मनोरंजन

OTT और Social Media ने बदली Casting की दुनिया, कैसे मिल रहे हैं छोटे शहरों के नए कलाकारों को मौके?

OTT and Social Media Talent: आज के दौर में मुंबई जाए बिना लोगों को मिल रहा है मौका। OTT टैलेंट हंट और सोशल मीडिया ने तोड़ीं भाषा की दीवारें। जानिए, मेकर्स कश्मीर से कन्याकुमारी तक कैसे खोज रहे हैं नए कलाकार।
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Updated: 31 Oct 2026, 3:15 PM IST
OTT and Social Media Talent Hunt in India
OTT और सोशल मीडिया ने भारत में कास्टिंग और टैलेंट हंट का तरीका बदल दिया है। (फोटो: AI Generated Image)

OTT and Social Media Talent: चकाचौंध भरी फिल्मी दुनिया हर किसी को आकर्षित करती है और यही आकर्षण हजारों लोगों को अपनी ओर खींचता है। शायद यही वजह है कि हर साल हजारों-लाखों की संख्या में लोग मायानगरी मुंबई में अपनी किस्मत आजमाने जाते हैं। किसी को अपना हुनर दिखाने का मौका मिलता है, तो कोई निराशा लेकर खाली हाथ लौट आता है।

वहीं, एक वक्त ऐसा भी था, जब किसी शख्स के लिए मुंबई, चेन्नई या कोलकाता जैसे फिल्मी केंद्रों तक पहुंचना किसी जंग से कम नहीं होता था। यह वो दौर था, जब भाषा, पहचान और संपर्कों की कमी कई बार अच्छे टैलेंट को पहले ही रोक देती थी। हालांकि, आज के दौर में स्थिति बदल चुकी है। अब हर किसी के हाथ में मोबाइल है, इंटरनेट है और सबसे बड़ी चीज OTT प्लेटफॉर्म हैं। इन सबने मिलकर एक ऐसा मंच तैयार किया है, जिस पर कोई भी अपनी प्रतिभा का जादू घर-घर तक पहुंचा सकता है। न सिर्फ कलाकारों, बल्कि इन कलाकारों के हुनर को परखने और उन्हें मौका देने वालों का काम भी काफी आसान हो गया है।

OTT: सरहदें मिटीं, कंटेंट बना 'किंग'

कोविड महामारी के दौर में OTT ने रफ्तार पकड़ी। इसके बाद यह बहस तेज हुई कि 'क्षेत्रीय' और 'राष्ट्रीय' के बीच की रेखा कितनी बची है। जानकारी के लिए बता दें कि साल 2023 में तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने कहा था कि OTT ने भौगोलिक बाधाएं तोड़ दी हैं और कोरियाई कंटेंट की तरह दुनिया भर का कंटेंट अब वैश्विक दर्शकों तक आसानी से पहुंच सकता है।

भारत जैसे बहुभाषी देश में इसका सबसे बड़ा असर क्षेत्रीय सिनेमा पर पड़ा। मराठी सिनेमा का उदाहरण देते हुए एक विश्लेषण में कहा गया कि कंटेंट निर्माण, वितरण और प्रदर्शन के लोकतांत्रिक होने से कहानीकार अपना दर्शक खोज पा रहे हैं और दमदार विषय चुन पा रहे हैं।

दर्शकों के आंकड़े भी इस बात की ओर इशारा करते हैं। नेटफ्लिक्स के एक कैंपेन में बताया गया कि 72% OTT दर्शक अपनी मातृभाषा में कंटेंट देखना पसंद करते हैं। 2019 में YouGov के एक सर्वेक्षण में सामने आया था कि 72 प्रतिशत भारतीय वीडियो दर्शक दूसरी भाषाओं का कंटेंट सबटाइटल के साथ देखना पसंद करते हैं। यह आंकड़ा बताता है कि दर्शक अपनी परिचित भाषा के दायरे से बाहर निकलकर भी कहानियां देखना चाहते हैं। OTT प्लेटफॉर्म के लिए यह स्थानीय भाषाओं की फिल्मों, कहानियों और कलाकारों को व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाने का अवसर है। अभिनेता सुंदीप किशन का कहना है कि मनोरंजन में भाषा कभी बाधा नहीं रही, क्योंकि इसकी शुरुआत चार्ली चैप्लिन की मूक फिल्मों से हुई थी।

OTT ने सिनेमा को दिए नए चेहरे

अगर पिछले कुछ सालों पर गौर किया जाए, तो OTT ने मनोरंजन जगत को नए चेहरे भी दिए हैं। इसका एक उदाहरण धरना दुर्गा हैं, जो 4 जून 2026 को Netflix पर रिलीज हुई फिल्म 'मां-बहन' में नजर आईं। फिल्म में माधुरी दीक्षित, तृप्ति डिमरी और रवि किशन भी अहम भूमिकाओं में हैं।

इसके अलावा, कोच्चि में एक मीडिया सम्मेलन में पैनलिस्टों का मत था कि OTT ने दर्शकों की फिल्म देखने की आदत बदली और क्षेत्रीय बंटवारे को काफी हद तक खत्म कर दिया है। सोनी पिक्चर्स नेटवर्क इंडिया के कंटेंट हेड सौगत मुखर्जी के मुताबिक, OTT प्लेटफॉर्म ने अपने खुद के स्टार खड़े कर दिए हैं।

