
नई दिल्ली। बात 25 अक्टूबर, 1978 की सुबह यानी सूर्योदय के ठीक पहले की बात है। वारदात स्थल का नाम रायपुर सेंट्रल जेल का 8 गुणे 10 फीट का वह बैरक है, जिसमें कैद था हत्या का अपराधी बैजू। सभी लोग बैरक के सामने के सामने खड़े थे। अमूमन विरान रहने वाली यह जगह भीड़भाड़ से भरी हुई थी।
रायपुर के तत्कालीन जेल अधीक्षक, डॉक्टर, मजिस्ट्रेट, पंडित सहित दर्जनों जेल कर्मचारी और हथियार बंद सिपाही मौजूद थे। अब से कुछ देर बाद बैजू को फांसी के फंदे पर लटकाया जाना था। बैरक का दरवाजा खोला गया और हम सब उस बैरक में दाखिल हुए लेकिन बैजू जड़वत बैठा रहा। उसने कोई हरकत नहीं की।
जेल अधिकारी सोच रहे थे कि बैजू को कैसे बताया जाएगा कि चलो तुम्हें फांसी पर चढ़ाना है? लेकिन ऐसा कुछ नहीं, बस सीधे प्रक्रिया शुरू हो गई। किसी ने उसे ये बताने की जरूरत नहीं समझी। बस कानूनी प्रक्रिया शुरू हो गया। होना भी स्वभाविक है, ऐसा इसलिए कभी-कभी हमारे सामने कानून का वो निरीह चेहरा सामने आते है जब हम सब केवल बेबस होते हैं।
फांसी की प्रक्रिया को पूर्ण करने के लिए एक सिपाही के हाथ में बैजू के लिए नए कपड़े थे। दूसरे के पास नहाने के लिए साबुन, पानी, लोटा आदि और तीसरे के हाथ में मिठाई का पैकेट था। बैजू को नहलाकर नए कपड़े पहनाए गए। लेकिन उसने मिठाई को छुआ भी नहीं। अपने बच्चों से मिलना बैजू की अंतिम इच्छा थी।
तत्कालीन जेल अधीक्षक उससे रूबरू हुए कहा- तुमसे हफ्ते भर से पूछ रहे हैं कि तुम्हें किसी से मिलना है क्या? लेकिन तुमने तो कुछ बताया नहीं। बिना नजरें उठाए ही बैजू बोला कि आप तो रिश्तेदार का पूछते रहे, हम किसी रिश्तेदार से नहीं मिलब, सब दुश्मन हैं। हमार लड़कन को दिखवा देवे साहब। बैजू के फांसी के फंदे के पास खड़े हम सभी असहाय थे और गुमसुम, क्योंकि बैजू की यह इच्छा पूरी करना किसी के वश में नहीं था।
फांसी के फंदे पर लटकाने से पहले पंडित जी यंत्रवत मंत्र दोहराते रहे, जिसका बैजू पर कोई असर नहीं हो रहा था। पंडित जी ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि अच्छा चलो, गंगाजल पीकर तुलसी पत्ती खा लो और राम का नाम लो। बैजू अपनी हथेली में चिपकी गंगाजल की बूंदों को तो गटक गया लेकिन राम का नाम नहीं लिया। पर उसने ऐसा क्यों किया ये बात अधिकारियों को समझ नहीं आई।
मौके पर मौजूद एक अधिकारी ने कहा था कि उसे हत्या से लेकर फांसी के फंदे पर लटकने में इस बात का अहसास हो गया था कि हर इंसान अपने कर्मों किया भोगता है। लेकिन बैजू ने ये बात खुद नहीं बोला। उसका शांत, गंभीर, स्थिर लेकिन कई सवाल पूछने वाला चेहरा ये खुद ब खुद बोल रहा था।
समय सरकता जा रहा था। जेल के घंटे ने तभी 4 बजाए और जेल अधिकारी तथा मजिस्ट्रेट अचानक हरकत में आ गए। उन्होंने बैजू की पुकार को अनसुना करते हुए संवाद की प्रक्रिया को रोक दिया और सीधे अन्य औपचारिकताएं पूरी करनी शुरू कर दीं।
