Strait of Hormuz: अमेरिका-ईरान युद्ध के बाद होर्मुज स्ट्रेट बंद है, जिससे एशिया में तेल संकट गहरा रहा है। ट्रंप के "रास्ता खुला" वाले दावे और जमीनी हकीकत में बड़ा फर्क है। जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर में तेल आयात तेजी से घटा है, जबकि भारत रूसी तेल से काम चला रहा है।
US Iran War Strait of Hormuz: होर्मुज स्ट्रेट बंद है और जब तक यह बंद रहेगा, एशिया में तेल का संकट और गहरा होता जाएगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सोशल मीडिया पर जो भी लिखें, जमीन पर तस्वीर कुछ और ही बयां कर रही है। 17 अप्रैल को ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि होर्मुज स्ट्रेट "पूरी तरह खुला" है। यह खबर आई और कच्चे तेल की कीमतें 9.1% गिरकर 90.38 डॉलर प्रति बैरल पर आ गईं। लेकिन जैसे ही सोमवार की सुबह एशियाई बाजारों को पता चला कि रास्ता अभी भी बंद है, कीमतें फिर 6.9% उछलकर 96.59 डॉलर पर पहुंच गईं। यह खेल पिछले कई हफ्तों से चल रहा है। ट्रंप का एक पोस्ट और बाजार ऊपर-नीचे। लेकिन हकीकत नहीं बदलती।
ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स ने साफ कर दिया है कि जब तक अमेरिका ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी जारी रखेगा, वे होर्मुज स्ट्रेट को बंद ही रखेंगे। यानी एक तरफ ट्रंप कह रहे हैं कि वे रास्ता खुलवाएंगे और दूसरी तरफ खुद नाकेबंदी भी बनाए हुए हैं।
अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी को ईरान पर हमला शुरू किया था। तब से होर्मुज स्ट्रेट, जिससे दुनिया का करीब 20% कच्चा तेल और रिफाइंड उत्पाद गुजरता था, बंद पड़ा है। दुनियाभर के तेल बाजारों में यह उम्मीद बनी हुई है कि यह संकट जल्द खत्म होगा। इसीलिए कच्चे तेल के वायदा भाव भले ही बढ़े हों, लेकिन 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद के रिकॉर्ड से अभी भी नीचे हैं। लेकिन यह उम्मीद कितनी टिकाऊ है?
एशिया के लिए यह संकट सबसे गंभीर है, क्योंकि होर्मुज से होने वाले कुल तेल परिवहन का करीब 80% हिस्सा एशिया की तरफ ही जाता था। सिंगापुर, जो एशिया का सबसे बड़ा तेल व्यापार केंद्र है, वहां जेट फ्यूल की कीमत 17 अप्रैल को 204.13 डॉलर प्रति बैरल थी। युद्ध शुरू होने से एक दिन पहले यानी 27 फरवरी को यह सिर्फ 93.45 डॉलर पर था। यानी दोगुने से भी ज्यादा की बढ़ोतरी। डीजल का कच्चा माल गैसऑयल 145.27 डॉलर प्रति बैरल पर है, जो युद्ध से पहले के मुकाबले 59% ज्यादा है।
जनवरी में औसत 26.76 मिलियन बैरल तेल प्रतिदिन एशिया आता था। मार्च में 22.36 मिलियन बैरल तेल प्रतिदिन एशिया आया है। जबकि अप्रैल में 20.62 मिलियन बैरल तेल प्रतिदिन ही एशिया आया है। यानी हर महीने गिरावट आई है। ये आंकड़े कमोडिटी विश्लेषण कंपनी Kpler के हैं।
इस पूरी तस्वीर में एक राहत की बात है और वो भारत के लिए है। जहां बाकी एशियाई देशों में तेल आयात लगातार घट रहा है, वहीं भारत का अप्रैल आयात 4.67 मिलियन बैरल प्रतिदिन रहने का अनुमान है, जो मार्च के 4.45 मिलियन से थोड़ा ज्यादा है। भारत ने रूसी तेल का सहारा लिया है। फरवरी में जहां 1.06 मिलियन बैरल रूसी तेल आ रहा था, वो अप्रैल में बढ़कर 1.64 मिलियन बैरल हो गया। मिडिल ईस्ट से आपूर्ति कम हुई तो रूस ने उस कमी को काफी हद तक पूरा कर दिया। लेकिन भारत की यह कामयाबी पूरे एशिया की तस्वीर नहीं बदलती।
कुछ बुनियादी सवाल हैं, जिनका जवाब अभी किसी के पास नहीं है। क्या होर्मुज को अब अमेरिका बंद कर रहा है, ईरान नहीं? अगर ट्रंप नाकेबंदी हटा लें, तो क्या ईरान रास्ता खोलेगा? दोनों देशों के बीच इतना भरोसा बचा भी है? और सबसे अहम सवाल- ईरान में असली फैसला कौन करता है, क्या वो ट्रंप से बात करने को तैयार है? उस ट्रंप से, जो पहले भी समझौते तोड़ चुके हैं? इन सवालों के जवाब मिलने तक एक बात तय है- होर्मुज के दोनों तरफ सैकड़ों जहाज खड़े हैं और रास्ता बंद है।
जब क्रूड ऑयल के रिफाइंड उत्पादों की किल्लत तेजी से बढ़ेगी और बढ़ेगी जरूर, तब ट्रंप की इस "जंग" की असली आर्थिक कीमत समझ आएगी। तेल के वायदा बाजार अभी उम्मीद पर टिके हैं। लेकिन जमीन पर हालात उस उम्मीद के खिलाफ जा रहे हैं।