
Anaya Bangar Gender Affirming Surgery: क्रिकेटर और पूर्व भारतीय बल्लेबाजी कोच संजय बांगर की बेटी अनाया बांगर एक बार फिर अपने जेंडर ट्रांजिशन को लेकर चर्चा में हैं। अनाया ने हाल ही में एक इंटरव्यू में अपने जेंडर रीअसाइनमेंट सर्जरी के अनुभव, उससे पहले के मानसिक दबाव, परिवार के साथ रिश्तों में आए बदलाव और रिकवरी के कठिन दौर पर खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि ये फैसला उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन खुद की पहचान के साथ जीने के लिए यह कदम बेहद जरूरी था।
अनाया ने बताया कि जेंडर ट्रांजिशन का फैसला लेने से पहले उन्हें लंबी मेडिकल और काउंसलिंग प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। डॉक्टरों और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मंजूरी मिलने के बाद उन्होंने बैंकॉक में सर्जरी कराने का फैसला लिया। अस्पताल पहुंचने के बाद वह बेहद खुश थीं, लेकिन मन में इस बात का डर भी था कि कहीं कोई जटिलता न हो जाए। उन्होंने कहा कि सर्जरी से एक रात पहले वह पूरी रात सो नहीं पाईं क्योंकि मन में उत्साह, घबराहट और भविष्य को लेकर कई तरह की भावनाएं एक साथ चल रही थीं।
अनाया ने स्वीकार किया कि जेंडर ट्रांजिशन सिर्फ एक मेडिकल प्रक्रिया नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी बदल देने वाला अनुभव है। उन्होंने कहा कि इस सफर में उनके कई रिश्ते बदल गए। दोस्तियां प्रभावित हुईं, परिवार के भीतर भी कई बदलाव आए और सार्वजनिक जीवन में भी उन्हें ट्रोलिंग और आलोचना का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी क्योंकि वह अपनी असली पहचान के साथ जीना चाहती थीं।
अनाया के मुताबिक सर्जरी करीब छह से सात घंटे चली और सफल रही। उन्होंने बताया कि ऑपरेशन के बाद उन्हें मानसिक रूप से काफी राहत मिली और लंबे समय से महसूस हो रही जेंडर डिस्फोरिया की भावना काफी हद तक कम हो गई। हालांकि असली चुनौती रिकवरी के दौरान सामने आई। उन्होंने बताया कि शुरुआती छह महीने बेहद मुश्किल रहे और रोजाना कई घंटों तक मेडिकल रिकवरी प्रक्रिया अपनानी पड़ती थी, जो काफी दर्दनाक थी। उनके अनुसार यह पूरी प्रक्रिया धैर्य, समय और मानसिक मजबूती की मांग करती है।
अनाया ने यह भी स्पष्ट किया कि जेंडर रीअसाइनमेंट सर्जरी हर ट्रांसजेंडर व्यक्ति के लिए अनिवार्य नहीं होती। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति अपने शरीर और पहचान को लेकर अलग महसूस करता है। इसलिए किसी के फैसले को लेकर पूर्वाग्रह नहीं बनाना चाहिए। उनका मानना है कि हर इंसान को अपनी पहचान के अनुसार जीवन जीने का अधिकार है।
अनाया ने बताया कि शुरुआत में उनके माता-पिता के लिए इस बदलाव को स्वीकार करना आसान नहीं था। हालांकि समय के साथ उन्होंने बेटी की भावनाओं को समझा और सर्जरी के दौरान भी पूरा साथ दिया। उनके माता-पिता अस्पताल में मौजूद रहे और लगातार उनका हौसला बढ़ाते रहे। अनाया का कहना है कि परिवार का समर्थन मिलने के बाद उनका सफर पहले की तुलना में काफी आसान हो गया।