Electricity Bill: नई व्यवस्था में डिस्कॉम बिजली खरीद लागत में होने वाले इजाफे को ऑटोमेटिक रूप से ग्राहकों के मंथली इलेक्ट्रिसिटी बिल में जोड़ सकेंगी।
केंद्र की प्रस्तावित नई बिजली टैरिफ व्यवस्था के लागू होने के बाद आम लोगों के बिजली बिल बढ़ सकते हैं। सरकार ने राष्ट्रीय विद्युत नीति के मसौदे में बिजली दरों को एक 'इंडेक्स' से जोड़ने का प्रस्ताव दिया है। यानी अगर राज्य बिजली नियामक आयोग समय पर बिजली की दरें तय नहीं करते, तो बिजली के दाम अपने आप लागत के हिसाब से बढ़ जाएंगे। अभी तक बिजली की दरें राज्यों के नियामक आयोग तय करते हैं।
कई बार राजनीतिक कारणों से टैरिफ में समय पर संशोधन नहीं हो पाता। इससे बिजली वितरण कंपनियां (डिस्कॉम) घाटे में चली जाती हैं। साल 2032 तक 50 लाख करोड़ रुपये और साल 2047 तक 200 लाख करोड़ रुपये का निवेश पावर प्रोडक्शन, ट्रांसमिशन और डिस्ट्रिब्यूशन सेक्टर्स में किया जाएगा।
मसौदे में कहा गया है कि बिजली खरीद लागत में होने वाली बढ़ोतरी को वितरण कंपनियां (डिस्कॉम) ऑटोमेटिक रूप से उपभोक्ताओं के मासिक बिल में जोड़ सकेंगी। बिजली खरीद की लागत, ईंधन की कीमत, महंगाई और अन्य खर्च बढ़ने पर उसका असर सीधे लोगों के मासिक बिल में दिखेगा। यानी बिजली के दाम साल में एक बार नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर अपने-आप कई बार बढ़ सकते हैं।
मंत्रालय ने यह भी सुझाव दिया है कि डिस्कॉम बिजली खरीद लागत में उतार-चढ़ाव से निपटने के लिए विशेष फंड (स्टेबलाइजेशन फंड) बनाएं, लेकिन इससे भी अंततः बोझ उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा। बिजली आपूर्ति की औसत लागत 6.8 रुपए प्रति यूनिट है, जबकि राष्ट्रीय औसत टैरिफ लगभग 10 रुपए प्रति यूनिट है। घरेलू उपभोक्ताओं से औसतन 6.50 रुपए प्रति यूनिट वसूले जाते हैं। वहीं, उद्योगों और व्यावसायिक उपभोक्ताओं को 10 रुपए चुकाने पड़ते हैं। घरेलू कृषि उपभोक्ताओं को दी जाने वाली सब्सिडी का बोझ उद्योगों पर डाला जाता है। बिजली खपत का 45% हिस्सा घरेलू और कृषि उपभोक्ताओं का है।
केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय बिजली नीति के ड्राफ्ट में इंडेक्स-लिंक्ड टैरिफ का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत बिजली की दरें किसी तय इंडेक्स से जुड़ी होंगी। जैसे कोयला महंगा होने पर, बिजली उत्पादन की लागत बढ़ने पर या डिस्कॉम का खर्च बढ़ने से बिजली का रेट भी उसी हिसाब से बढ़ जाएगा। इससे रेट में हर महीने बदलाव हो सकता है।