
जगजीत सिंह। (फोटो- पत्रिका डिजाइन)
राजस्थान के श्रीगंगानगर में जन्में महानतम ग़ज़ल गायक का आज जन्म दिन है। इस मौके पर हम उनका एक दुर्लभ रूप आपके सामने पेश कर रहे हैं, जाने माने पत्रकार, लेखक और फिल्मकार तथा बायोपिक फिल्म निर्देशक राजेश बादल की किताब , कहां तुम चले गए : दास्तान ए जगजीत में इस किस्से का जिक्र किया गया है।
किसी किसी की ज़िंदगी में इतना संघर्ष होता है कि बाद में वह मुश्किल दौर बड़ा सामान्य लगने लगता है ।निजी असफलताएँ और कारोबारी झटके रोज़मर्रा का हिस्सा बन जाते हैं।
मिर्ज़ा ग़ालिब ने शायद ऐसी ही किसी मनःस्थिति में लिखा था- रंज का ख़ूगर हुआ इंसां तो मिट जाता है रंज , मुश्किलें मुझ पर पड़ी इतनी कि आसां हो गईं। प्रतीत होता है कि जगजीत सिंह के अवचेतन में भी कुछ इसी तरह के विचार जीवन - दर्शन बन कर घुल गए थे। इसी वजह से वे अपने दुःख - दर्द और सारी दुनिया के दुःख - दर्द में कोई फ़र्क़ महसूस नहीं करते थे।
ग़र्दिश के दिनों में किसी ने उनकी मदद क्यों नहीं की या कोई उनके कठिनाई भरे दिनों में काम क्यों नहीं आया ,वे यह विचार भी नहीं करते थे। लेकिन उनके अपने संपर्क संसार में कोई परेशान हो अथवा किसी मुसीबतज़दा हो तो दिल खोल कर सहायता करने से भी नहीं चूकते थे।
संभवतया जगजीत सिंह यह मानने लगे थे कि यदि वे किसी की सहायता के लिए सक्षम नही होते तो यह काम कैसे कर सकते थे। जो भी उनके सामने याचक बन कर आता रहा ,कभी निराश होकर नहीं लौटा।
जब आप उनसे जुड़े रहे लोगों से बात करते हैं तो पता चलता है कि जगजीत सिंह सिर्फ़ एक प्रोफ़ेशनल ग़ज़ल गायक ही नहीं थे। आप ऐतराज़ कर सकते हैं कि उन्होंने तो महत्वपूर्ण रचनाओं को केवल स्वर दिया था।
लेकिन इन रचनाओं का चुनाव तो अन्य गायक भी कर सकते थे। उन्हें भी यह छूट प्राप्त थी।असल में जिसका हृदय निर्मल हो, नजर, नीयत और मंशा साफ़ हो, वही आम इंसान से ऊपर उठकर सबके दिलों पर राज करता है।
जगजीत सिंह इंसानियत के उन तमाम गुणों से भरपूर थे,जो आजकल समाज से विलुप्त होते जा रहे हैं। वे अनेक अवसरों पर सार्वजनिक रूप से यह कह चुके थे कि उनके लिए सबसे बड़ा धर्म इंसानियत का है।
वे मंदिर जाते थे तो गुरुद्वारे में भी अरदास के लिए जाते थे। मस्जिद में मत्था टेकते थे तो गिरजे में भी प्रार्थना करते थे।हाँ ऐसा करना किसी नियमित कर्तव्य की तरह उनकी दिनचर्या में शामिल नहीं था।
उन्होंने पाकिस्तान में एक पत्रकार से बातचीत में कहा था , तारीफ़ उस ख़ुदा की " मज़हब जो है ,वो मेरी नज़र में एक जीवन शैली है। वह आपको सिखाता है कि जीना कैसे है। मैं तो यही व्याख्या करता हूँ।
यह मंदिर जाना, घंटे बजाना, टीका लगाना, आरती करना ये तो सारे रीति रिवाज़ हैं। ज़िंदगी में ये इतने ज़रूरी नहीं हैं। ज़रूरी तो यह है कि आप जिस मज़हब को भी मानें ,उसके सिद्धांतों ,आदर्शों और शिक्षाओं को अमल में ला रहे हैं या नहीं।
अगर आप उनका पालन नहीं कर रहे हैं तो आपके मज़हबी होने का कोई फायदा नहीं है। मैं तो सब धर्मों को मानता हूँ। उनकी शिक्षाओं पर अमल करने की कोशिश करता हूँ। कैसे जीना चाहिए ,यह मज़हब ही तो बताता है। ज़िंदगी जीने की यह कितनी अदभुत और सुन्दर व्याख्या है। एकदम आसान शब्दों में कह दी गई।
जगजीत सिंह ने शाहिद कबीर की एक रचना में इंसानियत के अपने दर्शन को डूबकर गाया है
मैं न हिन्दू न मुसलमान ,मुझे जीने दो /
दोस्ती है मेरा ईमान,मुझे जीने दो /
सबके दुःख दर्द को अपना समझकर जीना,
बस यही है मेरा अरमान,मुझे जीने दो /
