चूरू

Rajasthan News : चूरू में अब लहलहाएगा मरूक्षेत्र का मेवा फोग, क्या है जानें?

Rajasthan News : राजस्थान में मरुक्षेत्र के मेवे के रूप फेमस है फोग। फोग के फूल 'फोगला' का रायता हरदिल अजीज है। रेगिस्तान में जब लू चलती है तो इस रायते की ठंडी तासीर उससे बचाती है। चूरू में अब एक बार फिर लहलाएगा आंचलिक पौधा फोग, क्या है जानें?

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Dec 31, 2024

नरेंद्र शर्मा
Rajasthan News : मरुस्थल के प्रवेश द्वार चूरू जिले में अब आंचलिक पौधा फोग लहलाएगा। कवायद शुरू हो गई है। वन विभाग ने पौधरोपण में फोग प्रजाति को शामिल किया है। जिला प्रशासन और वन विभाग के विजन अनुसार की गई तैयारियों के अनुसार कार्य हुआ तो आनवाले दिनों में धोरो की धरती पर फोग एक बार फिर नजर आने लगेगा। राजस्थान सरकार ने प्रदेश में एक जिला एक उत्पाद की पहल की है। जिसके तहत चूरू के जिला प्रशासन ने जिले के लुप्तप्राय: बेशकीमती पौधा फोग को फिर से विकसित करने का बीड़ा उठाया है। वन विभाग फोग के पौधे तैयार कर रहा है। जिन्हें वर्ष 2025 के मानसून सत्र जुलाई में वितरित किया जाएगा।

बहुआयामी फोग है उपयोगी

धोरो की धरती पर उगने वाला फोग एक ऐसा बहुआयामी पौधा है। जिसका हर कार्य में उपयोग किया जाता है। इसका लकड़ी और लकड़ी से बनने वाला कोयला ईंधन है। फोग के फूल फोगला का रायता जायकेदार होता है तो स्वास्थ्य की दृष्टि से गुणकारी होता है। पाचन समस्या को दूर करता फोगला कई प्रकार के रोगों की रामबाण दवा से कम नहीं है। पर्यावरण संरक्षण के साथ पशुओं के लिए इसकी पत्तियां उपयोगी है। फलों और फूलों में भरपूर विटामिन से युक्त फोगला एक पौष्टिक आहार है। औषधीय, पर्यावरण और पशुपालन सहित विविधतापूर्ण उपयोग वाला फोग यदि जिले की धरती पर विकसित होता है तो यह वन विभाग का मरुस्थल के लिए अवदान बनेगा।

कैसे लुप्त हो गया फोग

एक जमाना था कि खेतों और बारानी क्षेत्र में फोग खूब हुआ करता था, लेकिन जब से खेती में ट्रैक्टर आदि मशीनों के बेतहाशा उपयोग के कारण फोग के विकास में अवरोध खड़ा हो गया। ईंधन के लिए इसकी कटाई, इसकी जड़ों के कोयले बनाने, विलायती बबूल के प्रसार और आमजन की उदासीनता ने फोग को जड़ों से खत्म कर दिया। उपयोगी होने के बाद भी इसकी उपयोगिता नहीं समझी और यहां से फोग लुप्त होने के कगार पर पहुंच गया।

रेगिस्तानी इलाकों में पाए जानेवाला झाड़ीनुमा पौधा है फोग

रेगिस्तानी इलाकों में पाए जाने वाला झाड़ीनुमा पौधा जिसका वैज्ञानिक नाम कैलिगोनम पॉलीगोनोइइस है। जिसे यहां फोग के नाम से जाना जाता है। 4 से 6 फीट ऊंचाई तक का यह पौधा रेतीले धोरो या रेतीली मिट्टी पर उगता है। फोग एक औषधीय पौधा है जिसे कभी राजस्थान का मेवा कहा जाता था। हालांकि मेवा तो यह अब भी है क्योंकि फोग के फूल जिसे फोगला कहा जाता है जो रसोई की शोभा है।

आ गया संकटग्रस्त प्रजाति की श्रेणी में

मरुस्थल से फोग के लुप्त होने की कगार पर पहुंचने पर यह आज संकटग्रस्त प्रजाति में शामिल हो गया। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण आईयूसीएन की रेडा बुक में फोग संकटग्रस्त श्रेणी में रखा गया है। मरुक्षेत्र में फोग के बहुपयोग को देखते हुए इसके संरक्षण की वर्तमान को आवश्यकता है। इसलिए वन विभाग ने सक्रिय प्रयास शुरू किए है जो एक सकारात्मक पहल है।

फोग प्रजाति की तैयार की जाएगी अच्छी किस्में

फोग को विकसित करने के लिए आमजन को जागरूक किया जाएगा। ईंधन के वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध करवाने के प्रयास किए जाएंगे। किसानों को खेत की सीवं में फोग लगाने के प्रोत्साहित करने के साथ ही इसे पौधारोपण अभियान में शामिल किया जाएगा। इसके अलावा अनुसंधान कर फोग प्रजाति की अच्छी किस्में तैयार की जाएगी।

जुलाई माह में वितरण किया जाएगा फोग

राज्य सरकार ने प्रत्येक जिले को एक जिला एक प्रजाति की थीम दी। जिस पर वन विभाग ने यहां फोग को बढ़ावा देने का विजन तैयार किया है। फोग रेतीली धरती पर हुआ करते थे लेकिन मशीनों के उपयोग के कारण यह लुप्त होने के कागार पर पहुंच गया। इसलिए विभाग यहां दस हजार पौधे तैयार कर रहा है। जिसका जुलाई माह में वितरण किया जाएगा। लोगों को जागरूक कर पौधरोपण करने के लिए प्रेरित किया जाएगा। अभी नेचर पार्क में पौधे लगाए भी है।
भवानीसिंह, उप वन सरंक्षक चूरू

Updated on:
31 Dec 2024 04:31 pm
Published on:
31 Dec 2024 04:29 pm
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