47 साल की उम्र में विजय अग्रवाल ने ठाना कि वो अपनी क्रेन खुद अपने हाथों से बनाएंगे। पत्नी मोना अग्रवाल ने पति के सपनों के साथ चलने का फैसला किया।
47 साल की उम्र में एक शख्स, जिसके दो बच्चे स्कूल में पढ़ते हैं, बूढ़े मां-बाप हैं और सेविंग्स भी कुछ खास नहीं। एक दिन फैसला करता है कि वो नौकरी छोड़कर अपना काम करेगा। ये एक ऐसा फैसला था, जो परिस्थितियों के नजरिये से कहीं से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन इस शख्स ने ठान लिया था कि वो अपने सपनों को हकीकत की जमीन पर खड़ा करेगा और उसने ऐसा करके दिखाया। ये शख्स कोई और नहीं, बल्कि क्रेन कंपनी ACE के मालिक विजय अग्रवाल हैं। जिन्हें भारत का क्रेन किंग कहा जाता है। 47 साल की उम्र में जब लोग स्टेबिलिटी, रेस्ट और रिटायरमेंट के बारे में सोचना शुरू कर देते हैं, उन्होंने कुछ करने की ठानी, और भारत की सबसे बड़ी क्रेन कंपनी एक्शन कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट (ACE) की नींव रखी।
1995 तक, विजय अग्रवाल एस्कॉर्ट्स में एक दशक से अधिक समय तक काम कर चुके थे और अपने काम से बुरी तरह उकता चुके थे। 30,000 रुपये महीना कमाने वाले विजय खुद कहते हैं कि उन्हें कंपनी के अंदर “दबाव” या “घुटन” महसूस हो रही थी। एस्कॉर्ट्स काफी समय से कहीं आगे नहीं बढ़ पाई थी कुछ नया नहीं कर रही थी और उसके कर्मचारी हर रोज बस एक ही काम करते थे। अग्रवाल जल्द से जल्द इस घुटन से आज़ाद होकर कुछ अलग करना चाहते थे, कुछ ऐसा जो उनकी सोच से मेल खाता हो।
वो दिन भी आया, अग्रवाल ने जॉब छोड़ दी। 47 साल की उम्र में उन्होंने ठाना कि वो अपनी क्रेन खुद अपने हाथों से बनाएंगे। पत्नी मोना अग्रवाल ने पति के सपनों के साथ चलने का फैसला किया। उन्होंने भरोसा दिया कि ‘छह महीने तक मैं पैसे नहीं मांगूंगी और परिवार का ख्याल रखूंगी।
विजय अक्सर ये कहते थे 'मैं सड़क के बीच में भी क्रेन बना सकता हूं।’ ये बात सच साबित हुई। 15 लाख रुपये की अपनी बचत के साथ उन्होंने काम शुरू कर दिया। अपनी छोटी सी इंजीनियरों की टीम बनाई। दिल्ली के बाहरी इलाके में एक छोटी सी खाली पड़ी पथरीली जमीन पर, खुले आसमान के नीचे उन्होंने क्रेन को बनाने शुरुआत की। पहली क्रेन बनाने में उन्हें कुछ महीने लगे। 600 बड़े-छोटे पुर्जों को परफेक्ट तालमेल में जोड़ना पड़ा, लेकिन वे कभी नहीं डगमगाए, क्योंकि उन्हें क्रेन बनाने की कला आती थी।
पहली क्रेन मार्च 1996 में निकली, नाम रखा एक्शन कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट (ACE)। हालांकि बिजनेस की शुरुआत धीमी रही, सिर्फ 25 क्रेनें हीं बिकीं। विजय बताते हैं ‘मैं 100 किलो का सामान खुद उठाता था, पत्नी बोरी में लपेटने में मदद करती थीं। वो कहते हैं कि भरोसा कारोबार का आधार है और उनके लिए पवित्र है। विजय ने इस बात पर पूरा जोर दिया कि सभी पुर्जे स्टैंडर्ड हों और हार्डवेयर स्टोर में आसानी से मिल जाएं। ACE की क्रेनें बेहतर थीं और कीमत कम थी, जिससे उनकी पुरानी कंपनी नाराज हो गई। क्योंकि मार्केट में उनका कंपटीटर आ गया था। कंपनी बंद करने की हर कोशिश की गई, प्रोडक्ट इंफ्रिंजमेंट के लिए मुकदमे किए गए। कई साल तक मुकदमे चले, लेकिन अंत में जीत ACE की हुई।
विजय बताते हैं कि क्रेन बनाना असेंबली ऑपरेशन है। कोई कंपनी पुर्जे खुद नहीं बनाती, बाहर से खरीदती है, क्रेन बनाती, टेस्ट करती और बेचती है।’ विजय की बाजार में अच्छी साख थी और स्टेकहोल्डर्स उनकी क्षमता से अच्छी तरह वाकिफ थे। उन्होंने उन पर पूरा भरोसा जताया। शुरू में वेंडरों ने क्रेडिट पर पुर्जे सप्लाई किए।
तीस साल बाद आज ACE मार्केट लीडर है, 77 साल के विजय अग्रवाल उसी विश्वास के साथ कहते हैं कि मैं अपने हाथों से क्रेन बना सकता हूं और समझाते हैं, जब आप खुद हाथ से काम करते हैं, दिन-रात मेहनत करते हैं, तो एक कौशल विकसित हो जाता है। ACE अब 10,000 करोड़ रुपये की कंपनी है।