दौसा

दादा ने बुना लाल किले के लिए पहला तिरंगा, बेटा-पोता दिल्ली में करते हैं मजदूरी, जानें आलूदा के बुनकर परिवारों की दास्तां

First Red Fort Tiranga Maker Family: उनके बेटे व पोते में से एकाध को छोड़ लगभग सभी ने कपड़ा बुनाई से रिश्ता तोड़ लिया। वे रंगाई- पुताई और अन्य मजदूरी कर रहे हैं।

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Aug 15, 2025
फोटो: पत्रिका

Independence Day Special: आजादी के बाद 15 अगस्त 1947 को दिल्ली में लाल किले की प्राचीर पर फहराए गए तिरंगे के लिए कपड़ा आलूदा (दौसा) गांव के चौथमल, रामसहाय व नानकराम महावर ने तैयार किया। इन भाइयों का न कभी सम्मान हुआ और न परिवार को आर्थिक प्रोत्साहन। बेेटे-पोते मजदूरी कर पेट पाल रहे हैं। खादी संस्थाओं से भी इन परिवारों को प्रोत्साहन नहीं मिला, यही वजह है आज आलूदा में गिनती के परिवार ही कपड़ा बुन रहे हैं।

राजस्थान पत्रिका चौथमल, रामसहाय और नानकराम महावर के परिवारों का हाल जानने आलूदा पहुंचा। पूछताछ में सामने आया, उनके बेटे व पोते में से एकाध को छोड़ लगभग सभी ने कपड़ा बुनाई से रिश्ता तोड़ लिया। वे रंगाई- पुताई और अन्य मजदूरी कर रहे हैं। महिलाएं चरखा चलाकर सूत कातती है, पर उस कमाई से घर नहीं चलता।

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तब 30 बुनकर थे…

आजादी के समय गांव में महावर समाज के हर घर में कपड़ा बुना जाता था। इससे 30 से अधिक परिवारों की रोजी रोटी चलती थी। ये बुनकर अपने हाथ से तैयार कपड़ा दौसा खादी समिति लाते और समिति उसे बाहर भेजती। आजादी के समय तिरंगे का कपड़ा दौसा खादी समिति के माध्यम से ही गया। अब प्रोत्साहन नहीं मिलने से गांव में 10 से भी कम परिवार कपड़ाबुनाई करते हैं।

चौथमल के परिवार में बहू गीता देवी (फोटो: पत्रिका)

नहीं मिला सहारा

आलूदा के पूर्व सरपंच जुगल किशोर मीना ने कहा, सरकार या खादी विभाग का सहयोग मिलता तो बुनकर परिवारों की दशा सुधर सकती थी।

सहारा नहीं मिल रहा

नानगराम का भतीजा तुलसाराम महावर (फोटो: पत्रिका)

परिवार को सहारा नहीं मिल रहा। इससे आर्थिक स्थिति कमजोर है। अब चरखे को सरकारी सहयोग का इंतजार है।
नवरत्न महावर

(रामसहाय महावर के पुत्र)

महिलाएं संभाल रहीं

नवरत्न महावर, पुत्र रामसहाय महावर (फोटो: पत्रिका)

परिवार के पुरुषों ने मजदूरी को अपना लिया। इसी से घर का गुजारा हो रहा है। अब परिवार की कुछ महिलाएं ही चरखा चलाती हैं।
तुलसाराम महावर(नानगराम के भतीजा)

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