
चित्तौड़गढ़। कभी आम परिवारों में शादी-ब्याह और तीज-त्योहारों पर तन की सुंदरता बढ़ाने वाला सोना अब महज सजने-संवरने का जरिया नहीं रहा, बल्कि सुरक्षित और तगड़े रिटर्न की गारंटी देने वाला सबसे बड़ा इन्वेस्टमेंट टूल बन गया है। बीते पांच दशकों में सोने और चांदी के भावों में आई बेतहाशा तेजी ने पूरे सर्राफा बाजार के समीकरण और आम उपभोक्ता की खरीदारी की सोच को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। आंकड़ों के आईने में देखें तो वर्ष 1975 में जो सोना महज 540 रुपए प्रति दस ग्राम के भाव में आसानी से मिल जाता था, आज उसकी कीमत 1.43 लाख रुपए चल रही है। जनवरी माह में भाव 1.90 लाख रुपए प्रति दस ग्राम तक पहुंच गए थे।
भावों में बढ़ोतरी के कारण जिले में सोने की रोजाना की खपत में गिरावट आई है। चित्तौड़गढ़ जिले में प्रतिदिन करीब 5 से 6 किलो सोने की बिक्री होती थी, अब यह आंकड़ा घटकर महज 2 किलो के आसपास रह गया है। इसमें भी एक किलो सोना ही पारंपरिक आभूषण बनाने के काम आ रहा है। बाकी का बचा हुआ सोना लोग बुलियन, बिस्किट, सिक्के और डिजिटल फॉर्म में निवेश किया जा रहा है।
सर्राफा विशेषज्ञों के अनुसार चांदी की कीमतों में भी जबरदस्त उछाल आया है। वर्ष 1981 में जो चांदी महज 2,715 रुपए प्रति किलो के भाव बिकती थी, वह आज बढकऱ 2.18 लाख रुपए प्रति किलो तक पहुंच गई है। हालांकि जनवरी में इसके भाव 4 लाख रुपए प्रति किलो पहुंच गए थे।
देश में प्रतिवर्ष लगभग 800 से 1000 टन सोने का आयात किया जाता है। जानकारों के अनुसार छह महीने पहले तक प्रति किलो सोने पर महज दस हजार रुपए का आयात शुल्क लगता था, जो अब नीतियों के बदलाव के कारण बढकऱ 15 से 16 लाख रुपए प्रति किलो तक पहुंच चुका है। आयात शुल्क में बढ़ोतरी और प्रधानमंत्री द्वारा सोना न खरीदने की अपील से भी कारोबार गड़बड़ा गया है।
सोने को हमेशा से सुरक्षित निवेश माना जाता है। आयात शुल्क बढऩे और प्रधानमंत्री की अपील के बाद मांग जरूर घटी है। वर्तमान में यह आभूषण से ज्यादा निवेश के काम आ रहा है। भावों में बेतहाशा तेजी के चलते जिले में सोने की बिक्री आधी से भी कम रह गई है।"