
दौसा। कुछ मिठाइयां सिर्फ स्वाद के लिए नहीं, बल्कि शहर की पहचान बन जाती हैं। दौसा का डोवठा भी ऐसी ही एक मिठाई है, जिसने करीब एक सदी से अधिक समय में अपनी अलग पहचान बनाई है। कभी गांधी चौक की एक छोटी-सी दुकान से शुरू हुआ डोवठे का सफर आज देश के कई शहरों से होते हुए विदेशों तक पहुंच गया है। इसकी खासियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जापान, हांगकांग और बैंकॉक तक रहने वाले लोग भी दौसा के डोवठे की फरमाइश करते हैं।
डोवठा बनाने व बेचने वाले सीताराम खंडेलवाल ने बताया कि डोवठा बनाने की शुरुआत वर्ष 1915 में कन्हैयालाल हलवाई ने की थी। उस समय सीमित संसाधनों के बीच छोटी कढ़ाई में करीब दो किलो मिठाई तैयार की जाती थी। मैदा, देसी घी और बादाम के पेस्ट से बनने वाली इस मिठाई का स्वाद लोगों को इतना पसंद आया कि धीरे-धीरे इसकी मांग बढ़ती गई। आज इस परंपरा की छठी पीढ़ी भी मिठाई के कारोबार से जुड़ी हुई है। गांधी चौक में नर्सिंग मंदिर के सामने स्थित पुरानी दुकान इस विरासत की गवाह है। अब दौसा में अनेक प्रतिष्ठानों पर डोवठा की बिक्री हो रही है।
सत्येन्द्र खंडेलवाल ने बताया कि उनके पिता के अनुसार करीब 45 साल पहले इसकी कीमत 14 रुपए प्रति किलो थी। वहीं, उनके खुद के समय 150 रुपए किलो तक बिकने वाला डोवठा अब गुणवत्ता और लागत के अनुसार करीब 500 से 550 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गया है। डोवठे की लोकप्रियता का असर ऐसा रहा कि इस मिठाई ने एक परिवार को अलग पहचान दिला दी। मिठाई के नाम से ही लोग परिवार को पहचानने लगे। यह सिर्फ कारोबार नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक विरासत है।
सचिन खंडेलवाल ने बताया कि डोवठे की खासियत इसकी निर्माण प्रक्रिया और सामग्री है। इसमें देसी घी, बादाम का आटा, मैदा और चीनी का इस्तेमाल किया जाता है। सही तरीके से तैयार करने पर यह करीब 20 दिन तक खराब नहीं होता। दौसा के जौहरी और व्यापारी भी इसे अपने साथ दूसरे शहरों में ले जाते हैं। दौसा निवासी व उनके रिश्तेदार जापान, हांगकांग और बैंकॉक तक भी इसे मंगवा रहे हैं। इस तरह दौसा की पारंपरिक मिठाई ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनाई है। मिठाई कारोबारी रामजीलाल खंडेलवाल व सत्यप्रकाश खंडेलवाल ने बताया कि अब इसकी पैकिंग और साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिए जाने से जयपुर सहित अन्य शहरों में भी इसकी बिक्री बढ़ रही है।