क्या आप इंसानियत के धर्म से ओतप्रोत इस रचना को भूल पाएँगे -
कोई हिन्दू ,कोई मुस्लिम, कोई ईसाई है /
सबने इंसान न बनने की क़सम खाई है /
इस रचना को सुनकर ऐसा लगता है मानो ऊपर से आया कोई फ़रिश्ता समूची मानवता को यह सन्देश दे रहा है।
इस बेजोड़ फ़नकार के बारे में जाने माने शायर और गीतकार जावेद अख़्तर भीगे मन से कहते हैं, 'कम लोगों को यह मालूम है कि जगजीत सिंह ने अपनी ज़िंदगी में कितने लोगों की मदद की, कितने लोगों को सहारा दिया ,कितनी चैरिटी की है ।और बड़ी बात यह कि उसकी ज़ुबान से कभी नहीं निकलता था कि मैंने ये किया। वह अपनी नेकी को छिपा कर रखता था। उसके अंदर सभी के लिए इतनी मोहब्बत और अपनाइयत थी कि बता नहीं सकता। बहुत उम्दा आदमी था।'
जगजीत सिंह जितनी उदारता से अपने परिवार वालों के काम आते थे, अपने दोस्तों, परिचितों और शुभचिंतकों के आड़े वक़्त में भी उसी तरह खड़े रहते थे।
यही कारण है कि इस लोक को अलविदा कहने के इतने बरस बीत जाने के बाद भी जगजीत सिंह को लोग दिल की गहराइयों से सम्मान देते हैं।
उमर के अस्सी बसंत पार कर चुके क्लेरेंस पीटरसन जगजीत सिंह के दशकों तक जगजीत सिंह के सहयोगी रहे। उनसे जगजीत के बारे में बस एक सवाल कर लीजिए, आँसुओं की धार लग जाती है।
वे कहते हैं- 'दिल का राजा था। अभी भी, आज भी मैं उसके लिए रो रहा हूँ। ऐसा आदमी अब कभी नहीं मिलेगा मुझे।उसने मुझे यह घर खरीदकर दे दिया, जिसमें हम आज रह रहे हैं। मेरे पास क्या था। कुछ भी नहीं था।लेकिन सिर्फ़ मेरे लिए ही नहीं किया, उसने सभी के लिए किया। उसका दिल कोई नहीं छू सकता। एकदम राजा था।'
जगजीत सिंह के संघर्ष के समकालीन साथी और प्रसिद्ध फ़िल्मकार सुभाष घई कहते हैं, उन्होंने सबका दिल जीता। वे कभी कॉन्ट्रोवर्सिअल नहीं रहे। हम लोग तो फिर भी शो बिज़नेस में हैं। कुछ राइवल्स भी होते हैं तो कुछ जेलस भी होते हैं ,लेकिन उनके प्रति सभी की सदभावना थी। मैंने यह भी देखा कि वह कभी भी पैसे के पीछे नहीं भागते थे, जबकि आज की दुनिया में सिवाय पैसे के कुछ है नहीं। यहाँ तो आपसे बात करने के लिए पैसे लेते हैं। कुछ ऐसे चेरिटेबल ट्रस्ट थे ,जो समय समय पर मुझे अप्रोच करते थे कि हम पैसा नहीं दे सकते। लेकिन जगजीत सिंह को चाहिए तो मैं फ़ोन करता था कि जगजीत ! इनके पास पैसे नहीं हैं। ये पैसे इकट्ठे करना चाहते हैं तुम्हारी आवाज़ से। तो जगजीत जाता था।उनसे कोई पैसा नहीं लेता था। इसने बहुत से चेरिटेबल ट्रस्ट के लिए फ्री काम किया है। यह महानता थी उसकी।'
कम लोग ही यह जानते होंगे कि जगजीत सिंह ने हे ! राम नाम से एक एलबम रिकॉर्ड किया था तो उसका तीन चौथाई हिस्सा ख़ुद जगजीत सिंह ने लिखा था। थोड़ा सा भाग उनके पुराने दोस्त सुदर्शन फ़ाक़िर ने लिखा था। लेकिन एलबम पर सभी रचनाओं में सुदर्शन फ़ाक़िर का ही नाम गया था। यह एल्बम सुपर हिट हुआ। बेस्ट सेलर की श्रेणी में आया।कंपनी ने इसकी रॉयल्टी जगजीत सिंह को भेजी, जो उन दिनों क़रीब दस लाख रूपए होती थी।
तीस बरस पहले यह रक़म बहुत बड़ी मानी जाती थी। लेकिन जगजीत सिंह ने कहा कि इसके रचनाकार सुदर्शन फ़ाक़िर हैं।रॉयल्टी के असल हक़दार वे ही हैं। उनको ही यह रक़म मिलनी चाहिए।
दरअसल असल कहानी यह थी कि सुदर्शन फ़ाक़िर उन दिनों अपना घर बना रहे थे। उसके लिए आर्थिक संकट से जूझ रहे थे ।जगजीत सिंह यह बात जानते थे।अगर जगजीत सीधे सहायता करना चाहते तो वे स्वीकार नहीं करते। बड़े स्वाभिमानी थे। इसलिए उन्होंने यह फॉर्मूला निकाला था।आज के ज़माने में कोई ऐसा करता है ?
