
सोने में निवेश करने वालों के पास अब सिर्फ फिजिकल गोल्ड खरीदने का विकल्प नहीं है। बिना लॉकर की चिंता और बिना गहने बनवाए भी सोने में निवेश किया जा सकता है। इसके लिए Gold ETF और Gold Fund of Funds यानी Gold FoF दो लोकप्रिय विकल्प हैं। दोनों की परफॉर्मेंस काफी हद तक सोने की कीमतों से जुड़ी होती है। लेकिन दोनों में निवेश करने का तरीका अलग है। एक शेयर बाजार में खरीदा-बेचा जाता है, जबकि दूसरे में म्यूचुअल फंड की तरह निवेश किया जाता है। ऐसे में निवेश करने से पहले दोनों के बीच का फर्क समझना जरूरी है।
गोल्ड ईटीएफ यानी गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड एक पैसिव म्यूचुअल फंड स्कीम है, जो मुख्य रूप से 99.5 फीसदी शुद्धता वाले फिजिकल गोल्ड में निवेश करती है। इसे सेबी रेगुलेट करता है और इसके यूनिट एनएसई और बीएसई जैसे स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट होते हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि गोल्ड ईटीएफ की कीमत बाजार में सोने की कीमतों के हिसाब से दिनभर बदलती रहती है। यानी बाजार खुलने के दौरान निवेशक इसे शेयर की तरह खरीद या बेच सकता है। हालांकि, गोल्ड ईटीएफ में निवेश के लिए आपके पास एक्टिव डिमैट और ट्रेडिंग अकाउंट होना जरूरी है। इसके अलावा ब्रोकरेज और एक्सचेंज से जुड़े कुछ शुल्क भी लग सकते हैं।
गोल्ड फंड ऑफ फंड्स यानी Gold FoF एक म्यूचुअल फंड स्कीम है। यह सीधे फिजिकल गोल्ड खरीदने के बजाय गोल्ड ईटीएफ में निवेश करती है। इसका मतलब है कि निवेशक खुद स्टॉक एक्सचेंज पर गोल्ड ईटीएफ नहीं खरीदता। वह म्यूचुअल फंड के जरिए गोल्ड में निवेश करता है। यही वजह है कि इसमें आमतौर पर डिमैट अकाउंट की जरूरत नहीं होती।
गोल्ड एफओएफ की यूनिट की खरीद और बिक्री उस दिन के अंत में तय होने वाले NAV यानी नेट एसेट वैल्यू के आधार पर होती है। इस कारण यह उन निवेशकों के लिए सुविधाजनक हो सकता है, जो नियमित अंतराल पर थोड़ी-थोड़ी रकम निवेश करना चाहते हैं।
नियमित रूप से छोटी रकम निवेश करने वालों के लिए गोल्ड एफओएफ ज्यादा सुविधाजनक हो सकता है। इसमें म्यूचुअल फंड की तरह एसआईपी शुरू की जा सकती है। मान लीजिए कोई निवेशक हर महीने 1,000 रुपये या 2,000 रुपये सोने में लगाना चाहता है, तो गोल्ड एफओएफ के जरिए वह तय तारीख पर नियमित निवेश कर सकता है। इसके लिए हर बार शेयर बाजार में जाकर ईटीएफ खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती। वहीं, गोल्ड ईटीएफ में निवेश करने के लिए आपको खुद बाजार में यूनिट खरीदनी होती है।
अगर कोई निवेशक सोने की कीमत में दिनभर होने वाले उतार-चढ़ाव का फायदा उठाना चाहता है, तो गोल्ड ईटीएफ में ज्यादा लचीलापन मिलता है। यह शेयर की तरह एक्सचेंज पर ट्रेड होता है। बाजार खुला रहने के दौरान इसकी कीमत बदलती रहती है और निवेशक उसी समय खरीद या बिक्री का फैसला कर सकता है। गोल्ड एफओएफ में ऐसा नहीं होता। यहां निवेश और रिडेम्पशन लागू एनएवी के आधार पर होता है।
यहीं पर दोनों विकल्पों के बीच बड़ा फर्क सामने आता है। गोल्ड ईटीएफ का एक्सपेंश रेश्यो आमतौर पर गोल्ड एफओएफ की तुलना में कम होता है। गोल्ड एफओएफ खुद एक ऐसे ईटीएफ में निवेश करता है, जिस पर पहले से लागत जुड़ी होती है। इसके ऊपर एफओएफ का अपना एक्सपेंश रेश्यो भी होता है। यानी गोल्ड एफओएफ में खर्च की दो लेयर्स हो सकती हैं। पहली उस गोल्ड ईटीएफ से जुड़ी लागत जिसमें एफओएफ निवेश करता है और दूसरी एफओएफ के संचालन से जुड़ी लागत। इसलिए केवल यह देखना काफी नहीं है कि किसी फंड का एक्सपेंश रेश्यो कितना है। निवेशक को यह भी देखना चाहिए कि कुल लागत कितनी पड़ रही है।
इसका जवाब हर निवेशक के लिए एक जैसा नहीं होगा। अगर आपके पास डिमैट और ट्रेडिंग अकाउंट है और आप बाजार में ट्रेडिंग के समय गोल्ड ईटीएफ को खरीदना-बेचना चाहते हैं, तो ETF का फ्रेमवर्क आपके लिए सुविधाजनक हो सकता है।
दूसरी तरफ, अगर आप बिना डिमैट अकाउंट के म्यूचुअल फंड के जरिए सोने में निवेश करना चाहते हैं और एसआईपी के जरिए नियमित रूप से रकम लगाना चाहते हैं, तो गोल्ड एफओएफ का तरीका आसान पड़ सकता है। लंबे समय के निवेश में लागत भी महत्वपूर्ण है। गोल्ड एफओएफ में दो स्तर पर खर्च होने की वजह से कुल लागत ईटीएफ से ज्यादा हो सकती है।
(यह आर्टिकल सिर्फ जानकारी मात्र है। यह निवेश की सलाह नहीं है। कहीं भी पैसा लगाने से पहले अपने निवेश सलाहकार से परामर्श लें।)