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Durgesh Ojha: जिसने कभी 5 रुपये में सिले शर्ट-ब्लाउज, आज टेक कंपनी का है मालिक

Durgesh Ojha Success Story: गुना के एक दर्जी से टेक कंपनी के फाउंडर बनने तक दुर्गेश ओझा का सफर अपको सोचने पर मजबूर कर देगा। 5 रुपये की सिलाई से शुरू हुआ यह सफर आज 5 लाख प्रति माह की कमाई तक पहुंच गया है। लगातार मेहनत और सीखने की इच्छा ने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया।

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Apr 22, 2026
Durgesh Ojha Hybrid Internet Founder (Patrika)

Durgesh Ojha Hybrid Internet Founder Success Story: हौसले बुलंद और इरादे नेक, तो गरीबी की बेड़ियां भी आपको आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती। मध्य प्रदेश के गुना जिले के रहने वाले 36 साल के दुर्गेश ओझा की कहानी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। गरीब परिवार में जन्मे दुर्गेश, जिन्होंने बचपन में गुजारे के लिए 5 रुपये में शर्ट सिलने का काम किया, आज 'हाइब्रिड इंटरनेट' (Hybrid Internet) जैसी सफल टेक कंपनी के मालिक हैं। उनकी कंपनी आज देश के उन दुर्गम इलाकों में इंटरनेट पहुंचा रही है, जहां नेटवर्क का पहुंचना नामुमकिन माना जाता था।

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टेलरिंग से शुरू हुआ सफर

दुर्गेश का बचपन बहुत अभावों में बीता। उनके पिता एक कारपेंटर थे और संसाधनों की कमी थी। पांचवीं क्लास में टीवी देखने के लालच में वे पड़ोस के एक टेलर की दुकान पर जाने लगे, जहां उन्होंने बटन टाकना और काज बनाना सीखा। 10वीं क्लास तक आते-आते वे पूरी शर्ट, पैंट और ब्लाउज सिलना सीख गए थे। दुर्गेश बताते हैं कि तब वे एक शर्ट सिलने के 5 रुपये और पैंट के 10 रुपये कमाते थे। उनके लिए यह काम के साथ ही परिवार की मदद और सर्वाइवल की लड़ाई थी।

कंप्यूटर ने बदल दी जिंदगी

आठवीं कक्षा में दुर्गेश ने गुना के एक कंप्यूटर सेंटर में एडमिशन लिया। यह उनकी पहली ऐसी क्लास थी, जहां वे हमेशा समय पर पहुंचते थे। साल 2009 में उन्होंने अपने दोस्त के साथ मिलकर एक साइबर कैफे खोला, लेकिन फाइनेंशियल प्रॉब्लम्स के चलते वह एक साल में ही बंद हो गया। इस नाकामी के बाद वे नौकरी की तलाश में अहमदाबाद चले गए, जहां 7,500 रुपये की नौकरी से उन्होंने बिजनेस चलाने के गुर सीखे। दुर्गेश ने सिलाई करने के साथ ही अलग-अलग काम भी सीखे। एक कैमरा मैन के साथ जाकर उन्होंने फोटो और वीडियो शूट में मदद की। इससे उन्हें नई चीजों को सीखने का मौका मिला।

इंटरनेट बिजनेस से मिली सफलता

कुछ साल नौकरी करने के बाद 2012 में दुर्गेश वापस गुना आए और दोबारा बिजनेस शुरू किया। 2014 में उन्हें पता चला कि बिना तारों के (वायरलेस) भी इंटरनेट दिया जा सकता है। बस यहीं से उनकी कंपनी हाइब्रिड इंटरनेट की नींव पड़ी।

दुर्गेश बताते हैं, "बड़ी कंपनियां केबल के जरिए इंटरनेट देती हैं, लेकिन हमारा फोकस 'वायरलेस' पर है। इसी खूबी की वजह से हम मिजोरम, लद्दाख, अरुणाचल और जम्मू-कश्मीर जैसे उन पहाड़ी इलाकों में इंटरनेट पहुंचा पा रहे हैं, जहां फाइबर केबल बिछाना नामुमकिन है।"

लद्दाख के 300 अस्पतालों को जोड़ा

दुर्गेश की कंपनी ने पिछले साल नेशनल हेल्थ मिशन के तहत लद्दाख के 300 अस्पतालों में इंटरनेट पहुंचाने का विशाल प्रोजेक्ट पूरा किया। इनमें से 250 अस्पताल ऐसे थे, जहां पहली बार इंटरनेट पहुंचा है। इसके अलावा तवांग (अरुणाचल प्रदेश) के अनाथ आश्रमों में भी उनकी कंपनी ने नेटवर्क पहुंचाया है, जिससे वहां के बच्चे अब ऑनलाइन पढ़ाई कर पा रहे हैं।

आज मैं सफल हूं और काबिल भी

कभी चंद रुपयों के लिए मेहनत करने वाले दुर्गेश पिछले कुछ सालों से अपनी कंपनी से बतौर फाउंडर हर महीने 3 से 5 लाख रुपये की सैलरी ले रहे हैं। लेकिन, उनके लिए यह केवल पैसे कमाने की बात नहीं है।

दुर्गेश कहते हैं, "इंटरनेट ने मेरी जिंदगी बदल दी और आज मैं इस काबिल हूं कि दूर-दराज के गांवों में रहने वाले लोगों की जिंदगी बदल सकूं।" उनका यह सफर हर उस युवा के लिए मिसाल है, जो छोटे शहरों में रहकर बड़े सपने देखते हैं।

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