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Explainer: ईरान युद्ध के 100 दिन पूरे और फिर शुरू हुए मिसाइल हमले, इस बार तेल, LPG और बढ़ती महंगाई से कैसे निपटेगा भारत?

Middle East Crisis: ईरान और इजरायल के बीच फिर बढ़ते सैन्य तनाव ने भारत के लिए नई आर्थिक चिंताएं खड़ी कर दी हैं। कच्चे तेल की कीमतों, महंगाई, सरकारी सब्सिडी और आर्थिक विकास पर दबाव बढ़ सकता है।
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Updated: 8 Jun 2026, 5:49 PM IST
Iran Israel War
Iran Israel War फिर से शुरू हो गई है। (PC: AI)

Iran Israel War: बीते कुछ हफ्तों से ऐसा लग रहा था कि कुछ समय बाद होर्मुज में हालात सामान्य हो जाएंगे। अमेरिका और ईरान में शांति वार्ता को लेकर बातचीत आगे बढ़ रही थी। लेकिन अब सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया है। ईरान युद्ध शुरू हुए आज 100 दिन पूरे हो चुके हैं। हालात सामान्य होने के स्थान पर स्थिति यह है कि ईरान और इजराइल के बीच मिसाइल हमले फिर से शुरू हो गए हैं। ऐसा लग रहा है कि फिर से पूरी तरह युद्ध की स्थिति आ सकती है। अगर ऐसा होता है, तो मिडिल ईस्ट से हजारों किलोमीटर दूर स्थित भारत पर भी बड़ा असर पड़ेगा। अब तक तो भारत ने इस युद्ध के असर को काफी हद तक पचा लिया था। कोई बड़ी दिक्कत अभी तक हमें नहीं आई, लेकिन युद्ध फिर से खतरनाक तरीके से होने लगा, तो मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

फिर से आसमान पर जा सकते हैं तेल के भाव

युद्ध कुछ और महीने चला तो कच्चे तेल की कीमतें फिर से आसमान पर होंगी। वहीं, भारत का रणनीतिक तेल भंडार भी घट सकता है। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता तेल है। देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। युद्ध का असर सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहेगा। परिवहन महंगा होगा, उद्योगों की लागत बढ़ेगी और रोजमर्रा की कई चीजों के दाम ऊपर जा सकते हैं।

पिछले 6 महीने में क्रूड ऑयल के भाव

PC: Trading Economics

महंगाई बढ़ने का खतरा

महंगाई का खतरा अब धीरे-धीरे सिर उठाने लगा है। लंबे समय तक राहत देने के बाद उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के फिर से 4 फीसदी के स्तर के आसपास पहुंचने की आशंका जताई जा रही है। सब्जियों के बढ़ते दाम, ईंधन की लागत और सप्लाई चेन पर दबाव मिलकर महंगाई को नई हवा दे सकते हैं। यही वजह है कि भारतीय रिजर्व बैंक भी अब ज्यादा सतर्क नजर आ रहा है।

हाल ही में RBI ने रेपो रेट को 5.25 फीसदी पर बरकरार रखा, लेकिन साथ ही आर्थिक विकास के अनुमान को भी नीचे किया। इससे साफ संकेत मिलता है कि केंद्रीय बैंक को आगे का रास्ता आसान नहीं दिख रहा। एक तरफ विकास दर को सहारा देना है, दूसरी तरफ महंगाई को भी काबू में रखना है।

पिछले 6 महीने में काफी गिर गया रुपया

PC: Trading Economics

घट सकती है खपत

चिंता की बात सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, लोगों का मूड भी बदल रहा है। RBI के शहरी उपभोक्ता सर्वे में यह साफ दिखाई दिया कि लोगों का भरोसा पहले के मुकाबले कमजोर हुआ है। मार्च से मई के बीच कंज्यूमर कॉन्फिडेंस इंडेक्स 95.7 से गिरकर 90.7 पर आ गई है। रोजगार, आय और आर्थिक स्थिति को लेकर लोगों की सोच पहले जितनी सकारात्मक नहीं रही। कई परिवार अब गैर-जरूरी खर्चों में कटौती करने लगे हैं। कहावत है कि जब जेब ढीली होने लगे तो हाथ अपने आप रुक जाते हैं और यही संकेत अब बाजार में भी दिखाई देने लगा है।

यदि उपभोक्ता खर्च घटता है, तो कंपनियों की बिक्री प्रभावित होती है। जब बिक्री धीमी पड़ती है, तो कंपनियां नए निवेश को टालने लगती हैं। यही वजह है कि विशेषज्ञों ने पूंजीगत निवेश के अनुमान भी घटाए हैं। उद्योग जगत फिलहाल इंतजार और निगरानी की रणनीति अपनाता दिख रहा है।

सरकारी खजाने पर पड़ेगा अतिरिक्त बोझ

सरकार के सामने भी चुनौतियां कम नहीं हैं। खाद सब्सिडी और रसोई गैस पर खर्च बढ़ने का खतरा मंडरा रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों के कच्चे माल की कीमतें बढ़ रही हैं। साथ ही रुपये पर दबाव बढ़ने से आयात और महंगा हो सकता है। ऐसे में सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ना लगभग तय माना जा रहा है। हालांकि, राहत की बात यह है कि सरकार ने अभी से तैयारी शुरू कर दी है। जरूरी कच्चे माल, पेट्रोकेमिकल्स और अन्य आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता पर नजर रखी जा रही है। तेल कंपनियों को भी कीमतों के दबाव से निपटने में मदद दी जा रही है। सरकार फिलहाल चरणबद्ध तरीके से कदम उठाने की रणनीति पर काम कर रही है, ताकि अचानक किसी बड़े झटके से बचा जा सके।

आने वाले कुछ महीने अहम

अर्थव्यवस्था की बुनियाद अभी भी कमजोर नहीं हुई है। घरेलू खपत, सरकारी पूंजीगत खर्च और इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश भारत की ताकत बने हुए हैं। लेकिन अगर मिडिल ईस्ट का संकट लंबा खिंचता है, तो इन मजबूत स्तंभों की भी परीक्षा होगी। फिलहाल स्थिति नियंत्रण में दिखाई देती है, लेकिन खतरे की घंटी बज चुकी है। तेल, महंगाई, सब्सिडी और निवेश, सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। आने वाले कुछ महीने तय करेंगे कि भारत इस वैश्विक संकट को आसानी से झेल लेता है या फिर अर्थव्यवस्था को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।

Updated on:
8 Jun 2026, 5:49 PM IST
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