Iran war: ईरान अमेरिकी टेक कंपनियों को भी निशाना बना रहा है। इससे कॉर्पोरेट वर्ल्ड में नई चुनौती खड़ी हो गई है। अब कंपनियां भी युद्ध से अछूती नहीं रहीं।
Iran war: बात सिर्फ फौज और मिसाइलों की नहीं रही। ईरान ने साफ कह दिया है कि Apple, Microsoft, Google, JPMorgan और Nvidia जैसी अमेरिकी कंपनियां उसके निशाने पर हैं। खाड़ी में काम करने वाले इन कंपनियों के दफ्तरों को खाली करने की चेतावनी भी दी गई है। यह बयान सुनकर पहले अजीब लग सकता है। लेकिन इसका मतलब समझिए।
पहले युद्ध में कंपनियां बस "नुकसान उठाने वाली" होती थीं। यानी जंग होती थी, उनका कारोबार प्रभावित होता था, लेकिन वे सीधे निशाना नहीं बनती थीं। अब ईरान ने उस सोच को पलट दिया है। उसने इन कंपनियों को अमेरिकी सैन्य शक्ति का हिस्सा बताया है। उसका कहना है कि क्लाउड कंप्यूटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और निगरानी तकनीक, ये सब अमेरिकी जंग की ताकत हैं। मतलब सीधा है। टेक कंपनी चलाना अब "तटस्थ" काम नहीं रहा।
ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर यानी IRGC ने सीधे तौर पर तकनीक, वित्त और एयरोस्पेस क्षेत्र की अमेरिकी कंपनियों को चेतावनी दी है। यह महज बयानबाजी नहीं है। साइबर हमले पहले से शुरू हो चुके हैं। बैंक्स, इंफ्रास्ट्रक्चर और कॉर्पोरेट नेटवर्क पर डिजिटल हमलों की खबरें आ रही हैं। तेल की पाइपलाइनें और समुद्री रास्ते पहले से निशाने पर हैं। यानी कंपनियां अब एक साथ तीन मोर्चों पर लड़ रही हैं। उनकी इमारतें और दफ्तर, उनका डिजिटल सिस्टम और उनकी वित्तीय स्थिरता।
एक और पेच है जो कम चर्चा में है। ज़्यादातर कंपनियों की बीमा पॉलिसी में "युद्ध जोखिम" को बाहर रखा जाता है। यानी अगर किसी कंपनी को जंग की वजह से नुकसान हुआ तो बीमा कंपनी हाथ खड़े कर देगी। नुकसान की भरपाई खुद कंपनी को करनी होगी। पश्चिमी विशेषज्ञ पहले से आगाह कर रहे हैं कि पुराने जोखिम मॉडल इस नई दुनिया के लिए तैयार नहीं हैं।
याद करिए पिछले साल जब पाकिस्तान ने भारत की जामनगर रिफाइनरी को निशाना बनाने की धमकी दी थी। यह उसी सोच का हिस्सा है। आर्थिक ठिकाने अब सैन्य संदेश देने का जरिया बन गए हैं। ईरान ने बस इसे एक कदम और आगे ले जाकर किसी कंपनी का नाम लेकर धमकी दी है। अगर यह तरीका कारगर रहा तो दूसरे देश और आतंकी संगठन भी यही राह अपना सकते हैं।
बड़ी कंपनियों के CEO और बोर्ड को अब एक नई हकीकत से सामना करना होगा। पहले जोखिम का मतलब होता था सरकारी नियम बदलना, सप्लाई चेन टूटना या किसी देश में प्रतिष्ठा को नुकसान। अब जोखिम का मतलब है कि आपकी कंपनी किसी युद्ध में एक पक्ष मान ली जाए। इसके लिए कंपनियों को अपनी जियोपॉलिटिकल यानी भू-राजनीतिक समझ को कारोबारी फैसलों का हिस्सा बनाना होगा। किन देशों में दफ्तर हैं, किस तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है, साइबर सुरक्षा कितनी मजबूत है, ये सब अब सिर्फ IT विभाग के सवाल नहीं हैं।
शायद इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सबक यह है कि दुनिया में "हम सिर्फ कारोबार करते हैं, राजनीति से दूर रहते हैं" वाली बात अब नहीं चलेगी। जब तकनीक और राज्यशक्ति के बीच की लकीर मिट रही हो, जब एक सर्च इंजन को हथियार कहा जाए और एक क्लाउड प्लेटफॉर्म को युद्ध का औजार, तब कोई कंपनी यह नहीं कह सकती कि हमारा इससे कोई लेना-देना नहीं है। आने वाले युद्धों में सवाल यह नहीं होगा कि कंपनियों पर असर पड़ेगा या नहीं। सवाल यह होगा कि वो किस तरफ खड़ी हैं।