
Satluj Controversy Row: पिछले 3 साल से सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ फ़िल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) से दिलजीत दोसांझ की 'सतलुज' को अभी भी सर्टिफिकेशन का इंतजार है, ऐसे में CBFC के काम करने के तरीके पर एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं। बता दें कि Satluj Controversy के बीच चल रही बहस पर सेंसर बोर्ड के सदस्य राज मिश्रा ने पहले बताया था कि सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया कैसे काम करती है और सर्टिफिकेट जारी करते समय बोर्ड किन बातों का ध्यान रखता है।
विमर्श-नारद टीवी से बात करते हुए राज मिश्रा ने कहा, "CBFC सर्टिफिकेशन के बिना किसी भी फिल्म को रिलीज करना और ऑनलाइन दिखाना कानूनी तौर पर अपराध है।" सेंसर बोर्ड के ढांचे के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा, "CBFC के चेयरमैन की नियुक्ति सूचना और प्रसारण मंत्रालय करता है। अभी चेयरमैन प्रसून जोशी हैं।" राज मिश्रा ने कहा, "हर फिल्म को पांच सदस्यों की कमेटी देखती है। अगर पांच में से कम से कम तीन सदस्य मंजूरी देते हैं, तो फिल्म को सर्टिफिकेट दिया जाता है।"
इसके साथ ही उन्होंने सर्टिफिकेशन की अलग-अलग कैटेगरीज के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने बताया, "तीन तरह के सर्टिफि केट होते हैं।
पहला है 'U' (यूनिवर्सल), जिसका मतलब है कि सभी उम्र के लोग फिल्म को देख सकते हैं। उसके बाद आता है 'A', जो सिर्फ 18 साल और उससे ज्यादा उम्र के वयस्कों के लिए है। तीसरा है 'UA', जिसका मतलब है कि बच्चे किसी वयस्क की देख रेख में फिल्म देख सकते हैं।"
इस बारे में बात करते हुए मिश्रा ने कहा, "अपराध और हिंसा वाली फिल्म आम तौर पर 'A' कैटेगरी में आती हैं। अगर फिल्म में थोड़ी-बहुत हिंसा या अपराध है, तो उसे 'UA' सर्टिफिकेट मिल सकता है, जिससे बच्चे माता-पिता की देखरेख में उसे देख सकते हैं। यह असल में सुरक्षा का एक नियम है। अभी सर्टिफिकेशन की यही तीन श्रेणियां हैं।"
उन्होंने यह भी बताया कि फिल्म निर्माता फैसले के खिलाफ अपील कैसे कर सकते हैं। उन्होंने कहा, "अगर पांच सदस्यों वाली कमेटी किसी फिल्म को मंजूरी नहीं देती है, तो फिल्म बनाने वाला दोबारा जांच के लिए अर्जी दे सकता है। इसके बाद फिल्म की समीक्षा ग्यारह सदस्यों वाली कमेटी करती है। अगर तब भीमंजूरी नहीं मिलती है, तो बनाने वाले दिल्ली में ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटा सकते हैं। हालांकि, ऐसे मामले बहुत कम होते हैं।"
जब उनसे पूछा गया कि फिल्मों को सर्टिफिकेट देने के आधार के बारे में बताते हुए मिश्रा ने कहा कि बोर्ड ये देखता है कि फिल्म का विषय और उसे दिखाने का तरीका आज के दर्शकों के लिए सही और उपयुक्त है या नहीं।
"विषय और कहानी कहने का तरीका आज की दुनिया के हिसाब से होना चाहिए। नियम समय के साथ बदलते रहते हैं। आजकल थोड़ी-बहुत हिंसा को आम तौर पर स्वीकार कर लिया जाता है, लेकिन अगर फिल्म में बहुत ज्यादा हिंसक हरकतें दिखाई जाती हैं, जैसे किसी का जबड़ा उखाड़ना, तो हमें ये पक्का करना होता है कि ऐसे दृश्यों का दर्शकों पर बुरा असर न पड़े।"
"फिल्म में देश-विरोधी विचारों का प्रचार नहीं होना चाहिए और न ही देश या उसकी नीतियों का अपमान होना चाहिए। हो सकता है कि फिल्म में मनोरंजन कम हो, लेकिन उससे अशांति नहीं फैलनी चाहिए और न ही लोगों को भड़काने वाला कंटेंट होना चाहिए। फिल्ममेकर्स को क्रिएटिविटी की आजादी होती है, लेकिन कुछ सीमाएं भी होती हैं।"
"मैं अभी भी CBFC का सदस्य हूं और आज तक मुझे किसी खास फिल्म को लेकर दबाव बनाने वाला कोई फोन कॉल नहीं आया है। हमें पहले से नहीं बताया जाता कि हम किस फिल्म या किसकी फिल्म को सर्टिफिकेट देने जा रहे हैं। ये जानकारी स्क्रीनिंग के लिए पहुंचने पर ही दी जाती है। हो सकता है कि किसी फिल्म को राजनीतिक समर्थन हासिल हो, लेकिन ये बात बोर्ड तक नहीं पहुंचती।"
"CBFC की जिम्मेदारी इस बात को पक्का करना है कि कोई भी फिल्म लोगों की भावनाओं को एक हद से ज्यादा ठेस न पहुंचाए। वो इससे आगे कुछ नहीं सोचता।"
'सतलुज', जिसका पहले नाम 'पंजाब 95' था, पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की जिंदगी से प्रेरित है। उन्होंने 1984 और 1994 के बीच लगभग 25,000 अज्ञात शवों के कथित अंतिम संस्कार की जांच की थी। फिल्म में 1995 में उनके अपहरण और उसके बाद 2005 में खालरा के अपहरण और हत्या के लिए पंजाब पुलिस के चार कर्मियों को दोषी ठहराए जाने की कहानी दिखाई गई है। उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।