चित्रा सिंह उनके इस गुण को याद करते हुए कहती हैं ," मुझे लगा करता था कि ज़िंदगी में परेशानी या बुरा वक़्त कभी भी बोलकर नहीं आता। इसलिए मुश्किल दिनों के लिए कुछ पैसा बचाकर रखना चाहिए। मैं उनसे कहती भी थी ,लेकिन मुसीबतज़दा लोगों के काम आना जगजीत की आदत बन गई थी।
यह आदत उन्हें अपने पिताजी से मिली थी ,जो हमेशा एक परोपकारी और दयालु प्रकृति के इंसान थे।उनका यह गुण बेटे में भी आया।मैं आपको कह सकती हूँ कि जबसे हम लोगों की वित्तीय हालत ठीक हुई , कुछ पैसे हाथ में आने लगे तो जगजीत जी की आर्थिक सहायता से कम से कम दस परिवार पल रहे थे ।सालों साल यह सिलसिला चलता रहा "।
जगजीत के छोटे भाई करतार सिंह भी इसका समर्थन करते हैं। वे कहते हैं- हमारे पिता जी का स्वभाव दानी था।भले ही हमारे घर में समस्या हो। खाने को न हो। लेकिन अगर कोई भूखा आ जाए तो पिताजी न नहीं कह सकते थे।कोई ज़रूरतमंद आ जाए। उसे पैसे चाहिए हों तो वे मना नहीं कर सकते थे।चाहे घर में छोटी छोटी बात के लिए पैसे का प्रॉब्लम हो। बिलकुल यही स्वभाव जगजीत भाई का था। वे भी किसी परेशान व्यक्ति को इंकार कर ही नहीं सकते थे। कुछ लोग हैं ,जिनकी जानकारी में यह सब है ,पर अनगिनत लोग ऐसे हैं ,जिन्हें भाई ने मदद की और भूल गए।हम भी उन्हें नहीं जानते।
करतार सिंह को एक बार दिल्ली में अपने कारोबार के लिए सहायता की आवश्यकता थी ।जगजीत ने बिना किसी हिचक के मदद की। जब करतार सिंह पढ़ते थे तो जगजीत की साफ़ हिदायत थी कि भाई ! पिताजी से कुछ नहीं लेना। बड़े भाई से कुछ नहीं लेना। सारी मदद मैं करूँगा।
करतार पचास रूपए माँगते थे तो सौ रूपए मिलते थे।एक हज़ार रूपए की ज़रूरत होती तो दो हज़ार मिलते थे । जगजीत तो करतार को मुंबई में रखकर गायक बनाना चाहते थे। लेकिन माता - पिता की सेवा करने के कारण करतार मुंबई नहीं जा सके। दिल्ली में करतार सिंह ने एक रेस्टॉरेंट खोला तो उसके पीछे जगजीत सिंह का बड़ा योगदान था। करतार सिंह के तीन बच्चे हैं।
जगजीत चाहते थे कि उनकी पढ़ाई विदेश में हो। बड़े बेटे करन के लिए उन्होंने आग्रह किया तो करतार ने हाथ खड़े कर दिए। बोले- इतना पैसा नहीं है। मैं अफोर्ड नहीं कर सकता। जगजीत ने उसका एमिटी विश्व विद्यालय में दाख़िला कराया। चार साल के पाठ्यक्रम में दो साल उसे अमेरिका के शिकागो में पढ़ना था। दो साल का पूरा ख़र्च जगजीत सिंह ने उठाया।
इन दिनों करन वहीं पर है और एप्पल के साथ काम कर रहा है ,लेकिन वह अपने प्रिय ताऊ जी को हरदम याद रखता है। करतार की बेटी रश्मीत ने लन्दन में कॉमर्स से स्नातक डिग्री हासिल की और छोटे बेटे रिपुदमन सिंह के लिए भी जो कर सकते थे, किया। रिपुदमन की पढ़ाई चल ही रही थी कि जगजीत अपने आख़िरी सफ़र पर चले गए। उपकृत करतार अत्यंत कृतज्ञ होकर कहते हैं- ऐसा भाई क़िस्मत से ही मिलता है। भगवान सबको ऐसा भाई दे।
परिवार के अलावा सगे संबंधियों में भी ऐसा कौन था, जिसके लिए उन्होंने नहीं किया। जगजीत सिंह के बड़े भाई जसवंत सिंह कहते हैं- जगजीत परिवार के लोगों के प्रति बड़ा संवेदनशील था। उन्हें परेशानी में नहीं देख सकता था। एक बार की बात है कि हमारे एक रिश्तेदार मुंबई गए। उनकी बेटी का इलाज़ होना था। बहुत निकट के संबंधी नहीं थे। तो बेटी का इलाज़ थोड़ा महँगा था। रिश्तेदार आर्थिक संकट में थे। क्या करें। कहाँ जाएँ। एक दिन उन्हें जीती की याद आई। पर वे झिझकते रहे कि इतना बड़ा आदमी है। पता नहीं सहायता करेगा भी या नहीं। फिर भी वे एक दिन जीती के पास पहुँच ही गए। जीती ने तुरंत पचास हज़ार रूपए निकाल कर दे दिए। इलाज़ हो गया और उनकी बेटी की जान बच गई तो जीती की बदौलत।उनकी ज़िंदगी में जगजीत किसी ईश्वर से कम नहीं थे।आज भी कभी मिलते हैं तो उस घटना का ज़िक्र करना नहीं भूलते। तो जीती का नेचर ही ऐसा था। वह किसी को दुःख में देख ही नहीं सकता था "।
