Scarecrow : राजस्थान के हर मौसम में खेतों में किसानों का साथी ‘बिजूका’ डटा रहता है। कौन है बिजूका? जानिए बिजूका (Scarecrow) का इतिहास।
Scarecrow : चाहे रबी की फसल हो या जायद, खरीफ की फसल, खेतों में हर पल हर मौसम में कृषकों का सच्चा साथी पहरेदार के रूप में डटा रहता है, जो फसल को परिंदों और जानवरों से बचाता है। यहां बात चल रही है ‘बिजूका’ की। इसे खेतों में फसल के बीच और मेड़ पर तैनात किया जाता रहा है।
किसान सालभर मेहनत करके अपने खेतों में फसल उगाते हैं। पर, कई बार जंगली जानवर या पक्षी उनके खेतों में पहुंच जाते हैं और फसल को खाकर बर्बाद कर देते हैं। जब खेत हरे-भरे होते हैं तो बिजूका फसलों के रक्षक के रूप में खड़ा रहता है। किसान खेतों की सुरक्षा के लिए फैंसिंग की जगह बिजूका का उपयोग कर करते हैं। खेतों की सुरक्षा का यह परंपरागत उपाय आज भी खेतों में नजर आ जाता है। बिजूका को इंसान की शक्ल देने के लिए देशी जुगाड़ का उपयोग किया जाता है।
बिजूका एक देशी जुगाड़ है, जो एक मानवरूपी पुतला होता है। इसका इस्तेमाल किसान अपने खेतों में करते हैं। बिजूका के कारण जानवर और पक्षी खेतों से दूर रहते हैं। किसान अपने हाथ से बनाए एक मानव जैसा दिखनेवाले पुतले को खेतों के बीच व मेड़ पर खड़ा कर देते है। किसान लकड़ी, काली हांडी तथा कई जगह पॉलीथिन का प्रयोग करके आदमी की आकृति दे देते हैं, जो कि दूर से देखने पर ऐसी लगती है मानों दूर खेत में कोई इंसान खड़ा हो। पुराना मटका, पुराने कपड़े और दो लकड़ियों के सहारे बिजूका तैयार हो जाता है, जो किसानों को काफी सस्ता पड़ता है।
इससे किसान की अनुपस्थिति में भी जानवर खेत में आने से डरते है। खेतों में लकड़ी में प्लास्टिक के कट्टे डालकर जगह-जगह रोप देने का भी जुगाड़ शुरू किया गया है। कही-कही म्यूजिक सिस्टम, तो कई जगह हेलोजन लाइट से तेज प्रकाश रात्रि में डाला जा रहा है। रस्सी पर खाली बोतलें लगाकर हवा चलने पर इनके आपस में टकरा कर हुई आवाज से पक्षियों और जानवरों को डराने के जुगाड़ भी किए जा रहे हैं।
हरे-भरे खेतों में खड़े बिजूका केवल भूसे और पुराने कपड़ों का ढांचा नहीं। बल्कि, किसानों का सच्चा साथी और उनकी उम्मीदों का प्रतीक है। यह हमारे खेतों में फसलों को जीवन का वरदान देता है।
मोगजी पाटीदार, संभाग उपाध्यक्ष भारतीय किसान संघ
1- प्राचीन मिस्र (लगभग 2500 ईसा पूर्व) : नील नदी के किनारे गेहूं के खेतों को चिड़ियों से बचाने के लिए लकड़ी के तख्ते और जालों का इस्तेमाल किया जाता था, जो शुरुआती बिजूका थे।
2- प्राचीन ग्रीस और रोम : यूनानी किसान प्रजनन देवता प्रियापस की लकड़ी की मूर्तियां खेतों में लगाते थे, जो पक्षियों को डराने के साथ- साथ फसल को आशीर्वाद भी देती थीं। रोमनों ने इस प्रथा को आगे बढ़ाया।
3- जापान : चावल के खेतों में काकाशी नामक बिजूका बनाए जाते थे, जिनमें रेनकोट और टोपियां पहनाई जाती थीं।
4- मध्यकाल यूरोप : बच्चों को पक्षियों से फसल बचाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। प्लेग के बाद बच्चों की कमी होने पर, भूसे से भरे पुराने कपड़ों और लौकी या शलजम के सिर वाले बिजूका बनाए जाने लगे, जो बुगीमैन जैसे डरावने लगते थे।
5- अमेरिका : यूरोपीय अप्रवासी अपने साथ बिजूका की अवधारणा लेकर आए। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कीटनाशकों के आने से इनका उपयोग कम हुआ, लेकिन ये हैलोवीन और पतझड़ की सजावट के रूप में लोकप्रिय हो गए।
6-भारत : भारतीय किसान भी सदियों से अपने खेतों में मोर, कौवे और नीलगाय जैसे जानवरों से फसलों की रक्षा के लिए बिजूका (पुतला) लगाते आए हैं, जो ग्रामीण कला और संस्कृति का प्रतीक हैं।