
ट्रेन के रिजर्व AC कोच में सफर कर रहे हैं तो यह मान लेना कि आपका सामान पूरी तरह सुरक्षित है, हमेशा सही नहीं है। उत्तराखंड राज्य उपभोक्ता आयोग ने ऐसे ही एक मामले में रेलवे की लापरवाही को जिम्मेदार माना है। आयोग ने कहा कि अगर रिजर्व कोच के दरवाजे खुले हों और अंदर कोई कोच अटेंडेंट, पुलिसकर्मी या TTE मौजूद न हो, तो चोरी होने पर रेलवे अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह बच नहीं सकता।
यह मामला 2 जुलाई 2018 का है, जब मेवाड़ एक्सप्रेस से उदयपुर से नई दिल्ली जा रहे एक परिवार के साथ मथुरा के पास तड़के करीब 4 बजे चोरी हुई थी। अब कई साल बाद आयोग ने रेलवे की अपील खारिज करते हुए जिला उपभोक्ता आयोग की ओर से दिए गए 47,222 रुपये के पेमेंट के आदेश को बरकरार रखा है।
परिवार 1 जुलाई 2018 को उदयपुर से दिल्ली के लिए रवाना हुआ था। वे मेवाड़ एक्सप्रेस के रिजर्व एसी कोच में सफर कर रहे थे। 2 जुलाई की सुबह ट्रेन जब मथुरा के पास पहुंची, तब एक व्यक्ति कोच में घुसा और एक यात्री का बैग जबरन लेकर भागने लगा। शिकायत के मुताबिक, वीणा डोभाल अपनी बर्थ पर सो रही थीं और उनका बड़ा बैग सिर के नीचे, तकिए के पास रखा था। चोर ने बैग खींच लिया। नींद खुलने पर उन्होंने शोर मचाया। परिवार के दूसरे सदस्यों और आसपास के यात्रियों ने उसे पकड़ने की कोशिश की, लेकिन आरोपी चलती ट्रेन से बैग लेकर कूद गया। इसके बाद यात्रियों ने कोच में कोच अटेंडेंट, आरपीएफ जवान और TTE को तलाशा, लेकिन उस समय इनमें से कोई भी वहां मौजूद नहीं था।
चोरी के बाद रेलवे ने अपनी तरफ से लापरवाही मानने से इनकार किया। रेलवे का तर्क था कि यात्रियों को अपने सामान की सुरक्षा खुद करनी चाहिए। रेलवे ने यह भी कहा कि यात्रियों को कोच में सामान को चेन से बांधकर रखने की सलाह दी जाती है, लेकिन शिकायतकर्ताओं ने ऐसा नहीं किया था। रेलवे ने यह भी दलील दी कि परिवार ने अपना सामान रेलवे के पास बुक नहीं कराया था और न ही यह घोषित किया था कि उनके पास कीमती सामान है। लेकिन आयोग को रेलवे की यह दलील मंजूर नहीं हुई।
राज्य उपभोक्ता आयोग ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए रेलवे प्रशासन की लापरवाही को साफ तौर पर माना। आयोग ने पाया कि शिकायतकर्ताओं ने खास तौर पर आरोप लगाया था कि कोच और वेस्टिब्यूल के अंतिम दरवाजे रात में बंद नहीं थे। खास बात यह रही कि रेलवे इस आरोप का स्पष्ट खंडन नहीं कर पाया। रेलवे ने यह साबित करने के लिए भी कोच अटेंडेंट या TTE की तरफ से कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया कि उस समय दरवाजे बंद रखे गए थे। आयोग ने माना कि अगर कोच के दरवाजे बंद होते तो अनधिकृत लोगों के अंदर घुसने और चोरी करने की गुंजाइश ही नहीं बनती। यही बात इस पूरे मामले में रेलवे के खिलाफ सबसे अहम आधार बनी।
परिवार ने चोरी की जानकारी रेलवे अधिकारियों को दी। टीटीई को भी घटना के बारे में बताया गया और एफआईआर का फॉर्म भरकर बाद में हजरत निजामुद्दीन स्थित गवर्नमेंट रेलवे पुलिस को सौंपा गया। 2 जुलाई 2018 को सुबह 7:50 बजे जीरो एफआईआर दर्ज की गई। शिकायतकर्ताओं ने आयोग को बताया कि उन्होंने जांच की स्थिति जानने की कोशिश की, लेकिन उन्हें मामले के नतीजे की जानकारी नहीं मिल सकी।
उत्तराखंड राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग की अध्यक्ष कुमकुम रानी और सदस्य बीएस मनराल की पीठ ने रेलवे और केंद्र सरकार की अपील पर सुनवाई की। रेलवे ने 11 मई 2022 के जिला उपभोक्ता आयोग, देहरादून के आदेश को चुनौती दी थी। जिला आयोग ने यात्रियों को हुए नुकसान के लिए 37,222 रुपये, मानसिक परेशानी के लिए 25,000 रुपये और मुकदमे के खर्च के लिए 10,000 रुपये देने का आदेश दिया था। राज्य आयोग ने रेलवे की अपील को स्वीकार नहीं किया। हालांकि, अंतिम भुगतान की राशि के संबंध में आयोग ने कुल 47,222 रुपये का आदेश बरकरार रखा, जिसमें 37,222 रुपये मुआवजा और 10,000 रुपये मुकदमे का खर्च शामिल है।
आयोग ने रेलवे को 37,222 रुपये की रकम पर 31 जुलाई 2020 से भुगतान होने तक 7 फीसदी सालाना ब्याज देने का भी निर्देश दिया है। यानी रेलवे को सिर्फ मूल मुआवजा और कानूनी खर्च ही नहीं देना होगा, बल्कि तय अवधि का ब्याज भी चुकाना होगा।
इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि ट्रेन में चोरी होते ही रेलवे को हर मामले में मुआवजा देना होगा। इस मामले में आयोग ने रेलवे की लापरवाही को अहम माना। अगर यात्री यह साबित कर सके कि सामान की चोरी रेलवे कर्मचारियों की लापरवाही या गलत तरीके से काम करने के कारण हुई, जैसे रिजर्व कोच को सुरक्षित नहीं रखना या अनधिकृत लोगों को अंदर आने से नहीं रोकना, तो मुआवजे का दावा मजबूत हो सकता है। यानी सिर्फ चोरी होना काफी नहीं है। मामले में रेलवे की जिम्मेदारी और लापरवाही का संबंध साबित करना भी महत्वपूर्ण है।