
Pitru Paksha Shanichari Amavasya: पितृपक्ष अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुका है। पितरों की आत्मा की शांति, तृप्ति और आशीर्वाद के लिए सर्व पितृ अमावस्या का दिन बेहद पुण्यदायी माना जाता है। इस वर्ष यह पर्व 10 अक्टूबर को मनाया जाएगा। अमावस्या शनिवार को पड़ने से शनिश्चरी अमावस्या का योग बन रहा है। वहीं सूर्य के कन्या राशि में गोचर के दौरान गजछाया योग भी बन रहा है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार यह संयोग पितृ तर्पण और दान-पुण्य के लिए बेहद फलदायी है।
ज्योतिषाचार्य जनार्दन शुक्ला के अनुसार सर्व पितृ अमावस्या पर उन पितरों का तर्पण, पार्वण और पिंडदान किया जाता है, जिनकी मृत्यु की तिथि याद न हो या जो अज्ञात हों। सात अक्टूबर को आश्विन कृष्ण द्वादशी तिथि पर संन्यासी पितरों का श्राद्ध होगा, जो रात 11:17 बजे तक रहेगी। 8 अक्टूबर को त्रयोदशी तिथि रात 10:17 बजे तक रहेगी। 9 अक्टूबर को चतुर्दशी तिथि रात 9:36 बजे तक रहेगी। इस दिन शस्त्र, विष या दुर्घटना में असमय मृत्यु को प्राप्त हुए परिजनों का श्राद्ध किया जाएगा।
ज्योतिषाचार्य के अनुसार 10 अक्टूबर को सूर्योदय से सूर्यास्त तक गजछाया योग रहेगा। यह योग आश्विन कृष्ण पक्ष में सूर्य के हस्त नक्षत्र और चंद्रमा के मघा नक्षत्र में होने पर बनता है। इस दौरान तीर्थ श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण से पितरों को अक्षय तृप्ति मिलने की मान्यता है। शनैश्चरी अमावस्या का संयोग शनिदोष से मुक्ति के लिए भी शुभ माना गया है।
अमावस्या तिथि 9 अक्टूबर रात 9:35 बजे से 10 अक्टूबर रात 09:19 बजे तक रहेगी। तर्पण के लिए सुबह 6:31 से 8 बजे तक और 9:30 से 10:59 बजे तक शुभ चौघड़िया रहेगा। दोपहर 11:45 से 12:31 बजे तक अभिजीत मुहूर्त रहेगा। ज्योतिर्विदों के अनुसार शाम को मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके सरसों के तेल का दीपक जलाना चाहिए। पीपल के नीचे जल अर्पित कर दीपदान करने के साथ गाय, कुत्ते, कौए, देव और चींटियों के लिए पंचबलि निकालने की भी परंपरा है।
सर्वपितृ अमावस्या पर चकराघाट पर बड़ी संख्या श्रद्धालु पहुंचेंगे। लोग स्नान के बाद पितरों के निमित्त तर्पण और पिंडदान करेंगे। कई परिवार घरों में भी श्रद्ध कर्म करेंगे। पितरों की पसंद के अनुसार भोजन तैयार कर भोग लगाने, ब्राह्मण भोजन कराने और जरूरतमंदों को अन्न-वस्त्र सहित अन्य सामग्री दान करने की परंपरा भी निभाई जाएगी। पं. रघु शास्त्री ने बताया कि पितृपक्ष के दौरान कई परिवार प्रतिदिन पितरों के निमित्त जल और काले तिल अर्पित करते हैं। अमावस्या पर इस परंपरा का समापन किया जाता है। परिवार के सदस्य पितरों का स्मरण कर उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं व सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
शनि कृपाः धार्मिक मान्यता के अनुसार शनिदेव की पूजा से शनि दोष, साढ़े साती और ढैय्या के कष्ट कम होते हैं।
पितृ तृप्तिः अमावस्या पितरों को समर्पित मानी जाती है। इस दिन तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध करने की परंपरा है।
पाप मुक्तिः स्नान, दान, जप और तप को पुण्यकारी माना गया है।