दुर्ग जिले में जेवरा सिरसा एक ऐसा गांव है जहां भाई-बहन के पवित्र रिश्ते और स्नेह का प्रतीक मंदिर स्थापित है।
निर्मल साहू @ दुर्ग . देश के हर शहर व गांव में जगह-जगह और विभिन्न देवी-देवताओं के मंदिर हैं मगर दुर्ग जिले में जेवरा सिरसा एक ऐसा गांव है जहां भाई-बहन के पवित्र रिश्ते और स्नेह का प्रतीक मंदिर स्थापित है। यहां भाई-बहन की शिलाओं की पूजा होती है। रक्षाबंधन पर विशेष तौर पर युवतियां व महिलाएं यहां रक्षा सूत्र समर्पित करती हैं।
दुर्ग जिला मुख्यालय से महज दस किलोमीटर दूर ग्राम जेवरा- सिरसा में साजा राउत देवालय है। यहां भाई का और करीब पांच सौ मीटर की दूरी पर बहन की शिला स्थापित है। भाई बहन का यह मंदिर अंचल में आस्था का केंद्र है। इस मंदिर की लोकमान्यता के विषय में अंचल के भगवताचार्य पंडित मनोज पांडेय बताते हैं कि ग्राम सिरसा के साजा राउत (यादव) नाम का एक किसान खेत में हल जोत रहा था। रोज उनकी पत्नी खाना लेकर खेत जाती थी। एक दिन घर में अचानक मेहमान आ गए। किसान की पत्नी ने एक बर्तन में बासी और बरी की सब्जी देकर अपनी ननद को भेज दिया। इधर गर्मी से बेहाल किसान निर्वस्त्र होकर हल जोत रहा था। अचानक उनकी नजर खाना लेकर आ रहीं बहन पर पड़ी। खेत में कहीं ओट नहीं था जिससे कि वे अपनी मर्यादा ढंक सके। भाई-बहन के पवित्र रिश्ते की अस्मिता बनाए रखने उन्होंने मन ही मन भगवान से प्रार्थना करनी शुरू कर दी कि मुझ पर बहन की नजर पड़े इससे पहले मुझे पत्थर बना दे। इधर ऐसी ही विकट स्थिति बहन की थी। उन्होंने भी लोक मर्यादा की वजह से भगवान से प्रार्थना की कि अगर भाई-बहन का उनका प्यार सच्चा है तो उन्हें पत्थर बना दे। भगवान ने उनकी विनती स्वीकार कर ली और दोनों देखते-देखते पत्थर के बन गए। कुछ भाग धरती में समा गए और कुछ जमीन के ऊपर रह गया। तब से आज भी गांव के रामप्रसाद पटेल के बियारा में बहन पत्थरवत है और मंदिर में उनका भाई। बहन के सिर पर बर्तन और पत्थर के टुकड़े के रूप में बरी की आकृति आज भी है।
बेटी जन्म की मन्नतें लेकर यहां आते हैं लोग
जहां आज भी समाज में बेटे की चाह में रोज सैंकड़ों बेटियां कोख में ही मार दी जा रही हैं, वहीं गांव के इस मंदिर में लोग बेटी की चाह की मन्नतें लेकर आते हैं। विशेष तौर पर जिस घर में बेटियां नहीं होती, ऐसे माता-पिता रक्षाबंधन पर भाई की कलाई सुनी न रहे इसलिए बेटी जन्म की मनौती मांगते हैं। बेटी के विवाह को लेकर चिंतित पालकों की मुरादें भी यहां पूरी होती है।
ग्रामीण देवता के रूप में पूजे जाते हैं भाई-बहन
यह शिला कब से स्थापित है और आस्था के रूप में पूजे जा रहे हैं यह गांव के बड़े-बुजुर्गांे को भी नहीं मालूम। डॉ. राघवेंद्र राज बताते हैं कि लोग 200 साल पुराना कहते हैं मगर सही जानकारी किसी को नहीं है। अपने बुजुर्गों को शिला की पूजा करते देखते आ रहे हैं। उसी परंपरा का निर्वहन हर आने वाली पीढ़ी कर रही है। अब तो यह ग्रामीण देवता के रूप में भी स्थापित हो चुका है। मन्नतें पूरी होने के रूप में भी इस पवित्र मंदिर की ख्याति बढ़ती जा रही है।