Indian Stock Market: वेलम कैपिटल रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय बाजार इस समय कैपिटुलेशन जोन में है। यह ऐसा जोन है जो बताता है कि मार्केट में लगातार भारी गिरावट के बाद कब तेजी आएगी।
Indian Stock Market Capitulation Zone: अमरीका-ईरान संघर्ष के साथ-साथ व्यापारिक बाधाओं के कारण भारतीय शेयर बाजार में भारी बिकवाली दर्ज की गई है। विदेशी निवेशकों ने अप्रैल 2026 में अब तक 48,213 करोड़ की निकासी की। मार्च में यह रकम 1.17 लाख करोड़ रुपए थी। कुल मिलाकर वर्ष 2026 में अब तक 1.80 लाख करोड़ रुपये विदेशी निवेशकों ने निकाल लिए। विदेशी निवेशकों द्वारा लगातार जारी बिकवाली से पिछले कुछ हफ्तों से भारतीय शेयर बाजार किसी रोलरकोस्टर राइड जैसा रहा है। कई शेयर बुरी तरह टूट चुके है। निवेशकों में घबराहट है। लेकिन इसी बीच वेलम कैपिटल की रिपोर्ट एक अलग कहानी बयां कर रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, यह गिरावट शानदार रिकवरी का संकेत है, जो पिछले हफ्ते बाजार की चाल में भी दिखा, जब सेंसेक्स निफ्टी में 5 साल की सबसे बड़ी 6.5 फीसदी की साप्ताहिक तेजी आई। विशेषज्ञों के मुताबिक, युद्ध भले खत्म नहीं हुआ हो, लेकिन निवेशक यह दांव लगा रहे है कि सबसे बुरा दौर गुजर चुका है। इस उम्मीद से शेयर बाजार में आने वाले दिनों में तेजी जारी रह सकती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, जब 70 फीसदी से अधिक शेयर अपने 200-दिवसीय मूविंग एवरेज (200-DMA) से नीचे गिर जाते हैं, तो यह बाजार में अत्यधिक गिरावट का संकेत होता है। अभी यह आंकड़ा 71.3 फीसदी पर है, जिसका मतलब है कि बाजार अभी 'कैपिटुलेशन जोन' में है। बाजार की भाषा में 'कैपिटुलेशन' उस स्थिति को कहते हैं जब निवेशक डर के मारे अपनी होल्डिंग सरेंडर कर देते हैं और फंडामेंटल्स को भूल जाते हैं।
| सेक्टर | टॉप 25% शेयर | बॉटम 25% शेयर | औसत रिटर्न |
|---|---|---|---|
| इलेक्ट्रॉनिक्स | 51% | -37% | 17% |
| बैंक | 35% | -19% | 8% |
| ऑटोमोबाइल | 29% | -15% | 6% |
| केमिकल्स | 1% | -32% | -19% |
| कैपिटल गुड्स | 15% | -28% | -12% |
| आईटी | -10% | -39% | -24% |
| हेल्थकेयर | 14% | -23% | -8% |
| एफएमसीजी | 7% | -30% | -16% |
| आयरन-स्टील | 24% | -25% | -3% |
| फार्मा | 18% | -24% | -4% |
पुराने आंकड़ों से पता चलता है कि इस स्तर पर खरीदारी के लिए सबसे बेहतरीन मौका होता है। इस स्तर से अगले एक साल का औसत रिटर्न लगभग 17.5 फीसदी रहा है। बाजार अक्सर दो साल तक 'टाइम-करेक्शन' में रहता है ताकि तीसरे साल में बड़ा रिवॉर्ड दे सके। भारतीय बाजार अब तुलनात्मक रूप से सस्ते हैं। जिससे सही कीमत पर अच्छी कंपनियां चुनने का मौका है।
हर हफ्ते ब्रोकरेज और रिसर्च कंपनियां निवेशकों को सलाह देती हैं। जैसे- केमिकल्स खरीदें, हेल्थकेयर पर ओलरवेट, आइटी पर अंडरवेट आदि। ये सलाह आंकड़ों, मैक्रो ट्रेंड और नीतियों के तर्क के साथ पेश की जाती हैं, इसलिए भरोसेमंद लगती हैं। लेकिन हकीकत इससे अलग है।
समस्या यह है कि सेक्टर कॉल पूरी तस्वीर को एक दिशा में दिखाती है-खरीदें या बेचें। 42 सेक्टरों, सैकड़ों कंपनियों के विश्लेषण में पाया गया कि एक ही सेक्टर में सबसे अच्छे और सबसे खराब शेयर के बीच रिटर्न का औसतन अंतर 33% है। यानी सेक्टर सही होने के बावजूद, गलत शेयर चुनने पर नुकसान।
| सेक्टर | 52 हफ्ते हाई(%) | 52 हफ्ते लो (%) |
|---|---|---|
| हेल्थकेयर | 14% | 46% |
| पावर | 15% | 58% |
| ऑयल-गैस | 11% | 37% |
| मेटल्स | 23% | 8% |
| केमिकल्स | 1% | 68% |
आमतौर पर कच्चे तेल की कीमतों में आए झटकों को स्थिर होने में करीब 30 हफ्ते लगते हैं। लेकिन इस बार यह चमत्कार केवल 9 हफ्तों में हो गया। रिपोर्ट कहती है कि ऊर्जा की कीमतों में इतनी तेजी से सुधार होना पूरे बाजार की स्थिरता के लिए एक बहुत बड़ा और पॉजिटिव सिग्नल है।