मशहूर शायर साहिर लुधियानवी की आज 105वीं सालगिरह के मौके पर उनकी अधूरी मोहब्बत के कुछ अफसाने...
जाने माने पत्रकार, लेखक और बायोपिक फिल्म निदेशक राजेश बादल की साहिर लुधियानवी के ज़िंदगी नामे पर केंद्रित पहली प्रामाणिक किताब इस सप्ताह पाठकों तक पहुंचेगी। इस किताब को लिखने में उन्हें करीब 16 साल लगे। आज साहिर लुधियानवी के जन्म को 105 बरस पूरे हो रहे हैं। इस मौके पर पढ़िए इस किताब : ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया का एक दिलचस्प हिस्सा :
साहिर की मां सरदार बेग़म अपने पति से हक़ के लिए मुक़दमा जीत चुकी थीं, लेकिन मुआवज़ा एक पैसा न मिला। बेटे को लेकर सरदार बेग़म चुपचाप घर से निकल गई। मां-बेटे दाने दाने को मोहताज़ थे। किसी तरह बेटे को ख़ालसा स्कूल में एडमिशन कराया। पिता का दिया नाम भी उतार फेंका। अब उसका नाम साहिर हो गया था। स्कूल के बाद सरकारी कॉलेज में भी साहिर ने पढ़ाई की मगर असल पाठ तो ज़िंदगी पढ़ा रही थी। अपनों के शहर में नफ़रतों के तीर खाकर साहिर जवान हुआ। अंदर के खालीपन को भरना चाहता था। गरीबी देखी थी ,इसलिए पैसा चाहता था,मां के साथ गुमनामी देखी थी इसलिए शोहरत चाहता था, जागीरदार पिता के हक में हुकूमत देखी थी इसलिए हुकूमत से लड़ना चाहता था। मां को पति का प्यार नहीं मिला,इसलिए बेपनाह मोहब्बत भी चाहता था। पिता का प्यार तिजोरी में बंद था इसलिए दिल के दरवाज़े खोलकर दुनिया पर प्यार लुटाना चाहता था।
ये सारी चाहतें क़लम और ज़ुबां से फूट पड़ीं। लोग साहिर के मुरीद हो गए। लड़कियां पीछे पीछे घूमतीं। इन्ही में से एक हिन्दू लड़की थी- महिंदर। साहिर की पहली मोहब्बत। साहिर उसके पीछे पागल हो गए। उन्होंने लिखा, 'सामने एक मक़ान की छत पर मुंतज़िर कोई एक लड़की है, मुझको उससे नहीं ताल्लुक़ कुछ, फिर भी सीने में आग भड़की है लेकिन ये अफ़साना आगे जाता ,महिंदर इस दुनिया से चली गई। उसे टीबी हो गई थी। साहिर उसकी जलती चिता पर फूट फूट कर रोते रहे।
बहुत दिन बाद सामान्य हुए तो एक और लड़की भा गई। वो ताँगे पर जाती और साहिर उसके पीछे पीछे। सिलसिला चलता रहा। साहिर उसे भरोसा दिलाने में कामयाब रहे कि वो वाकई उसे प्यार करते हैं। लड़की ने भी दो चार कदम आगे बढ़ाए। इसी बीच उसके घर के लोगों को पता चल गया। फिर क्या था। साहिर की जान पर बन आई। यह सिलसिला भी टूट गया।
इसके बाद हॉस्टल में रहने वाली एक सिख लड़की ज़िंदगी में आ गई। यह रिश्ता मोहब्बत में तब्दील हो गया। कॉलेज में साहिर और उस लड़की के इश्क़ की दास्तान हर छात्र की जबान पर थी। खबर लड़की के घरवालों को लगी तो कॉलेज से निकाल कर गांव ले गए। साहिर को कॉलेज से निकाल दिया गया। जुदाई बर्दाश्त न हुई तो एक दोस्त को साथ लेकर बीस किलोमीटर दूर पैदल उस लड़की के गांव जा पहुंचे। खुद तो जा नहीं सकते थे। दोस्त को भेजा। उस लड़की ने हाथ जोड़ लिए और हमेशा के लिए भूल जाने की प्रार्थना की। साहिर फिर अकेले। उन्होंने लिखा, 'मेरा तो कुछ भी नहीं है, मैं रो रो के जी लूँगा, मगर खुदा के लिए तुम असीरे -ग़म न रहो। मैं जानता हूँ कि दुनिया का ख़ौफ़ है तुमको /मुझे ख़बर है,ये दुनिया,अजीब दुनिया है...
इसके बाद जैसे साहिर के डीएनए से मोहब्बत हाशिए पर चली गई। पटरी से उतरी गाड़ी वापस पटरी पर न आई। क़लम समाज और व्यवस्था से लड़ने लगी। किशोर साहिर को कुछ लड़कियों से प्यार भी हुआ ,लेकिन परवान न चढ़ा। हर प्यार में उसको धोखा मिला। धोखे ने इस क़दर आत्म विश्वास तोड़ा कि ज़िंदगी भर घर न बसा। सारी उम्र एक बियाबान तपते रेगिस्तान की तरह रही। उससे भी रिश्ता न बना पाए जो उनसे ब्याह रचाना चाहती थी। वो थी अपने ज़माने की मशहूर लेखिका अमृता प्रीतम।