जसवंत सिंह बताते हैं कि उनके दोनों बेटे शोरूम खोलना चाहते थे।जसवंत सिंह के पास रिटायरमेंट से मिला पैसा था।यह पर्याप्त नहीं था।जगजीत ने बाक़ी पैसे लगाए और दोनों के शो रूम खुल गए। यह मदद लाखों रूपए में थी।जगजीत सिंह की बड़ी बहन के बेटे की छोटी सी मैकेनिक शॉप थी।जगजीत ने उसे नई बोलेरो खरीदकर दी ,जिससे वह गाड़ी टैक्सी में चलाकर आर्थिक स्थिति बेहतर बना सके।कुछ समय तो ठीक चला। बाद में बोलेरो दुर्घटनाग्रस्त हो गई। जगजीत ने तब एक नया ट्रक खरीदकर भांजे को दिया।
जगजीत सिंह की यात्राओं के प्रबंधक और बरसों तक सचिव की भूमिका निभाने वाले कुलदीप देसाई बताते हैं- मेरे परिचितों में से किसी एक की बेटी का ब्याह तय हो गया था ।शायद भंवरलाल नाम था उनका। तो वे जगजीत सिंह का कार्यक्रम कराना चाहते थे। शादी के लिए दो - तीन लाख रूपए की ज़रूरत थी।अगर वे जगजीत का शो कराते तो इतना लाभ उनको आसानी से हो सकता था या हो सकता है कि न भी होता। तो वे आए। मैं वहीं बैठा हुआ था। जगजीत ने उनसे कुछ नहीं कहा।एक हफ़्ते बाद मुझे और उसे बुलाया कि वह शो के लिए आवश्यक तकनीकी प्रबंध कर ले। जब वह घर से जाने लगा, तो बेटी की शादी के लिए जगजीत ने मिठाई का एक पैकेट शुभकामनाओं के तौर पर दिया। घर जाकर उसने मिठाई का डिब्बा खोला तो दंग रह गया। उसमें एक पैकेट में दो लाख रूपए रखे हुए थे।बाद में बॉस ने मुझसे कहा कि उस शहर में दो लाख रूपए का मुनाफ़ा उसे मेरा शो कराने से नहीं होता। बेटी की शादी के लिए उनकी मुश्किलें और बढ़ जाती।
जगजीत सिंह का यह एक ऐसा मानवीय रूप था, जिसकी संगीत प्रेमियों को जानकारी नहीं है। वर्षों तक जगजीत का आयुर्वेदिक पद्धति से इलाज़ करने वाले वैद्य और दोस्त बालेंदु प्रकाश के अनुसार, जगजीत जी कहते थे, वैद्य जी जब तक जगजीत सिंह आपके साथ है ,आपको कुछ भी सोचने की ज़रुरत नहीं है।
जब कभी मुझे चिकित्सा अनुसंधान के काम को आगे बढ़ाने के लिए पैसे की आवश्यकता होती थी तो वे कहीं भी होते ,उनका चेक आ जाया करता था। कहीं से एक चेक आ रहा है तो कहीं दूसरे शहर से दूसरा चेक भेज दिया करते थे। कभी रिसर्च के लिए तो कभी मरीज़ों के इलाज़ के लिए।
उन्होंने तो 1998 में हमारे फाउंडेशन के लिए एक शो दिल्ली के सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम में किया था ।कहते थे ,वैद्यजी किसी भी क़ीमत पर काम रुकना नहीं चाहिए। एक घटना तो मेरे आँखों के सामने की है। मैं मुंबई में उनके घर में बैठा था कि उनका एक पुराना कर्मचारी आया। बेटी के ब्याह का कार्ड लेकर उन्हें निमंत्रित करने आया था।
जगजीत जी बहुत प्रसन्न हुए। उससे बोले कि मैं अवश्य आऊँगा। लेकिन मेरे लायक कुछ काम हो तो बताओ। उसने कहा नहीं सर ,बस आपको आकर वर वधू को आशीर्वाद देना है।तो बोले कि वो तो मैं आऊँगा ही, मगर झिझको नहीं। कुछ मदद चाहिए हो तो बोल दो। उसने कहा साब सब हो जाएगा। आज किसी को 20,000 देना ज़रूरी है। मेरा पैसा कल या परसों आएगा।
यही ज़रुरत है। इतनी मदद मुझे मिल जाए तो बड़ी कृपा होगी। जगजीत बोले , अच्छा तू बैठ। मैं अभी आया।अंदर गए। पाँच मिनट बाद आए तो ख़ुद हाथ में एक प्लेट में मिठाई लेकर आए। दूसरे हाथ में पचास हज़ार रूपए की गड्डी थी। कहने लगे ,शादी की अच्छी ख़बर सुनाई। मुँह मीठा कर और यह रख लो।
उसने देखा तो चौंका। बोला साहब ! बहुत हैं यह तो। जगजीत जी कहने लगे अरे बीस तो तेरे हैं। बाक़ी मेरे। मैं भी तो उसके बाप जैसा हूँ। बेटी की शादी धूमधाम से करना। लड़की की शादी है। चार लोग आएँगे तो ख़र्चा होता ही है। वह कर्मचारी फूट फूट कर रोने लगा।
उसने जगजीत के पैर छुए। कहा- साब। आप मेरे लिए भगवान से कम नहीं हो।मैंने देखा कि जगजीत जी के भी आँसू भर आए थे। मैंने तो बड़े बड़े रईस देखे हैं ,लेकिन दिलदार तो एक ही था और वह था - जगजीत सिंह। वो जिसकी मदद करते थे तो दोनों हाथों से, खुले हाथों से करते थे। उनके यहाँ जितने भी ड्राइवर काम करते थे, वो दूर दूर से आते थे।
जगजीत जी ने सबको मुंबई में एक एक घर उनके लिए लेकर दिया। ऐसा कोई इंसान करता है। मुझे तो उनके स्वभाव से जीवन भर के लिए यही सीख मिली कि जिसकी परेशानी में मदद करनी है तो उसको माँगने की ज़रूरत नहीं पड़नी चाहिए। अगर उसने माँगा और फिर आपने सहायता की तो वह मदद किस काम की?
