इस पूरे मुद्दे में जेनरेशन का फर्क भी साफ दिखता है। बेबी बूमर्स, यानी 1946 से 1964 के बीच जन्मे लोग, आज भी ऑफिस के बाद संपर्क को अहमियत और भरोसे की निशानी मानते हैं।
Right To Disconnect India: दुनिया भर में ऑफिस कर्मचारियों के अधिकार को लेकर बातें की जा रही हैं। साथ ही अलग-अलग देश अपने मुताबिक कानून भी बनाती है। 'Right To Disconnect’ की बात कई देशों में चरितार्थ भी हो रहा है। दुनिया भर में भले ही काम के बाद फोन और मैसेज से दूरी बनाने यानी 'राइट टू डिसकनेक्ट' की बात हो रही हो, लेकिन भारत में तस्वीर अभी बदली नहीं है। एक हालिया सर्वे बताता है कि भारत में हालात बिलकुल ही अलग हैं। कंपनियां मानती हैं कि काम और निजी जिंदगी की सीमा तय होनी चाहिए, लेकिन कर्मचारियों की रोजमर्रा की जिंदगी में ये सीमा कहीं दिखती नहीं। सर्वे के मुताबिक, भारत में हर 10 में से 9 कर्मचारी ऐसे हैं जिन्हें ऑफिस टाइम के बाद भी कॉल, मैसेज या ईमेल आते हैं। जॉब पोर्टल साइट 'Indeed' के सर्वे के मुताबिक करीब 85 फीसदी लोगों ने बताया कि मैनेजर उन्हें छुट्टी, पब्लिक हॉलिडे या यहां तक कि बीमार होने के दौरान भी कॉल,मैसेज करते हैं।
इस सर्वे में सामने आया कि 88 फीसदी कर्मचारी नियमित तौर पर ऑफिस के बाद भी संपर्क में रहते हैं। वहीं 79 फीसदी को डर है कि अगर उन्होंने फोन नहीं उठाया या तुरंत जवाब नहीं दिया, तो प्रमोशन रुक सकता है या उनकी छवि खराब हो सकती है। यानी ‘हमेशा उपलब्ध रहने’ की आदत अब मजबूरी बन चुकी है।
इस पूरे मुद्दे में जेनरेशन का फर्क भी साफ दिखता है। बेबी बूमर्स, यानी 1946 से 1964 के बीच जन्मे लोग, आज भी ऑफिस के बाद संपर्क को अहमियत और भरोसे की निशानी मानते हैं। सर्वे में 88 फीसदी बेबी बूमर्स ने कहा कि जब उन्हें काम के बाद कॉल आता है, तो उन्हें खुद को अहम महसूस होता है। इसके उलट Gen Z की सोच अलग है। 1997 से 2012 के बीच जन्मी ये पीढ़ी मानसिक सेहत और निजी समय को ज्यादा महत्व देती है। करीब आधे Gen Z कर्मचारियों को ही ऑफिस के बाद संपर्क अच्छा लगता है। वहीं 63 फीसदी ने साफ कहा कि अगर उनके 'राइट टू डिसकनेक्ट' का सम्मान नहीं हुआ, तो वे नौकरी छोड़ने तक का फैसला ले सकते हैं।
कंपनियों की बात करें तो वो भी असमंजस में हैं। एक तरफ 79 फीसदी कंपनी मानती है कि अगर राइट टू डिसकनेक्ट लागू हो जाए, तो ये सही कदम होगा। दूसरी तरफ 66 फीसदी को डर है कि सख्त नियम बने तो प्रोडक्टिविटी गिर सकती है।साथ ही करीब 81 फीसदी नियोक्ताओं को लगता है कि अगर वर्क-लाइफ बैलेंस का ध्यान नहीं रखा गया, तो अच्छे टैलेंट हाथ से निकल सकते हैं। यही वजह है कि कई कंपनियां ऑफर भी देने को तैयार हैं। अगर कर्मचारी ऑफिस टाइम के बाद काम करे, तो बदले में अतिरिक्त पैसे या फायदे दिए जाएं।