साल भर बाद भी गड्ढों को पाटना तो दूर संबंधित विभाग के अफसर जिले में खतरे वाले कितने गड्ढे हैं, इसका भी पता नहीं लगा पाए।
दुर्ग. खदानों के खुले गड्ढों में डूबने से हर साल मौतें होती है। ऐसे गड्ढों को पिछले साल पाटने का निर्णय लिया गया था। साल भर बाद भी गड्ढों को पाटना तो दूर संबंधित विभाग के अफसर जिले में खतरे वाले कितने गड्ढे हैं, इसका भी पता नहीं लगा पाए।
अब जिम्मेदार अफसर यह सफाई दे रहे हैं कि पाटने का प्रस्ताव मंजूरी के लिए पर्यावरण विभाग को भेजा गया है। वहां से मंजूरी नहीं मिली है। जबकि इस साल बारिश में खदानों के गड्ढे फिर भर गए हैं और खतरा बढ़ गया है।
खनिज अधिनियम में खदानों में निश्चित गहराई तक खुदाई के साथ गड्ढों को भरे जाने का भी प्रावधान है। जिले में इसका पालन नहीं हो रहा है। इस कारण हर खदान क्षेत्र में सैकड़ों खतरनाक गड्ढें हो गए हैं। ये गड्ढे मौत के कारण बन रहे हैं। पिछले साल राजनांदगांव के मनगटा में ऐसे ही गड्ढे में डूबने से भिलाई के दो मासूमों की मौत हो गई थी।
इसके बाद पत्रिका ने जिले में इसी तरह के गड्ढों में गिरने से मौतों के मामलों का खुलासा करते हुए समाचार प्रकाशित किया था। इसके बाद प्रशासन ने गड्ढों का सर्वे कर भरवाने का निर्णय लिया था।
राज्य शासन की ओर से गौण खनिज अधिनियम के तहत सरकारी व निजी जमीन पर खनिज निकासी के लिए लीज स्वीकृत किया जाता है। इसके लिए शासन व लीजधारी के बीच अनुबंध कराया जाता है। इस अनुबंध में निर्धारित सीमा तक खुदाई के साथ गड्ढे को भरने की भी शर्त है।
गड्ढा नहीं भरे जाने पर लीजधारी से इसके एवज में वसूली का भी प्रावधान है। पत्थर के खनन के लिए अधिकतम 10 मीटर और मुरुम के लिए 7 मीटर गहराई तक खुदाई का नियम हैं। इस नियम का पालन भी अधिकारी नहीं कराते हैं।
हर जगह खुले गड्ढे
जिले में धमधा के पथरिया, नंदिनी अहिवारा, पाटन के सेलूद, पतोरा, चुनकट्टा, मुड़पार, छाटा, गुढिय़ारी, कानाकोट, परसाही, धौराभाठा, बेल्हारी इलाकों में चूना पत्थर की खदान है। नगपुरा, अंजोरा, ढाबा, अंडा, जामुल, अहिवारा, गाड़ाडीह, अमलेश्वर में मुरुम खदान है।
खनिज विभाग के मुताबिक इस समय जिले में चूना पत्थर के 170 खदान चल रहे हैं। इसके अलावा करीब इतने ही खदान लीज समाप्त होने के कारण बंद हो चुके हैं। यही हाल मुरुम खदानों का भी है। खदानों के कई गड्ढों में पूरे साल पानी भरा रहता है।
खदानों के गड्ढों में डूबने के कारण चार साल में 7 लोगों की जान जा चुकी है। पिछले साल मनगटा में भिलाई के हर्षवर्धन वटाने और राहुल चौरसिया की मौत हो गई थी। कुटेलाभाठा में मुरुम खदान के खुले गड्ढे में सितंबर 2015 में कैम्प-एक वंृदानगर के बी रमेश और बी गणेश डूब गए थे।
भिलाई के गोकुलनगर में नवंबर 2016 को मुरुम की खुदाई के बाद छोड़े गए गड्ढे में डूबने से शास्त्री नगर तिरंगा चौक के गिरधर यादव (13) और हषवर्धन (13) की जान चली गई थी। वहीं जनवरी 2015 को भी भिलाई तीन के ग्राम अकलोरडीह में इसी तरह मुरुम के खदान में डूब जाने 12 साल के ललित विश्वकर्मा की मौत हो गई थी।
इस घटना के महीनेभर पहले नेवई में भी 16 साल के केशव सतनामी की मौत हुई थी। खदानों के खुले गड्ढों से सर्वाधिक खतरा बारिश के दिनों में रहता है। बारिश में ये गड्ढे लबालब हो जाते हैं। ऐसे में गहराई का पता नहीं चलता और लोग नहानें उतर जाते हैं। इंसानों के अलावा मवेशियों को भी ऐसे गड्ढों से खतरा रहता है। गड्ढे नहीं पाटे जाने से इस बारिश में भी खतरा बरकरार रहेगा।
ऐसे चलता है खेल
खदानों के खतरनाक गड्ढों के भरने से बचने के लिए निस्तारी व सिंचाई उपयोग के नाम पर खेल किया रहा है। जानकारों की माने तो ठेकेदार संबंधित पंचायतों से खदानों के गड्ढों का उपयोग निस्तारी तालाब अथवा सिंचाई के लिए किए जाने संबंधी प्रस्ताव पारित करवा लेते हैं।
खनिज अधिकारी एचके मारवाह ने बताया कि खदानों के गड्ढों को भरने का प्रपोजल है। कुछ कंपनियों ने फ्लाइ ऐश डालने का प्रस्ताव दिया था। इसके लिए तीन खदानों के गड्ढों का प्रस्ताव पर्यावरण विभाग को भेजा भी गया था।अनुमति नहीं मिली है। इसलिए फिलहाल काम आगे नहीं बढ़ पाया है।