Iran Israel War Latest News: भारत अपनी यूरिया और फॉस्फेटिक उर्वरकों की जरूरत का 40% से अधिक मिडिल ईस्ट से खरीदता है। युद्ध के चलते इन उत्पादों की सप्लाई चेन को खतरा है।
पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष और समुद्री मार्गों में रुकावट की आशंका का असर अब वैश्विक व्यापार पर दिखाई देने लगा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि हालात लंबे समय तक ऐसे ही बने रहे, तो भारत में खरीफ फसलों की बुवाई पर उर्वरकों की कमी का खतरा मंडरा सकता है। साथ ही हीरे, औद्योगिक कच्चे माल, धातुओं और निर्माण सामग्री की आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है। दरअसल, भारत अपनी उर्वरक जरूरतों का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया के देशों से आयात करता है। इस क्षेत्र में समुद्री व्यापार का सबसे अहम मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य है।
वर्ष 2025 में भारत ने पश्चिम एशिया से करीब 98.7 अरब डॉलर का सामान आयात किया। यह क्षेत्र ऊर्जा, उर्वरक और कई औद्योगिक कच्चे माल का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। भारत अपनी यूरिया और फॉस्फेटिक उर्वरकों की जरूरत का 40% से अधिक इसी क्षेत्र से खरीदता है। पश्चिम एशिया से भारत को हीरे, जिप्सम और लाइमस्टोन जैसे कच्चे माल की भी बड़ी सप्लाई होती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक यदि होर्मुज के रास्ते जहाजों की आवाजाही बाधित होती है, तो इसका असर केवल तेल और गैस तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उर्वरक और अन्य औद्योगिक उत्पादों की सप्लाई चेन भी प्रभावित होगी। पश्चिम एशिया के कुछ देशों में उर्वरक संयंत्रों के संचालन पर भी असर पड़ा है।
पश्चिम एशिया से भारत को बड़ी मात्रा में कच्चे हीरे भी मिलते हैं। वर्ष 2025 में भारत ने इस क्षेत्र से करीब 6.8 अरब डॉलर के रफ डायमंड आयात किए, जो कुल आयात का लगभग 40 प्रतिशत है। यदि इन आपूर्तियों में व्यवधान आता है, तो देश के हीरा कटिंग और ज्वैलरी उद्योग पर असर पड़ सकता है।
यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो भारत में नाइट्रोजन, फॉस्फेट और सल्फर जैसे पोषक तत्वों की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
पश्चिम एशिया से भारत जिप्सम और लाइमस्टोन जैसे निर्माण से जुड़े कच्चे माल भी आयात करता है। अनुमान है कि इस क्षेत्र से भारत को करीब 129 मिलियन डॉलर का जिप्सम और 483 मिलियन डॉलर का लाइमस्टोन मिलता है। इसके अलावा बिजली ट्रांसमिशन और इलेक्ट्रिकल उपकरणों में उपयोग होने वाली धातुओं की सप्लाई भी प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों पर ध्यान देना होगा और घरेलू उत्पादन बढ़ाने के प्रयास तेज करने होंगे, ताकि किसी भी संभावित संकट से कृषि क्षेत्र को बचाया जा सके।
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