राजस्थान सरकार की 'बैल प्रोत्साहन योजना' के प्रति किसानों में जबरदस्त उत्साह है, लेकिन कृषि विभाग के 'बौने' लक्ष्यों ने इस उत्साह पर पानी फेर दिया है।
बैल प्रोत्साहन योजना : गांवों में एक बार फिर पारंपरिक खेती के दिन लौटते दिख रहे हैं, लेकिन सरकारी दावों की जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। राज्य सरकार की 'बैल प्रोत्साहन योजना' के प्रति किसानों में जबरदस्त उत्साह है, लेकिन कृषि विभाग के 'बौने' लक्ष्यों ने इस उत्साह पर पानी फेर दिया है।
बीते वित्तीय वर्ष में अनुदान पाने के लिए आए आवेदनों की तुलना में स्वीकृतियां 'ऊंट के मुंह में जीरे' के समान साबित हुई हैं। प्रदेश सरकार ने बजट 2025-26 में पारंपरिक खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यह योजना शुरू की थी।
इसके तहत बैल जोड़ी से खेती करने वाले काश्तकारों को प्रतिवर्ष 30 हजार रुपए की प्रोत्साहन राशि देने का प्रावधान है। योजना ने किसानों में उम्मीद तो जगाई, लेकिन लक्ष्य इतने कम रहे कि हजारों किसान कतार में ही रह गए।
आंकड़ों की बाजीगरी देखिए, जिले भर से 4,214 किसानों ने योजना का लाभ लेने के लिए आवेदन किया। किसानों को उम्मीद थी कि बैलों के जरिए न केवल खेती की लागत कम होगी, बल्कि जैविक खेती को भी संबल मिलेगा। इसके विपरीत, कृषि विभाग ने पूरे जिले के लिए महज 800 का लक्ष्य निर्धारित किया। नतीजतन, आवेदन करने वाले करीब 80 फीसदी काश्तकार खाली हाथ रह गए।
विभाग ने लक्ष्य से थोड़ा ऊपर जाते हुए 865 किसानों के आवेदन तो स्वीकृत किए, लेकिन वित्तीय स्वीकृति का लाभ केवल 800 को ही मिल पाया। आवेदनों के भारी-भरकम अंबार के सामने यह संख्या बेहद मामूली है। विभाग ने लक्ष्य बढ़ाने के लिए उच्चाधिकारियों को पत्र भी लिखा, लेकिन कोई ठोस सफलता नहीं मिली। अब किसानों को उम्मीद है कि इस वर्ष लक्ष्य का दायरा बढ़ाया जाएगा।
सरकार की योजना की मंशा निस्संदेह नेक है, लेकिन धरातल पर बजट और लक्ष्यों की कमी इसके मूल उद्देश्य को ही कमजोर कर रही है। यदि सरकार वास्तव में पारंपरिक कृषि को पुनर्जीवित करना चाहती है, तो उसे आवेदनों के अनुपात में लक्ष्य (टारगेट) की सीमा को व्यापक रूप से बढ़ाना होगा। सिर्फ घोषणाएं करने से काम नहीं चलेगा, उन्हें धरातल पर उतारना जरूरी है।
बैल प्रोत्साहन योजना पिछले साल ही शुरू हुई है। इसमें आवेदनों की संख्या काफी अधिक रही, लेकिन लक्ष्य सीमित होने के कारण केवल 800 की ही अंतिम स्वीकृति जारी की जा सकी। लक्ष्य बढ़ाने के लिए मुख्यालय को पत्र लिखा गया है, उम्मीद है कि इस वर्ष अधिक लक्ष्य मिलेंगे।
डॉ. शंकरलाल जागा, संयुक्त निदेशक, कृषि विस्तार, चित्तौडगढ़