
Rajasthan News: भदेसर (चित्तौड़गढ़)। आमतौर पर राजस्थान के गांवों में चरागाह की जमीन का मतलब होता है कंटीली झाड़ियां, अवैध कब्जे और धूल उड़ाती उपेक्षा। लेकिन चित्तौड़गढ़ के भदेसर की धीरजी का खेड़ा पंचायत ने इस मिथक को मटियामेट कर दिया है। जहां 2021 तक पैर रखते ही धूल के गुबार उठते थे, आज वहां 5000 पेड़ों की सघन छांव है। नवसंवत्सर के पावन मौके पर यह 'पंचफल उद्यान' केवल हरियाली नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की जीती-जागती मिसाल पेश कर रहा है।
सरपंच प्रतिनिधि प्रकाशचंद्र खटीक ने इस लीक को तोड़ दिया कि सरकारी काम सिर्फ फाइलों तक सीमित होते हैं। उन्होंने इसे एक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि अपना मिशन मान लिया। इस नंदनवन को विकसित करने में ग्राम पंचायत और सरकार की ओर से एक करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च की गई है।
अक्सर नेता पौधरोपण के समय फोटो खिंचवाकर गायब हो जाते हैं, मगर प्रकाशचंद्र खुद तपती दोपहर में कुदाल थामे नजर आए। उनकी इसी जिद का नतीजा है कि आज अमोरिया गांव की 80 बीघा बंजर जमीन ऑक्सीजन का विशाल 'फेफड़ा' बन चुकी है।
रेगिस्तानी मिजाज वाले इलाके में 5000 पेड़ों को जिंदा रखना नामुमकिन था, जिसे मुमकिन बनाया इन आधुनिक समाधानों ने। बिजली की कटौती और भारी बिलों से बचने के लिए पंचायत ने सोलर वाटर पंप स्थापित किए। जमीन के सीने से पानी निकालकर पाइपलाइन के जरिए हर बूंद को जड़ों तक पहुंचाया गया। 5000 में से 2000 फलदार पौधे (आम, जामुन, अमरूद) अब पूरी तरह जवान हो चुके हैं। अब मेहनत रंग लाने लगी है और डालियां फलों के बोझ से झुकने लगी हैं।
यह मॉडल सिर्फ पर्यावरण के लिए नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था के लिए भी तैयार किया गया है। प्रकाशचंद्र खटीक ने बताया कि उद्यान में फल आना शुरू हो गए हैं। आने वाले समय में ग्राम पंचायत द्वारा इन फलों की बिक्री के लिए ठेके (नीलामी) दिए जाएंगे। इससे पंचायत की आय में भारी इजाफा होगा, जिससे गांव के विकास के अन्य कार्य किए जा सकेंगे।
हाल ही में जिला कलक्टर ने जब इस उद्यान की सघनता देखी, तो वे दंग रह गए। उन्होंने इसे 'जिले का गौरव' करार दिया है। आलम यह है कि जयपुर से लेकर दिल्ली तक इस मॉडल की चर्चा है। अन्य राज्यों के प्रतिनिधि मंडल यहां आकर ट्रेनिंग ले रहे हैं कि कैसे एक छोटे से गांव की पंचायत अपनी बंजर जमीन को 'सोना' बना सकती है।
पर्यावरण का पहरा: 3000 छायादार पेड़ क्षेत्र के बढ़ते तापमान को कम कर रहे हैं।
अतिक्रमण पर लगाम: चरागाह की कीमती जमीन को भू-माफियाओं से बचाकर सार्वजनिक संपत्ति में बदला।
आत्मनिर्भरता: फल बेचकर पंचायत खुद का बजट जुटाने में सक्षम बनेगी।
मेरा लक्ष्य सिर्फ फोटो खिंचवाना नहीं, बल्कि चरागाह को गांव की स्थायी संपत्ति बनाना था। आज जब पक्षियों का कलरव गूंजता है और बच्चे मीठे फल खाते हैं, तो लगता है कि नव संवत का असली स्वागत यही है।