धमतरी

विश्व हाथी दिवस: 1987 में झारखंड के रास्ते आया था पहला हाथी, अब 400+ का कुनबा, ‘एलीफेंट रेस्टोरेंट’ में मिलेगा पसंदीदा भोजन

Chhattisgarh Elephant Population: विश्व हाथी दिवस के मौके पर छत्तीसगढ़ से गजराजों को लेकर अच्छी खबर सामने आई है। करीब 40 साल पहले 1987 में झारखंड के रास्ते प्रदेश में पहला हाथी पहुंचा था।
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Aug 12, 2026
Chhattisgarh Elephant Corridor
विश्व हाथी दिवस आज (फोटो सोर्स- AI)

World Elephant Day 2026: झारखंड का पारंपरिक रास्ता छोड़ ओडिसा के नए कॉरिडोर से छत्तीसगढ़ में दाखिल हो रहे गजराज अब उन जंगलों को अपना स्थाई रहवास बना रहे, जहां कुछ साल पहले उनका नामोनिशान नहीं था। धमतरी-गरियाबंद जिले को जोडक़र बनाए गए उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व मेहमान हाथियों का ठिकाना बन चुका है। 5 साल पहले तक यहां एक भी हाथी नहीं थे। आज सिकासेर दल के 33 और कुलापा दल के 7 हाथी विचरण कर रहे हैं। 40 हाथियों की मौजूदगी वन संरक्षण की दिशा में बड़ी कामयाबी मानी जा रही है। हालांकि इससे मानव-हाथी द्वंद का भी खतरा बढ़ा है।

इधर इस चुनौती से निपटने के लिए वन विभाग ने टाइगर रिजर्व क्षेत्र में एलीफेंट रेस्टोरेंट तैयार किया है। इस रेस्टोरेंट (आसपास का क्षेत्र) में हाथी के सबसे प्रिय मोदे, बांस, तेंदू, चार-चिरौंजी आदि के पौधे लगाए गए हैं। अब तक 700 से अधिक पौधे लगाए जा चुके हैं। जंगलों में भोजन और सुरक्षित आवागमन के लिए नए कॉरिडोर भी बन चुके हैं।

उदंती सीतानदी टाइगर रिवर्ज क्षेत्र के उपनिदेशक वरूण जैन ने बताया कि हाथियों को भोजन की तलाश में मानव बस्तियों की ओर जाने से रोकने के लिए उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में विशेष कार्ययोजना के तहत ‘एलीफेंट रेस्टोरेंट’ तैयार किया गया है। यहां हाथियों की पसंद के पेड़-पौधे लगाए गए हैं। हाथी जंगल के विस्तार में भी अहम भूमिका निभाते हैं। वे वनस्पतियों के बीज खाते हैं और उनके मल के साथ बीज दूर-दूर तक पहुंचते हैं। हाथी के पाचन तंत्र से गुजरने के बाद निकलने वाले बीज अधिक स्वस्थ माने जाते हैं। इन बीजों के प्राकृतिक प्रसार से जंगल में हरियाली बढ़ाने में भी मदद मिल रही है।

‘एलीफेंट अलर्ट एप’ बना ग्रामीणों की ढाल

मानव-हाथी द्वंद्व कम करने के लिए वन विभाग तकनीक का भी सहारा ले रहा है। उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में ‘एलीफेंट अलर्ट एप’ के जरिए हाथियों की गतिविधियों की निगरानी की जा रही है। इस एप से 15 हजार से अधिक ग्रामीण, अधिकारी और हाथी मित्र दल के सदस्य जुड़े हैं। हाथियों की बढ़ती संख्या केवल वन्यजीव संरक्षण की उपलब्धि नहीं, बल्कि जंगल के प्राकृतिक विस्तार का संकेत भी है। चुनौती अब इस बढ़ती आबादी और मानव बस्तियों के बीच सुरक्षित दूरी बनाए रखने की है। जंगल में भोजन, पानी और सुरक्षित कॉरिडोर उपलब्ध कराने के साथ ग्रामीणों को समय रहते सतर्क करना ही मानव-हाथी द्वंद्व कम करने की सबसे बड़ी कुंजी बन सकता है।

पांच साल में शून्य से 40 हाथियों तक पहुंचा कुनबा

1842 वर्ग किलोमीटर में फैले उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में हाथियों की बढ़ती मौजूदगी के पीछे जंगल को अतिक्रमण से मुक्त करना भी प्रमुख कारण माना जा रहा है। तोरेंगा हाथियों का प्रमुख कॉरिडोर है, जबकि कुल्हाड़ीघाट और अरसीकन्हा प्रमुख रहवास क्षेत्र हैं। बाघों की आमद के बाद कुलापा हाथी दल पहली बार रिजर्व के उत्तर-दक्षिण क्षेत्र में भी पहुंचा है। वन विभाग का अनुमान है कि आने वाले पांच वर्षों में हाथियों का विस्तार बस्तर क्षेत्र तक हो सकता है। रिजर्व में पिछले पांच वर्षों में एक हाथी की मौत हुई है, जबकि तीन वर्षों में हाथी के हमले से एक जनहानि दर्ज हुई है।

प्रदेश में 15 साल में ढाई गुना बढ़ी संख्या

करीब 15 वर्ष पहले छत्तीसगढ़ में हाथियों की संख्या 140 से 150 के बीच थी, जो अब बढक़र करीब 400 से अधिक हो गई है। हाथियों की बढ़ती संख्या को वन्यजीव संरक्षण की दृष्टि से सकारात्मक बदलाव माना जा रहा है। दूसरी ओर हाथियों ने प्रदेश में तीन नए कॉरिडोर भी विकसित कर लिए हैं। इससे स्पष्ट है कि भोजन और सुरक्षित आवागमन की तलाश में हाथी पारंपरिक जंगलों से बाहर नए इलाकों की ओर बढ़ रहे हैं।

पांडुका-मगरलोड से धमतरी तक हाथियों की राह

यूएसटीआर के डीएफओ वरूण जैन ने बताया कि धमतरी वन मंडल में हाथियों के आवागमन का प्रमुख मार्ग पांडुका से मगरलोड, उत्तर सिंगपुर, केरेगांव होते हुए धमतरी तक है। धमतरी जिले में करीब दो लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र है। धमतरी वन मंडल 1.60 लाख हेक्टेयर में फैला है। जैसे-जैसे उनका समुदाय बढ़ता है, वे नए क्षेत्र और भोजन की तलाश में आगे बढ़ते हैं। हाथियों के दल की अगुवाई सामान्यत: मादा हाथी करती है।

Updated on:
12 Aug 2026 12:43 pm
Published on:
12 Aug 2026 12:43 pm