Lal Bahadur Shastri Death Anniversary 2026: लाल बहादुर शास्त्री की पुण्यतिथि हर साल 11 जनवरी को मनाई जाती है। शास्त्री जी की पुण्यतिथि के मौके पर जानिए उनके जीवन के कुछ अनसुने किस्से। कैसे लाल बहादुर श्रीवास्तव, श्रीवास्तव से शास्त्री बने और आखिर आज भी क्यों शास्त्री जी की मौत एक अनसुलझी पहेली है?
Lal Bahadur Shastri Death Anniversary 2026: भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जीवन संघर्ष, ईमानदारी और राष्ट्रप्रेम की एक अनुपम गाथा है। उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में जन्मे शास्त्री जी ने न केवल देश को स्वाधीनता दिलाने में अहम भूमिका निभाई, बल्कि आजाद भारत का मजबूत नेतृत्व भी किया। उनका जीवन आज भी ईमानदारी, त्याग और साहस की सीख देता है।
शास्त्री जी का जन्म उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में एक साधारण परिवार में हुआ था। उनका असली नाम लाल बहादुर श्रीवास्तव था। जब वे बहुत छोटे थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया। उनकी माता रामदुलारी देवी उन्हें लेकर अपने मायके चली गईं। शास्त्री जी का पालन-पोषण उनके नाना हजारी लालजी के घर हुआ। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। वाराणसी के हरिश्चंद्र हाई स्कूल में पढ़ाई के दौरान उनके गुरूजी निष्कामेश्वर प्रसाद मिश्र ने उनमें देशभक्ति की अलख जगाई।
गांधीजी के आह्वान पर शास्त्री जी मात्र 16 साल की उम्र में अपनी पढ़ाई छोड़कर स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े। हालांकि बाद में 1925 में उन्होंने काशी विद्यापीठ से दर्शनशास्त्र (Philosophy) और नैतिकता (Ethics) में प्रथम श्रेणी से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। उनकी विद्वत्ता को देखते हुए उन्हें 'शास्त्री' की उपाधि दी गई। यह विद्यापीठ द्वारा दी जाने वाली एक डिग्री थी, लेकिन उनकी सादगी और ज्ञान के कारण यह शब्द उनके नाम का ऐसा अटूट हिस्सा बना कि दुनिया उन्हें लाल बहादुर 'शास्त्री' के नाम से ही जानने लगी। आजादी की लड़ाई के लिए उन्होंने कई बार जेल की सजा भी काटनी पड़ी।
शास्त्री जी गांधीजी के विचारों से बहुत प्रभावित थे। प्रधानमंत्री होते हुए भी शास्त्री जी रेल की सेकेंड क्लास यात्रा को अपमान नहीं मानते थे। उनके पास न बंगला था, ना ही बैंक बैलेंस लेकिन भरोसा था कि इस देश के लोग उनका परिवार हैं और उन्हें देश के लिए कुछ कर गुजरना है। आजादी के बाद शास्त्री जी को उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री बनाया गया। परिवहन मंत्री के रूप में उन्होंने ही सबसे पहले महिला कंडक्टरों की नियुक्ति की शुरुआत की थी। केंद्र सरकार में रेल मंत्री रहते हुए उन्होंने ईमानदारी की ऐसी मिसाल पेश की जो आज के दौर में कम ही दिखती है। एक रेल दुर्घटना होने पर उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया, जो आज भी भारतीय राजनीति में शुचिता की बड़ी मिसाल है।
1964 में नेहरू जी के निधन के बाद वे देश के दूसरे प्रधानमंत्री बने। उनके कार्यकाल में ही 1965 में पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया। यही वो दौर था जब देश में अनाज की कमी और सीमा पर युद्ध के हालात बने हुए थे। तब शास्त्री जी ने जय जवान-जय किसान का नारा दिया, जिसने सैनिकों और किसानों, दोनों में जोश भर दिया। उनके नेतृत्व में भारतीय सेना ने पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी और धूल चटा दी।
युद्ध खत्म करने के बाद शांति बहाली 10 जनवरी, 1966 को शास्त्री जी रूस (वर्तमान के उज्बेकिस्तान) के ताशकंद शहर गए। वहां भारत और पाकिस्तान के बीच ऐतिहासिक समझौता हुआ। लेकिन उसके बाद कुछ ऐसा हुआ जो आज भी एक पहेली बनी हुई है। दरअसल समझौते के कुछ ही घंटों के बाद, 11 जनवरी की रात को खबर आई कि शास्त्री जी का आकस्मिक निधन हो गया है। उनकी मौत का कारण हार्ट अटैक बताया गया, लेकिन उनके परिवार और प्रशंसक आज भी इसे लेकर संदेह जताते हैं।