जगजीत के एलबमों के क़रीब पच्चीस वर्षों तक साउंड इंजीनियर रहे दमन सूद भावुक होकर यादों में खो जाते हैं। वे बताते हैं- जगजीत सिंह बहुत पैसा दान करते थे।कई बार तो किसी को पता ही नहीं चलता था। वे चुपचाप ज़रूरतमंद के लिए अपनी थैली खोल देते थे।
उन्होंने ज़िंदगी भर अनगिनत लोगों का भला किया।कभी ऐसा भी हुआ कि मैं बोलता था - प्रभु यीशु पर कुछ रचनाएँ रिकॉर्ड करनी हैं।तो वे करते थे। उस दरम्यान कोई भी शो आ जाए, कितना ही पैसा मिलने वाला हो ,वे मना कर देते थे।रिकॉर्डिंग के बाद जब मैं उनकी फ़ीस देने की कोशिश करता तो साफ़ मना कर देते थे।
कहते थे ,परमेश्वर के लिए कोई पैसा लेता है क्या। सब कुछ उसी का तो दिया हुआ है। तो यह रूप था उनका। वो देते थे, तो उनको मिलता था। बरक़त थी उनके हाथ में। कितने ही धार्मिक एलबम उन्होंने एक ही आग्रह पर गाए और एक पैसा भी नहीं लिया।मुझे सबकी जानकारी है। इस तरह के लोग आजकल कहाँ मिलते हैं। जगजीत वाकई महान थे।
जगजीत सिंह के एक और सहयोगी अभिनव उपाध्याय पर्कशन बजाते थे।वे शुरुआत में जगजीत सिंह की टीम में शामिल होने के लिए काम माँगने गए। उनके हाथ में चोट थी और उन्हें पैसे की सख़्त आवश्यकता थी।जगजीत उन दिनों अपने एलबम कहकशां की रिकॉर्डिंग कर रहे थे।
अभिनव उपाध्याय की ज़रूरत सिर्फ़ दो चार दिन का काम मिलने से हल हो जाती। जगजीत ने उनको अगले दिन स्टूडियो बुलाया। जब उन्होंने अभिनव के हाथ की चोट देखी तो कहा तो कुछ नहीं। बस उन्हें रोज़ आने के लिए कह दिया करते थे ।दो दिन की जगह अभिनव दो महीने लगातार जाते रहे। उन्हें दो महीने का भुगतान मिला।
तब तक अभिनव उपाध्याय का हाथ पूरी तरह ठीक हो चुका था ।इसके बाद अभिनव उनकी टीम का अभिन्न अंग बन गए।अभिनव आज भी जगजीत को याद करके भाव विह्वल हो जाते हैं।
जगजीत के एक मित्र जसबीर सिंह मुंबई के वाशी इलाक़े में एक मशहूर रेस्टॉरेंट चिनाब के मालिक हैं। वे याद करते हैं- उन दिनों मेरी जगजीत सिंह से जान पहचान नहीं थी।लेकिन मैं उनका दीवाना था। अपने रेस्टॉरेंट में जगजीत की गाई ग़ज़लें ही बजाया करता था।
मेरी बड़ी ख़्वाहिश थी - काश ! जगजीत सिंह एक बार मेरे रेस्टॉरेंट में खाने पर आएँ।इन्ही दिनों वाशी में ही जगजीत का कार्यक्रम तय हुआ। किसी परिचित ने मुझसे संपर्क किया। पूछा कि क्या मैं शो के सह आयोजकों में शामिल होना चाहूँगा ।मैंने तुरंत हाँ कर दी। मैं मन ही मन ही मन बहुत प्रसन्न हो रहा था कि जगजीत सिंह से साक्षात मिलने का अवसर मिल रहा था।
शो में मेरे रेस्टॉरेंट का बैनर लगा था। मध्यांतर में सभी सह आयोजकों से जगजीत को मिलवाया गया। मैंने उसी दौरान अपने रेस्टॉरेंट में डिनर के लिए उन्हें आमंत्रित कर दिया। लेकिन आयोजकों ने किसी अन्य रेस्टारेंट में उन्हें ले जाने का पक्का कर लिया था। मगर जगजीत ने मेरा आग्रह तुरंत मंज़ूर कर लिया।
मैं तो हैरान हो गया। कितनी आसानी से एक बड़े कलाकार ने मेरे न्यौते को मंज़ूर कर लिया था। कार्यक्रम ख़त्म होने के बाद वे मेरे साथ रेस्टॉरेंट पहुँचे तो मेरे सारे कर्मचारी और वहाँ आए गेस्ट भौंचक्के रह गए। शानदार डिनर हुआ "।
इसके साथ ही जसबीर और जगजीत के क़रीब बारह साल चलने वाले रिश्ते की नींव पड़ गई। एक दिन जसबीर सिंह से जगजीत ने पूछा कि यह जगह इतनी शांत और बेहतरीन है। यहाँ का ख़ाना बहुत लजीज़ है ,लेकिन इसकी पहचान मुंबई में क्यों नहीं है? जसबीर सिंह के पास इसका कोई ठोस उत्तर नहीं था।
शायद वे अपने रेस्टॉरेंट की मार्केटिंग ढंग से नहीं कर पा रहे थे। इसके बाद जगजीत ने जसबीर से कहा कि क्या वे किसी चैनल वाले को जानते हैं ? जसबीर ने याद किया कि एक रेडियो चैनल के सीईओ रेस्टॉरेंट में नियमित रूप से आया करते हैं।
जगजीत सिंह ने जसबीर से कहा कि उनसे बात करो। क्या वे इस रेस्टॉरेंट से मेरे गायन का सीधा प्रसारण करेंगे ? जसबीर ने सीईओ से बात की। वे जगजीत सिंह का नाम सुनते ही उछल पड़े।
जसबीर सिंह ने रेस्टोरेंट में एन ईवनिंग विथ जगजीत करने का ऐलान कर दिया।अगले दिन चैनल की टीम ने तीन घंटे तक जगजीत के कार्यक्रम का सीधा प्रसारण किया।
