़ी के युवा अब पारंपरिक सोने के गहनों के साथ-साथ हीरे जड़ी ज्वेलरी भी पसंद कर रहे हैं। लखानी के अनुसार, रिटेल बाजार में डायमंड जड़ित ज्वेलरी की बिक्री करीब 30 फीसदी की दर से बढ़ रही है, जबकि केवल सोने की ज्वेलरी की बिक्री में करीब 20 फीसदी की वृद्धि है। दोनों के बीच 10 प्रतिशत का यह अंतर युवाओं की बढ़ती दिलचस्पी की वजह से भी है।
हीरे का कोई एक तय बाजार भाव नहीं होता। इसकी कीमत कई बातों पर निर्भर करती है। इसलिए एक ही कैरेट के दो हीरों की कीमत में भी काफी अंतर हो सकता है। लखानी के मुताबिक, हीरे की कीमत मुख्य रूप से चार बातों से तय होती है।
रंग: हीरों में D कलर को सबसे ऊंचा ग्रेड माना जाता है। रंग जितना बेहतर होगा, उसकी कीमत भी उसी हिसाब से तय होती है।
क्लैरिटी: हीरे में मौजूद दाग-धब्बों और कमियों के आधार पर उसकी क्लैरिटी तय होती है। FL यानी Flawless और IF यानी Internally Flawless को सबसे ऊंचे ग्रेड में गिना जाता है।
वजन: हीरे का वजन उसकी कीमत तय करने में अहम भूमिका निभाता है। आमतौर पर ज्यादा कैरेट वाले हीरे की कीमत अधिक होती है।
आकार: हीरे का आकार और कट भी उसकी कीमत को प्रभावित करते हैं।
हीरों के कारोबार में कीमत तय करने के लिए Rapaport Price List नाम की एक बेंचमार्क लिस्ट का इस्तेमाल किया जाता है। इसके आधार पर अलग-अलग हीरों पर छूट दी जाती है। D कलर और FL क्लैरिटी वाला एक कैरेट का उच्च गुणवत्ता वाला हीरा करीब 8 लाख से 10 लाख रुपये तक का हो सकता है। हालांकि, नेचुरल हीरे कम कीमत में भी उपलब्ध हैं। क्वालिटी के आधार पर एक छोटे सिंगल स्टोन वाले नेचुरल हीरे की कीमत 5,000 रुपये प्रति कैरेट तक हो सकती है।
हीरा खरीदते समय उसका कलर ग्रेड जरूर पता करें। D कलर को सबसे बेहतर ग्रेड माना जाता है। हीरे का रंग उसकी कीमत तय करने वाले प्रमुख फैक्टर्स में शामिल है। इसलिए खरीदारी से पहले ज्वेलर से इसकी पूरी जानकारी लें।
हीरे की क्वालिटी जांचने के लिए उसकी क्लैरिटी देखना जरूरी है। FL और IF को सबसे ऊंचे क्लैरिटी ग्रेड में रखा जाता है। ग्राहकों को बिना लैब सर्टिफिकेट के हीरा नहीं खरीदना चाहिए। सर्टिफिकेट से हीरे की गुणवत्ता और दूसरी जरूरी विशेषताओं की जानकारी मिलती है।
हीरे का वजन यानी कैरेट और उसका आकार भी कीमत पर असर डालता है। इसलिए दो हीरों की तुलना केवल उनकी कीमत देखकर नहीं करनी चाहिए। उनके कैरेट, क्लैरिटी, कलर और शेप की जानकारी भी लें। प्राकृतिक हीरे एक-दूसरे से अलग होते हैं। किसी भी दो हीरों की विशेषताएं बिल्कुल एक जैसी नहीं होतीं। ऐसे में उनकी कीमत में अंतर होना स्वाभाविक है।
हीरे की ज्वेलरी हमेशा किसी भरोसेमंद और स्थापित ज्वेलर से खरीदनी चाहिए। एक्सपर्ट के अनुसार, अच्छी और जानी-मानी कंपनी से खरीदारी करने के लिए अगर थोड़े ज्यादा पैसे भी खर्च करने पड़ें तो इसमें हिचकना नहीं चाहिए। खरीदारी के समय पक्का बिल जरूर लें। साथ ही यह भी जांचें कि ज्वेलरी प्रमाणित और हॉलमार्क वाली है या नहीं। हीरे के कलर, क्लैरिटी और गुणवत्ता की जानकारी लैब सर्टिफिकेट में होनी चाहिए।
डायमंड ज्वेलरी खरीदने से पहले यह जरूर पता करें कि जरूरत पड़ने पर उसे वापस बेचने पर कितनी रकम मिल सकती है। इसके लिए ज्वेलर की बायबैक पॉलिसी और उसकी शर्तें समझना जरूरी है।
सोने की ज्वेलरी की तरह ही डायमंड ज्वेलरी पर भी मेकिंग चार्ज देना पड़ता है। हालांकि, इसमें हीरे की कटिंग और पॉलिशिंग की लागत पहले से ही तैयार हीरे की कीमत में शामिल होती है। ज्वेलरी में इस्तेमाल होने वाले सोने और उसे गहने का रूप देने में लगने वाली कारीगरी के लिए अलग से मेकिंग चार्ज लिया जाता है। इंडस्ट्री में सामान्य डिजाइन वाली ज्वेलरी पर मेकिंग चार्ज करीब 2,000 से 5,000 रुपये प्रति ग्राम सोने के हिसाब से हो सकता है। वहीं, ज्यादा जटिल डिजाइन और बेहतर फिनिशिंग वाली ज्वेलरी पर यह खर्च बढ़ सकता है। ग्राहक मेकिंग चार्ज को लेकर ज्वेलर से बातचीत कर सकते हैं। त्योहार के दौरान कई ज्वेलर्स विशेष छूट भी देते हैं। इसलिए खरीदारी से पहले अलग-अलग ऑफर की तुलना करना फायदेमंद हो सकता है।
आम धारणा यह है कि हीरों की रीसेल वैल्यू बहुत कम होती है या उन्हें दोबारा बेचना मुश्किल होता है। लखानी इस धारणा से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि नेचुरल हीरों की ज्वेलरी पर भी बायबैक की सुविधा मिल सकती है। हालांकि, यह संबंधित ज्वेलर की पॉलिसी और बाजार में चल रही कीमत पर निर्भर करता है। उनके मुताबिक, ग्राहक को खरीदारी के समय ही बायबैक की शर्तें स्पष्ट कर लेनी चाहिए। इसके अलावा सेकेंडरी मार्केट में भी हीरे बेचे जा सकते हैं।