
Shardiya Navratra : शारदीय नवरात्रि पास आ चुकी है। 11 अक्टूबर से इसकी शुरुआत होगी। नवरात्र के 9 दिनों में मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की पूजा की जाती है। छठे दिन मां की स्वरूप माता कात्यायनी की पूजा का विधान है। वे महर्षि कात्यायन की पुत्री है जिसके कारण उनका नामकरण हुआ। जब महिषासुर का अत्याचार बहुत बढ़ गया तो उसके नाश के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने अपने सम्मिलित तेज से देवी कात्यायनी को उत्पन्न किया था। माता ने उसका वध कर संसार को भयमुक्त बनाया। विशेष बात यह है कि सुखद प्रेम व दांपत्य संबंधों के लिए माता कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं। उनकी पूजा से विवाह संबंधी बाधाएं समाप्त हो जाती हैं
ज्योतिषाचार्य पंडित सोमेश परसाई बताते हैं कि मां कात्यायनी का दिव्य स्वरूप है। उनकी चार भुजाएं हैं। मां के एक हाथ में तलवार है व एक अन्य हाथ में कमल का फूल रहता है। माता कात्यायनी का ऊपर वाला एक हाथ अभयमुद्रा में रहता है जबकि नीचे वाला एक हाथ वर मुद्रा में रहता है। वे सिंह पर सवार रहती हैं।
वर्तमान युग में मां कात्यायनी का सर्वाधिक महत्व है। धर्माचार्य और ज्योतिषाचार्य पंडित नरेंद्र नागर इसकी वजह भी बताते हैं। वे कहते हैं कि यह वैज्ञानिक युग है और मां कात्यायनी विज्ञान-शोध की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। शोधकार्य इनका प्रमुख गुण है। इसीलिए खासतौर पर विज्ञान के छात्रों को माता कात्यायनी की उपासना जरूर करना चाहिए। वे अपने सच्चे उपासक को परम पद दे देती हैं।
विशेष बात यह है कि मां कात्यायनी बहुत प्रेमल हैं। वे दांपत्य व प्रेम संबंधों में परस्पर प्यार बढ़ाती हैं। पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका का मिलन कराती हैं। कात्यायनी माता की पूजा से विवाह में आ रहीं सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं। यही कारण है कि वे वैवाहिक संबंधों के लिए भी अधिष्ठात्री देवी मानी गई हैं। कृष्ण को पति के रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने यमुना तट पर माता कात्यायनी की ही आराधना की थी। इसी वजह से ब्रजभूमि में वे सर्वाधिक पूजनीय हैं।
1.
या देवी सर्वभूतेषु मां कात्यायनी रूपेण संस्थिता
नमस्तमै, नमस्तमै, नमस्तमै नमो नम:
2.
मंत्र - ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥
3.
मंत्र - 'ॐ ह्रीं नम:।।
4.
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानव-घातिनी॥