बेसबॉल, जूडो और मलखंभ,सेपकटकरा जैसे खेलों में यहां के खिलाडिय़ों ने न केवल जिला बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनाई है। शहर के 23 महिला और 30 पुरुष खिलाड़ी अब तक देशभर में विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लेकर छतरपुर का नाम रोशन कर चुके हैं।
खेल प्रतिभा और अनुशासन के क्षेत्र में बुंदेलखंड का छतरपुर शहर तेजी से उभरता हुआ नाम है। खास तौर पर बेसबॉल, जूडो और मलखंभ,सेपकटकरा जैसे खेलों में यहां के खिलाडिय़ों ने न केवल जिला बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनाई है। शहर के 23 महिला और 30 पुरुष खिलाड़ी अब तक देशभर में विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लेकर छतरपुर का नाम रोशन कर चुके हैं। इनमें कई खिलाडिय़ों ने स्वर्ण, रजत और कांस्य पदक भी हासिल किए हैं।
एक तरफ तो इन खिलाडिय़ों का प्रदर्शन राष्ट्रीय स्तर पर सराहनीय रहा है, लेकिन दूसरी तरफ दुखद पहलू यह है कि इनके लिए छतरपुर में कोई भी समर्पित स्पोर्ट्स अकादमी नहीं है। खिलाडिय़ों के प्रशिक्षण के लिए कोच और उपकरण तो विभाग की ओर से उपलब्ध करा दिए जाते हैं, लेकिन खेलों में सबसे जरूरी डाइट के लिए आज तक कोई बजट तय नहीं किया गया है। परिणामस्वरूप, खिलाड़ी अपनी जेब से डाइट का खर्च उठाकर अभ्यास कर रहे हैं। यह बात तब और चिंताजनक हो जाती है जब खिलाडिय़ों की सफलता का ग्राफ दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा हो।
शहर के इन खिलाडिय़ों ने अपनी मेहनत से जो मुकाम हासिल किया है, वह उनके आत्मविश्वास और संघर्ष का प्रतीक है। चाहे वह जूडो हो, मलखंभ या फिर बेसबॉल, हर क्षेत्र में छतरपुर के युवा लगातार खुद को साबित कर रहे हैं। सबसे ज्यादा खिलाड़ी बेसबॉल से हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीतकर जिले को गौरवान्वित किया है। खास बात यह है कि इन खेलों में भाग लेने वाले अधिकांश खिलाड़ी सीमित संसाधनों और साधनों के बावजूद प्रैक्टिस जारी रखे हैं। वे स्कूल, कॉलेज के बाद अपनी फिटनेस और तकनीक पर घंटों मेहनत करते हैं। लेकिन उचित डाइट न मिल पाने की वजह से कई बार उनकी परफॉर्मेंस पर असर पड़ता है। अनुभवी कोच उन्हें तकनीकी प्रशिक्षण तो दे सकते हैं, मगर शरीर को तैयार रखने के लिए जो पोषण चाहिए, उसकी जिम्मेदारी खिलाड़ी खुद ही उठा रहे हैं।
वर्तमान में जिले में खेल अकादमी की स्थापना की सख्त जरूरत है ताकि बेसबॉल, मलखंभ और जूडो जैसे लोकप्रिय होते खेलों को उचित दिशा मिल सके। यदि सरकार या प्रशासन इन खेलों को प्राथमिकता देकर एक डेडिकेटेड स्पोर्ट्स अकादमी स्थापित करे, तो न केवल जिले बल्कि राज्य और देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी मिल सकते हैं। साथ ही खिलाडिय़ों के लिए डाइट बजट तय कर उन्हें उचित पोषण प्रदान किया जाए, जिससे उनकी मेहनत रंग ला सके।
खेल विभाग की ओर से प्रयास लगातार किए जा रहे हैं, मगर जब तक अकादमी और डाइट जैसी मूलभूत जरूरतें पूरी नहीं होंगी, तब तक खिलाड़ी आधे-अधूरे संसाधनों में संघर्ष करते रहेंगे। अधिकारी राजेंद्र कोष्ठा ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि विभाग डाइट के लिए बजट नहीं दे पाता और खिलाड़ी स्वयं वहन करते हैं। छतरपुर जैसे छोटे शहर में यदि इतने खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमा सकते हैं, तो यह इस बात का प्रमाण है कि प्रतिभा की कोई कमी नहीं, जरूरत है तो बस उसे पहचानने और संवारने की। यदि सरकार और प्रशासन इन खिलाडिय़ों के प्रति थोड़ी संवेदनशीलता दिखाए, तो छतरपुर से भी ओलंपिक विजेता निकल सकते हैं।
खेल का नाम- पदक संख्या
बेसबॉल रजत 18
जूडो रजत 01
सेपकटकरा कांस्य 04
मलखंब कांस्य 01
खेल का नाम पदक संख्या
बेसबॉल रजत 18
सेपकटकरा स्वर्ण 06
सेपकटकरा रजत 06
देय बोर्ड नहीं
मलखंब कोच सुरेश निगम का कहना है कि अन्य शहरों में देय बोर्ड है, जो राज्य स्तर पर खेलने वाले खिलाड़ी को डाइट और मानदेय भी देता है। इससे खिलाड़ी को अपने प्रशिक्षण में सुविधा प्राप्त होती है। निगम का कहना है यदि ये सुविधाएं यहां शुरु हुईं तो हम वैश्विक स्तर पर अपनी छाप छोडेंगे। वही कोच का कहना है कि कलेक्टर द्वारा स्टेडियम में मलखंब कोर्ट बनाने के लिए पांच लाख की राशि स्वीकृत की है। हम लोगों की मांग है कि वह कोर्ट वहां बनाया जाए जहां अभी वर्तमान में खिलाड़ी प्रशिक्षण ले रहे हैं। इसके लिए हम लोगों ने जनसुनवाई में गुहार लगाई है।
इनका कहना है
विभाग द्वारा कोच और उपकरण खिलाडिय़ों को उपलब्ध कराए जाते हैं। अकादमी न होने से हमारे पास डाइट का कोई बजट नहीं है। वे खिलाड़ी खुद वहन करते हैं। स्टेडियम बनने से शहर में खेल का विकास हुआ है।
राजेंद्र कोष्ठा, खेल एवं युवा कल्याण अधिकारी