इस कार्यक्रम के बीच बीच में जगजीत ने रेस्टॉरेंट का नाम लेते हुए कहा था कि इसका भोजन बहुत अच्छा है।मैं यहाँ नियमित आता हूँ। जसबीर बड़ी दुविधा में थे। इस तरह तो किसी रेस्टारेंट ने आजतक किसी कलाकार के ज़रिए अपना प्रमोशन नहीं कराया। जगजीत सिंह कहीं रेस्टॉरेंट का प्रचार करने के लिए मँहगी फ़ीस न माँग लें। बहरहाल कार्यक्रम हुआ और बहुत शानदार रहा। बाद में धन्यवाद देते हुए जसबीर जगजीत से फ़ीस के बारे में पूछने ही वाले थे कि जगजीत ने ताड़ लिया।
उन्होंने जसबीर सिंह का हाथ दबाया और कहा," हमारा प्यार का रिश्ता है। मेरी तरफ़ से अपने दोस्त को एक छोटा सा तोहफ़ा है। अगले दिन तो कमाल ही हो गया। रेस्टोरेंट में भोजन के लिए आने वालों की कतार लग गई। इतनी लंबी लाइन लगी कि उन्हें नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज की नौबत आ गई।
जसबीर कहते हैं कि पापाजी मेरे लिए सब कुछ थे।( जगजीत उनसे बीस साल बड़े थे और जसबीर उन्हें पापाजी ही कहते थे ) इसके बाद तो यह रेस्टॉरेंट पूरे इलाक़े में बेहद मशहूर हो गया।जसबीर सिंह जगजीत का उपकार कभी नहीं भूल सकते।क्या ऐसे रिश्तों की आज आप कल्पना कर सकते हैं ?
जसबीर के पास जगजीत की दयालुता के ढेरों क़िस्से हैं। वे बताते हैं कि अक्सर जगजीत उन्हें फ़ोन करते कि आज क्या कर रहे हो ? जसबीर कहते ," बताइए पापाजी। ख़ाली हूँ। फिर दोनों गाड़ी में निकल पड़ते। गाड़ी में बहुत सारे लिफ़ाफ़े रखे होते। उनमें दस -बीस हज़ार से लेकर लाख रुपए या इससे भी अधिक होते।
जगजीत कुछ ज़रूरतमंदों की नियमित मदद करते थे। वे दिन भर जसबीर को लेकर घूमते और उन ज़रूरतमंदों को घर जाकर लिफ़ाफ़े देकर आते। किसी को इसकी कानोंकान ख़बर नहीं होती। अब बताइए इस सेंटाक्लॉज को क्या नाम दिया जाए? लगता है कि देवदूत या फ़रिश्ता शब्द जगजीत जैसे लोगों के लिए ही गढ़ा गया होगा ।
इस तरह नए नए रिश्ते गढ़ने की कला में जगजीत सिंह पारंगत थे।इन रिश्तों को वे निभाते भी थे।हाँ यह बात अवश्य थी कि नया कोई रिश्ता बनाने से पहले वे अच्छी तरह परख लेते थे। जब स्वयं संतुष्ट हो जाते थे ,तभी आगे बढ़ते थे।
आप कितने ही संबंध बना लीजिए । सबसे मुश्किल तो उनको निस्वार्थ बचाए रखना होता है । आम तौर पर हम लोग ज़िंदगी में जिसकी मदद करते हैं ,वह अगर कभी धोखा देता है तो फिर उससे मुँह मोड़ लेते हैं। लेकिन जगजीत की डिक्शनरी से मुँह मोड़ लेने वाला मुहावरा ग़ायब था।
उनका जीवन दर्शन अपेक्षाओं पर आधारित नहीं था।बड़ी बात तो यह थी कि वे किसी से सहायता की उम्मीद करते ही नहीं थे।तो किसी के मुँह मोड़ने का सवाल ही नहीं उठता।उन्हें वास्तव में ज़रूरतमंद लोगों की सहायता में सुख मिलता था।यह आदत आम तौर पर लोगों में कम ही दिखाई देती है।लेकिन जगजीत सिंह तो इस तरह की मानवीय संवेदनाओं से ऊपर उठ चुके थे।
आज हम देखते हैं कि अपने ही प्रोफेशन में कोई क़ाबिल पेशेवर उठता दिखाई देता है तो उसके आगे बढ़ने में अपने साथी ही काँटे बिछाते हैं। उससे असुरक्षित महसूस करने लगते हैं और उसका नुक़सान करने की साज़िशें रचते हैं। जब हम जगजीत सिंह के सफ़र का समग्र मूल्यांकन करते हैं तो पाते हैं कि उन्हें अपने काम में वरिष्ठ कलाकारों से पेशेवर सहयोग नहीं मिला।उन्होंने ख़ुद ही अपना रास्ता बनाया।
जब वे इतने सक्षम हो गए कि नए कलाकारों की सहायता कर सकें तो उन्होंने न जाने कितने कलाकारों को आगे बढ़ाया और उन्हें अवसर दिए। ये कलाकार और गायक आज भी जगजीत सिंह के इस उपकार को याद रखते हैं। तलत अजीज़ कहते हैं ," बड़े दिलदार आदमी थे।मैं जानता हूँ ऐसे कितने लोग हैं चाहे वो उनके म्यूजीशियन हों या साथी रहे हों या फिर कोई ज़रूरतमंद होता था तो वे उसकी सहायता करते थे।
किसी को भी कानों कान ख़बर तक नहीं होती थी।यहाँ तक कि चित्राजी को भी पता नहीं चलता।कितनी बड़ी बात थी। एक म्यूजीशियन थे। नाम तो नहीं लूँगा। उनका बुरा वक़्त आया।जगजीत को यह पता चल गया तो उन्होंने उनके लिए छोटी सी आइसक्रीम फैक्टरी खुलवा दी,जिससे उनकी फैमिली की आमदनी के लिए एक नियमित ज़रिया बन जाए।तो इंसान के तौर पर ऐसी खूबी कहीं देखने को मिलती है आज ?