एक जेल अधिकारी ने न्यायालयों के फैसले को संक्षिप्त में पढ़कर सुनाया। बैजू उर्फ रामभरोसा उर्फ रामभरोसे को अंबिकापुर के जिला सत्र न्यायाधीष ने 30 अप्रैल, 1976 को फांसी की सजा सुनाई। इसके विरुद्ध हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में अपील की गईं लेकिन दोनों न्यायालयों ने अपील खारिज कर दी। उसकी दया याचिका को महामहिम राज्यपाल ने नामंजूर कर दिया और 19 अक्टूबर को महामहिम राष्ट्रपति ने भी जीवनदान देने में असहमति व्यक्त की। उसके बाद ही 25 अक्टूबर, 1978 को बैजू को फांसी की सजा दी गई थी।
चेहरे को ढकते समय लगभग रो पड़ा बैजू
बैजू के दोनों हाथ मोटी रस्सी से जकड़ लेने के बाद अब उसे बैरक से निकालने में एक कमी रह गई थी, उसके सिर पर काला कनटोप चढ़ाए जाने की। काले कपड़े के इस कनटोप से कैदी का सिर एवं चेहरा ढक दिया जाता है। ताकि वह कुछ देख न सके कि उसे कहां ले जाया जा रहा है।
दो जेल कर्मचारी कनटोप लेकर उसके सिर के ऊपर से चेहरे में फंसाने लगे तभी बैजू लगभग रो पड़ा और बोला- साहब, हमार मुंह मत ढको, हम ऐसे ही चल देंगे तुम्हारे साथ, साहब हम हाथ जोड़ते हैं।
बैजू की मुंह न ढकने की मांग ऐसी मांग नहीं थी जिसे मान लेने से न्यायालय के किसी आदेश की अवमानना होती या जेल नियमों का उल्लंघन होता या फांसी की सजा दिए जाने में कोई अवरोध पैदा होता। लिहाजा उसे बिना काला कनटोप लगाए ले जाने की इजाजत दे दी गई। दो सिपाहियों ने दोनों ओर से कसकर पकड़कर बैजू को बैरक से बाहर निकाला और पूरा काफिला फांसी के फंदे की ओर चल पड़ा। आगे-आगे 4 सिपाही पेट्रोमैक्स (लालटेन) लिए चल रहे थे।
मैदान के किनारे ऊंचे से स्थान पर फांसी देने के लिए दो प्लेटफार्म बने हुए थे जिनमें लोहे की मजबूत रॉड वाला आर्च बना हुआ था। दो प्लेटफार्म की व्यवस्था इसलिए रखी जाती है कि अगर एक प्लेटफार्म ऐन वक्त किसी वजह से काम न करे या उसमें कोई खराबी आ जाए तो दूसरे को उपयोग में लिया जा सके। प्लेटफार्म पर खड़े लोहे के आर्च के सहारे मोटी रस्सी झूल रही थी।
बैजू के सिर पर जबरन डाला कनटोपा
काला कनटोप लिए एक जेल वार्डन वहीं पास घूम रहा था। उसने बैजू के सिर पर थैले के आकार के कनटोप को जबरन डाल दिया। बैजू के गले में प्लेटफार्म के ऊपर लटकती मोटी रस्सी का फंदा कस दिया गया। इस कसावट को पक्का करने के लिए रस्सी पर पीतल की कुंडी भी कस दी गई। इस रस्सी को कैदी के बायें कान के नीचे जबड़े को कसते हुए लगाया जाता है।
जेल अधीक्षक ने अपनी घड़ी की ओर देखा 4 बजकर 27 मिनट। उन्होंने हाथ ऊपर उठाकर इशारा किया। जल्लाद का काम करने वाले कैदी ने इशारा मिलते ही फांसी की सजा देने के लिए लोहे का लीवर खींच दिया और पलक झपकते ही झटके से बैजू का शरीर उस तलघरनुमा में लटक गया।
फांसी की सजा दिए जाने के बाद शव को तब तक लटकाए रखने का प्रावधान मैन्युअल में है, जब तक चिकित्सा अधिकारी यह घोषित न कर दें कि उस कैदी का जीवन समाप्त हो गया है. थोड़ी देर रुककर डॉक्टर ने फिर परीक्षण किया, अब धड़कन बंद हो गई थी। यानी बैजू पूरी तरह गतिहीन और भावना शून्य लाश बन चुका था।