
God Throne : सनातन धर्म में मान्यता है कि ईश्वर कण-कण में व्याप्त है। हालांकि इसके साथ ही घर के पूजा स्थल पर भगवान का सिंहासन रखने या उनकी मूर्तियां रखने, तस्वीर लगाने के लिए कुछ विधान भी बताए गए हैं। मंदिरों में भी भगवान की प्रतिमाएं स्थापित करने के नियम हैं। वास्तुग्रंथों में इस संबंध में विस्तार से जानकारी दी गई है। सभी धर्म ग्रंथों, शास्त्रों में पूजा घर के लिए पूर्व और उत्तर पूर्व की दिशा शुभ बताई गई है। वास्तु शास्त्र के मुताबिक उत्तर-पूर्व को ईशान कोण बताया गया है। यहां भगवान का सिंहासन रखना सर्वाधिक शुभफलदायक होता है।
ज्योतिषाचार्य पंडित सोमेश परसाई बताते हैं कि जैसे मंदिरों में भगवान की प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा करने के पूर्व अनेक नियमों का पालन जरूरी है वैसा ही विधान घर के पूजा स्थलों का भी है। वास्तु शास्त्र और सनातन धर्म के सभी प्राचीन ग्रंथों में पूजा घर की दिशा और उनकी मूर्तियों की स्थापना के संबंध में विस्तृत वर्णन दिया गया है।
पारंपरिक वास्तु ग्रंथों में गृह पारिजातम (Griha Parijatam), मयमतम् (Mayamatam) और विश्वकर्म प्रकाश (Vishwakarma Prakash) का नाम उल्लेखनीय है। इन सभी ग्रंथों में घर के पूजा स्थल या भगवान का सिंहासन हमेशा उत्तर-पूर्व दिशा यानि ईशान कोण में रखना सबसे उत्तम और शुभ बताया गया है। मान्यता है कि इस दिशा से ही सूर्य की पहली किरणें प्रवेश करती हैं।
वास्तु विद पंडित रत्नेश पाराशर बताते हैं कि ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) दरअसल देवताओं का स्थान माना गया है। यह दिशा सकारात्मक ऊर्जा से भरी रहती है। यही कारण है कि पौराणिक ग्रंथों और वास्तु शास्त्र में मंदिरों और घरों में ईशान दिशा में ही भगवान स्थापित करने का महत्व प्रतिपादित किया गया है। इस दिशा को पूजा-पाठ के साथ ही ध्यान यानि मेडिटेशन और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त करने का प्रमुख केंद्र माना गया है।
ज्योतिषाचार्य और वास्तु शास्त्री पंडित अरुण बुचके के अनुसार पूजा स्थल पर भगवान की मूर्ति या सिंहासन को इस प्रकार रखना चाहिए कि उनका मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर हो। यानी पूजा घर की पश्चिम दिशा या दक्षिण दिशा की तरफ उनकी पीठ हो। ऐसी स्थिति में भगवान का मुख पूर्व या उत्तर की ओर होगा जोकि शास्त्रोक्त विधान है।