Mobile addiction: बच्चों को मोबाइल देना भारी पड़ सकता है। स्क्रीन की लत उन्हें ऑटिज्म और मानसिक विकारों का शिकार बना रही है। पांच साल में ऐसे मामलों की संख्या दोगुनी हो चुकी है।
Mobile addiction: अगर आप अपने बच्चों को घंटों मोबाइल देखने दे रहे हैं तो सावधान हो जाइए। इससे आपके बच्चे में ऑटिज्म (autism disorder) जैसी गंभीर बीमारी का खतरा बढ़ सकता है। ऑटिज्म एक तंत्रिका और विकास संबंधी विकार (न्यूरोडेवलपमेंटल डिसऑर्डर) है, जिसे सामान्य भाषा में मानसिक बीमारी भी कहा जा सकता है। बीते पांच साल में मोबाइल के बढ़ते चलन के कारण पांच साल तक के बच्चों में इस बीमारी की दर तेजी से बढ़ी है।
मनोरोग विशेषज्ञों (Psychiatric experts) का कहना है कि पांच साल तक के बच्चों में डेढ़ प्रतिशत तक इस बीमारी के मामले सामने आ चुके हैं। ऐसे कई बच्चों की स्पीच थेरेपी और मानसिक रोगों का इलाज अस्पतालों में चल रहा है।
पुणे में रहने वाली चार साल की एक बच्ची का सागर जिला अस्पताल के मानसिक रोग विभाग में इलाज चल रहा है। बच्ची के नाना-नानी ने बताया कि वह जो बोलती थी, वह समझ नहीं आता था। मनोरोग विशेषज्ञों की जांच में पता चला कि बच्ची दिनभर मोबाइल पर जापानी भाषा में कार्टून देखती थी, जिससे वह उसी भाषा में बात करने लगी।
दरअसल, बच्ची के माता-पिता नौकरी पर रहते थे और उसकी देखभाल मेड के जिम्मे थी। इस दौरान वह दिनभर मोबाइल पर जापानी कार्टून देखती थी, जिससे उसकी भाषा प्रभावित हो गई।
सागर जिला अस्पताल में अमेरिका से लौटे एक दंपती का बच्चा भी इलाज करा रहा है। समस्या यह है कि वह हिंदी और अंग्रेजी भाषा में भ्रमित हो गया है। मोबाइल पर लगातार अलग-अलग भाषाओं के कार्टून देखने के कारण बच्चा कंफ्यूज हो गया कि उसे किस भाषा में बोलना चाहिए। इस वजह से वह अपनी उम्र के हिसाब से सही तरीके से बोल नहीं पाता।
सोशल मीडिया पर बागेश्वरधाम से जुड़ी रील्स जमकर देखी जा रही हैं, और छोटे बच्चे भी इन्हें लगातार देख रहे हैं। इसका प्रभाव उनके मानसिक विकास पर पड़ रहा है। भोपाल के एक बच्चे पर इसका गहरा असर देखा गया, जब वह अपने दोस्तों के बीच बैठकर पं. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की तरह पर्चियां उठवाने लगा और उन्हीं की तरह बातें करने लगा।
मोबाइल के अधिक उपयोग से मानसिक विकारों की चपेट में आए बच्चों का इलाज स्पीच थेरेपी के माध्यम से किया जाता है। यह इलाज छह महीने से तीन साल तक चल सकता है। इस थेरेपी का खर्च हर महीने 8 से 10 हजार रुपए तक आता है, जो आम परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
दमोह निवासी मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. आदित्य दुबे का कहना है कि छोटे बच्चों में मोबाइल की लत के कारण ऑटिज्म के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इससे बच्चे सामाजिक रूप से अलग-थलग हो रहे हैं और उनके मानसिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। बीते पांच वर्षों में इस बीमारी के शिकार बच्चों की संख्या दोगुनी हो चुकी है।