भोजपुरी से मिली ताजा मिसाल

इस बदलाव का सबसे ताजा उदाहरण भोजपुरी है। आजतक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भोजपुरी गाने, फिल्में और कलाकार पहले यूट्यूब और सोशल मीडिया के जरिए देश-दुनिया के दर्शकों तक पहुंचे और अब वही लोकप्रियता बड़े स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म के लिए कंटेंट की ताकत बन रही है। पवन सिंह और निरहुआ की लोकप्रियता, आम्रपाली दुबे और काजल राघवानी को लेकर दर्शकों की दिलचस्पी, पुराने विवाद, रिश्तों को लेकर जिज्ञासा और सोशल मीडिया पर बनने वाली धारणाएं ये सब मिलकर ऐसा मनोरंजन तैयार करते हैं जिसकी कहानी दर्शकों को पहले से कुछ हद तक मालूम होती है, लेकिन वे उसे पर्दे पर खुलते हुए देखना चाहते हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि भोजपुरी को सिर्फ उसकी भाषा के दम पर नहीं बेचा जा रहा, बल्कि उससे जुड़ा पूरा स्टार कल्चर भी कंटेंट का हिस्सा है।

कैसे होती है अब टैलेंट की खोज?

एक टैलेंट प्लेटफॉर्म के अनुसार, 2026 में कास्टिंग डायरेक्टर, OTT प्लेटफॉर्म और प्रोडक्शन हाउस नए चेहरों के लिए सोशल मीडिया खंगालते हैं। खासकर ऐसे लोगों को तलाशा जाता है, जो कैमरे और दर्शकों की पकड़ को पहले से समझते हैं।

ध्यान रहे, यह एक व्यावसायिक प्लेटफॉर्म का आकलन है। फिर भी, उसी स्रोत का मानना है कि फॉलोअर्स के अलावा आवाज, भावनाओं पर नियंत्रण और बॉडी लैंग्वेज जैसी एक्टिंग की बुनियादी समझ भी जरूरी है।

पूरे देश में खुले डिजिटल टैलेंट हंट

एक्सचेंज4मीडिया के मुताबिक, शेयरचैट और टीवीएफ ने 'द वायरल स्टार्स' के नाम से अखिल भारतीय डिजिटल-फर्स्ट टैलेंट डिस्कवरी प्लेटफॉर्म की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य यह बताना था कि देश के हर कोने में प्रतिभा छिपी है।

हंगामा के आर्टिस्ट अलाउड प्लेटफॉर्म का 'हैप्पी क्लब' देश भर के उभरते कॉमेडियनों के लिए बहुभाषी डिजिटल टैलेंट हंट था। इसके विजेताओं को अपना डिजिटल स्पेशल शूट करने का मौका मिलता था।

हालांकि, टैलेंट की खोज के लिए तकनीक ने रास्ते बढ़ाए हैं, लेकिन पुराने रास्ते बंद नहीं किए हैं। 'बजरंगी भाईजान' की कास्टिंग डायरेक्टर शौमी मुखर्जी को एक बच्ची की तलाश में कश्मीर में बाढ़ का सामना करना पड़ा था। फर्क यह है कि अब ऐसी खोज का शुरुआती दौर अक्सर स्क्रीन पर ही हो जाता है।

कश्मीर: जब मंच भाषा बचाने का जरिया बना

कश्मीर के एक सोशल मीडिया पेज के अनुसार, घाटी का उदाहरण दिखाता है कि ये मंच न केवल करियर बनाने में मदद कर रहे हैं, बल्कि कला और कलाकारों की पहचान बचाने का काम भी कर रहे हैं।

क्रिश्चियन साइंस मॉनिटर के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर की लगभग 1.37 करोड़ आबादी में केवल करीब 70 लाख लोग कश्मीरी बोलते हैं और इसे आधिकारिक दर्जा 2020 में ही मिला। ऐसे में मुनीर जैसे युवा कंटेंट क्रिएटर भाषा और संस्कृति को बचाने के लिए सोशल मीडिया का सहारा ले रहे हैं। वहीं, पुलवामा के तौकीर अशरफ ने 'कीशुर प्राव' नाम का प्लेटफॉर्म बनाया है, ताकि कश्मीरी भाषा और सांस्कृतिक पहचान को फैलाया जा सके।

द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक, फिल्ममेकर्स भी स्थानीय भाषाओं के लिए अलग मंच की जरूरत उठाते रहे हैं। डायरेक्टर काजमी गोजरी, पहाड़ी, कश्मीरी और डोगरी भाषाओं की फिल्मों के लिए OTT प्लेटफॉर्म की मांग को लेकर प्रशासन को लिखते रहे हैं।

मौके खुले हैं, पर राह आसान नहीं

खलीज टाइम्स में प्रकाशित एक खबर के अनुसार, दुबई में हुए एक पैनल में कंटेंट क्रिएटर्स ने कहा कि OTT से एक्सपोजर तो मिलता है, लेकिन अगला कदम सोशल मीडिया है। OTT शो भी प्रचार के लिए क्रिएटर्स का इस्तेमाल करते हैं। यानी फॉलोअर्स की ताकत अब कास्टिंग का हिस्सा बन चुकी है।

वहीं, यह कहना भी गलत नहीं होगा कि आज के दौर में सिर्फ वायरल होना काफी नहीं है, क्योंकि हर वायरल चेहरा एक्टर नहीं होता। ट्रेनिंग, अनुशासन और पोर्टफोलियो की जरूरत हमेशा बनी रहती है।

इस हिसाब से देखा जाए, तो मुंबई की लोकल ट्रेन में धक्के खाने और प्रोडक्शन हाउस के चक्कर काटने का दौर अब अकेला रास्ता नहीं रहा। आज के वक्त में किसी छोटे से गांव का कंटेंट क्रिएटर अपनी भाषा, बोली और अंदाज में बनी एक रील से लाखों दर्शकों तक पहुंच सकता है। वही रील वायरल होने के बाद किसी कास्टिंग डायरेक्टर की नजर में आ सकती है।

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31 Oct 2026, 3:15 PM IST
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