तलत अजीज़ कहते हैं," वे हैदराबाद आए थे। चित्रा जी के साथ। मैं और मेरे माता पिता उनसे मिलने होटल गए।अपने घर खाने का निमंत्रण दिया।मेरे पिता जी उन्हें लेने गए। सहजता देखिए कि यह महान गायक जोड़ी मेरे घर भोजन करने आ गई। घर पर ही मैंने चार पाँच ग़ज़लें मेंहदी हसन की शैली में गाई।
उन्हें बहुत पसंद आई लेकिन उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि अपना अलग अंदाज़ विकसित करो। साल भर बाद मैं मुंबई गया।जगजीत और चित्रा जी से मिला और अपने एक एलबम के लिए सहायता माँगी।
जगजीत ने भरपूर मदद की।मेरा पहला एलबम तलत अजीज़ विद जगजीत सिंह उनके ही संगीत निर्देशन में जारी हुआ।तो आप कह सकते हैं कि मेरी आवाज़ लाखों करोड़ों संगीत प्रेमियों तक जगजीत सिंह की वजह से ही पहुँची।
टेलेंट ऑफ़ एटीज के एक और ग़ज़ल गायक अशोक खोसला जगजीत को अत्यंत भावुक होकर याद करते हैं। वे कहते हैं ," जगजीत साब जितने अच्छे कलाकार थे ,जितने अच्छे फ़नकार थे,उससे बहुत अच्छे इनसान थे। लोगों की दिल खोलकर हेल्प करते थे।
आप किसी को भी पूछिए,सब यही कहेंगे। मैं अपनी एक बात बताता हूँ।एक दिन मैंने उनको फ़ोन किया तो बोले आजकल कहाँ हो ,क्या कर रहे हो तो मैंने बताया कि पुणे के क़रीब एक ओल्ड एज होम बनाया है।तो सुनकर बहुत ख़ुश हुए।बोले मुझे ले चलो वहाँ पर।तो एक दिन मैं उनको ले गया।
वहाँ घूम कर सब देखा और वहाँ रहने वालों से मिले तो उनकी आँखों में आँसू आ गए।जब वहाँ चक्कर लगा रहे थे तो बगल का एक प्लॉट खाली दिखाई दिया। मुझसे बोले, अशोक ! तुम कल के रोज़ अपने ओल्ड एज होम का विस्तार करोगे।उस समय यह प्लॉट मिले या न मिले। तुम इसको फ़ौरन ख़रीद लो।
मैंने कहा कि इसके लिए तो फंड का इंतज़ाम करना पड़ेगा।अभी तो मेरे पास इतना पैसा नहीं है।तो बोले चिंता करो।पैसा मैं देता हूँ। तुम प्लॉट खरीद लो।उन्होंने मदद की। हमने ज़मीन ख़रीदी।
वहाँ बिल्डिंग बन गई। जहाँ सिर्फ़ 35 लोग रहते थे ,इस नई बिल्डिंग बन जाने से 100 लोग रहने लगे ।आल थेंक्स टू जगजीत सिंह। उनका दिल बड़ा उदार था और सबके प्रति प्यार से भरा हुआ था।
ग़ज़लों के मायने हमने जगजीत से समझे हैं। उनके सहयोग से मेरे अनेक एलबम निकले हैं। उनकी सत्तरवीं सालगिरह पर कार्यक्रम चल रहा था। मैं श्रोताओं में था। उस कार्यक्रम में उन्होंने मुझे आमंत्रित किया और गायन का न्यौता दिया। यह कहना बड़ी बात नहीं होगी कि आज के कमोबेश हर ग़ज़ल गायक को रोज़ी रोटी जगजीत साहब की बदौलत ही मिल रही है। हम सभी उनके एहसानमंद हैं।
एक और ग़ज़ल गायक घनश्याम वासवानी को उन्होंने टेलेंट ऑफ एटीज़ में मौक़ा दिया था। वे याद करते हैं , " उन दिनों मैं शौकिया गाता था। मुंबई के एक सरकारी कॉलेज में क़ानून की पढ़ाई कर रहा था।एक दिन वहाँ गायन प्रतियोगिता में निर्णायक के तौर पर जगजीत-चित्रा आए ।
मेरा गायन सुनने के बाद उन्होंने मुझे बुलाया।कहने लगे कि मेहनत करो। तुम्हारी आवाज़ पर पकड़ है। आगे जाओगे। मैंने संकोच में कहा कि इस ग़ज़ल गायन से घर का गुज़ारा कैसे होगा तो बोले कि मैं तुम्हारी मदद करूँगा।ऐसा कोई आज कहता है? उन्होंने फिर एलबम निकाला। यह बहुत लोकप्रिय हुआ।
