Iran Oil Revenue: अमेरिका की नाकेबंदी के बावजूद ईरान युद्ध से पहले की तुलना में 40 फीसदी ज्यादा तेल राजस्व कमा रहा है। समंदर में 18 करोड़ बैरल तेल से वह अगस्त तक टिक सकता है। ट्रंप के पास वक्त और धैर्य दोनों कम हैं।
Iran US naval blockade: डोनाल्ड ट्रंप ने Truth Social पर लिखा है कि ईरान रोज 50 करोड़ डॉलर गंवा रहा है और फौज को तनख्वाह नहीं मिल रही। सुनने में लगता है जैसे ईरान बस गिरने ही वाला है। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और कहती है। तेल बाजार के जानकारों के आंकड़े देखें तो पता चलता है कि पिछले एक महीने में ईरान ने तेल बेचकर करीब 500 करोड़ डॉलर कमाए हैं और यह रकम युद्ध से पहले की कमाई से 40 फीसदी ज्यादा है। तो क्या ट्रंप की बात झूठ है? पूरी तरह नहीं।
13 अप्रैल को दोपहर 2 बजे अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी शुरू की थी। उसके बाद से होर्मुज स्ट्रेट के पास एक ईरानी तेल टैंकर पर हमला हुआ, उसे जब्त किया गया। साथ ही कई और जहाजों को रास्ते में रोककर दिशा बदलवाई गई। ईरान ने कहा यह "समुद्री डकैती" है और जवाब में ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट विदेशी जहाजों के लिए बंद कर दिया। कुछ जहाज जब्त किए और मार्च से "टोल बूथ" सिस्टम चला रखा है, जहां गुजरने वाले जहाजों से 2 करोड़ डॉलर तक वसूले जा रहे हैं। दुनिया का 20 फीसदी तेल और गैस इसी रास्ते से गुजरता था। अब वह रास्ता ईरान की मुट्ठी में है।
नाकेबंदी से पहले ईरान रोज 11.5 करोड़ डॉलर का तेल बेच रहा था। लेकिन जब से युद्ध शुरू हुआ और होर्मुज पर उसका कंट्रोल आया, दाम आसमान छू गए। दाम 90 डॉलर प्रति बैरल से नीचे नहीं गए, कई दिन तो 100 डॉलर पार रहे। व्यापार खुफिया कंपनी Kpler के मुताबिक मार्च से अब तक ईरान ने 5.5 करोड़ बैरल तेल निर्यात किया है। 90 डॉलर के हिसाब से भी यह करीब 500 करोड़ डॉलर बनता है।
अब अमेरिकी नाकेबंदी के बाद नए जहाज रवाना नहीं हो पा रहे। लेकिन पहले से समंदर में तैर रहे जहाजों में करीब 18 करोड़ बैरल तेल है। विश्लेषक Kenneth Katzman कहते हैं कि इस तेल की बिक्री से ईरान अगस्त तक आराम से कमाई कर सकता है और अगस्त तक ट्रंप के पास धैर्य बचेगा? शायद नहीं।
Middle East Council on Global Affairs के विशेषज्ञ Frederic Schneider कहते हैं कि ईरान "लंबे खेल" की तैयारी करके बैठा है। नाकेबंदी से दर्द जरूर है, लेकिन ईरान ने पहले से इसकी तैयारी कर रखी थी। ट्रंप के सामने एक बड़ी मुश्किल है। 1 मई तक उनके पास कांग्रेस की मंजूरी के बिना विदेशी सैन्य अभियान चलाने का वक्त खत्म हो जाएगा। 60 दिन की यह सीमा कानून में तय है। इसके अलावा चीन ने साफ कह दिया है कि ईरान के साथ उसके व्यापार पर रोक "अस्वीकार्य" है। चीन ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है और वह यह सिलसिला बंद करने को तैयार नहीं है।
बहरीन में पूर्व अमेरिकी राजदूत Adam Ereli ने साफ कहा कि ईरान की सहनशक्ति को कम मत आंकिए। "वे अमेरिकी रणनीतिकारों की सोच से कहीं ज्यादा लंबे समय तक टिके रह सकते हैं। अमेरिकियों के आगे घुटने टेकना उनके लिए संभव नहीं, यह उनके वजूद का सवाल है।"
ट्रंप ने दावा किया कि तेहरान में "कट्टरपंथियों" और "उदारवादियों" के बीच "पागलपन भरी लड़ाई" चल रही है। लेकिन ईरान के नेताओं ने एक सुर में यह दावा खारिज किया। राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने कहा, "ईरान में कोई कट्टरपंथी या उदारवादी नहीं है। हम सब ईरानी हैं।" विदेश मंत्री Araghchi ने कहा कि सेना और सरकार पूरी तरह एकजुट हैं।
यह लड़ाई सिर्फ अमेरिका और ईरान की नहीं है। होर्मुज बंद होने से खाड़ी देशों का तेल बाहर नहीं निकल पाता। इससे पूरी दुनिया में तेल और गैस के दाम आसमान छूते हैं। जब तेल महंगा होता है, तो पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस, ट्रांसपोर्ट, खाने-पीने की चीजें, सब महंगी हो जाती हैं। यानी इस लड़ाई की आंच भारत जैसे देशों तक भी पहुंचती है।