एक और कमाल के गायक हैं विनोद सहगल। जगजीत ने उनको भी भरपूर अवसर दिया था। टेलेंट ऑफ एटीज़ में उनकी आवाज़ भी हमें सुनाई देती है। विनोद अपनी संगीत यात्रा से जगजीत के रिश्ते को कुछ इस तरह जोड़ते हैं- जगजीत जी के साथ तबला वादक थे हरीश वानकर।
उनके सहयोग से ही मैं जगजीत जी से मिला। हालाँकि मुझे झिझक थी कि जो खुद सिंगर हो ,वो दूसरे की मदद क्यों करेगा ? हरीश भाई ने कहा कि तुम उस आदमी को नहीं जानते।दिल का राजा है।जब मिलोगे तो पता चल जाएगा। वाकई ।जब मिला तो उसके कुछ दिन बाद ही उन्होंने मुझे स्टेज पर चांस दिया।
इसके बाद उनके संगीत निर्देशन में आई फिल्म रावण का थीम सांग भी मैंने ही गाया। इतना ही नहीं, टेलेंट ऑफ एटीज़ में उन्होंने मेरी दो ग़ज़लें रिकॉर्ड कीं। यह एलबम बहुत लोकप्रिय हुआ।
इसके बाद 1984 में जगजीत ने मेरा पूरा एलबम ही निकाल दिया।नाम था - जगजीत सिंह प्रजेंट्स विनोद सहगल।कैसे कहूँ कि अपने नाम के साथ उनका नाम जुड़ा देखकर अदभुत खुशी मिलती थी।
इसके बाद भी उनसे संपर्क बना रहा। उन्होंने दूरदर्शन पर प्रसारित गुलज़ार के ऐतिहासिक धारावाहिक मिर्ज़ा ग़ालिब में भी मुझे गायन का मौका दिया।मैं उनका उपकार जीवन भर नहीं भूल सकता।
ज़िंदगी के आख़िरी दिनों तक वे समाज को देने के प्रयास करते रहे। लुधियाना के डॉक्टर केवल धीर बताते हैं ," हम क़रीब क़रीब पचास बरस से लुधियाना के बेजोड़ शायर साहिर लुधियानवी के नाम पर जश्न ए साहिर करते आ रहे हैं। दस - पंद्रह साल से इस आयोजन में आर्थिक दिक़्क़तें आ रही हैं। मैं 2011 में लंदन गया।
वहाँ जगजीत और मेरे एक साझा दोस्त थे -चमन लाल चमन। वे अच्छे शायर भी थे और ब्रिटेन में जगजीत के शो -प्रबंधन में भी सहायता करते थे।उनके साथ गपशप में एक दिन जश्न ए साहिर का ज़िक्र आया। मैंने उस समय इस कार्यक्रम के आयोजन में आ रही परेशानियों का ज़िक्र किया। चमन जी बोले ,अरे साहिर तो जगजीत के पसंदीदा शायर हैं।
लुधियाना के थे और जगजीत का भी इस शहर से गहरा नाता है। तो मैं उससे बात करता हूँ। उन्होंने तुरंत जगजीत को फ़ोन लगाया और मेरे बारे में बताया। साथ ही समस्या का ब्यौरा भी दे दिया। जगजीत सिंह ने तपाक से कहा कि मैं डॉक्टर धीर को जानता हूँ। उनसे कहिए कि फंड की चिंता न करें। अगले कार्यक्रम में आऊँगा और गाऊँगा।
इसका फंड जुटाना मेरी ज़िम्मेदारी है और मैं इतनी व्यवस्था कर दूँगा कि डॉक्टर धीर को आगे भी कभी परेशानी नहीं आएगी। इसके बाद चमन लाल चमन ने मेरी बात कराई। उन्होंने पंजाबी में ही कहा कि मैं दो चार दिन में मुंबई पहुँच जाऊँगा। तो आप मुंबई आ जाएँ। हम बात करेंगे।आपको कोई मुश्किल नहीं आएगी।
साहिर साब के लिए हम सब मिलकर करेंगे। मैं ख़ुश हो गया। मैं अगले दिन फ्लाइट टिकट देख ही रहा था कि ख़बर आई कि जगजीत जी अस्पताल में भरती हैं।मैंने सोचा कि चलो ! अस्पताल से छुट्टी हो जाए ,फिर मिलने जाऊँगा। इसके बाद तो वे लौट कर ही नहीं आए। आज सोचता हूँ कि भले ही यह अवसर नहीं आया ,लेकिन क्या जगजीत की शक़्ल में मुझे देवदूत नहीं मिला था।
जगजीत सिंह के उपकार संसार में बिखरी अनगिनत कथाओं के बारे में तो हमें जानकारी ही नहीं है। लेकिन दिल पर हाथ रखकर सोचिए कि जो उदाहरण हमारे सामने आए हैं , क्या वे उन्हें आसमान से उतरा एक फ़रिश्ता नहीं बनाते?
Updated on:
08 Feb 2026 09:39 pm
Published on:
08 Feb 2026 09:33 pm
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