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बिहार की IITian फैक्ट्री: बुनकरों के इस गांव में हर घर में है इंजीनियर, इस साल भी बच्चों ने JEE में गाड़े झंडे

Bihar IITian Factory: बिहार के गया जिले के पटवा टोली गांव को IITian फैक्ट्री के रूप में जाना जाता है। बुनकरों के इस गांव में आज लगभग हर घर में एक इंजीनियर मौजूद है। इस साल भी यहां के बच्चों ने JEE की परीक्षा में अच्छी सफलता हासिल की है। 

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Jun 01, 2026
लाइब्रेरी में पढ़ाई करते पटवा टोली के बच्चे (फोटो - vriksh be the change)

Bihar IITian Factory:बिहार के गया जिले का एक छोटा सा गांव पटवा टोली आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। कभी सिर्फ करघों की खट-खट और कपड़ा बुनाई के लिए मशहूर यह इलाका आज 'IITian विलेज' और 'IITian फैक्ट्री' के नाम से जाना जाता है। 98 प्रतिशत साक्षरता दर वाले इस गांव के बच्चों ने इस बार भी बेहतरीन सफलता हासिल की है। इस साल JEE Main की परीक्षा में इस गांव के 41 छात्र शामिल हुए थे, जिसमें से 31 छात्रों ने सफलता हासिल की थी। जिसमें से JEE Adavnced में इस साल 15 से 20 बच्चों ने सफलता हासिल की है।

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1991 से शुरू हुआ था बदलाव का सफर

पटवा टोली के IIT फैक्ट्री बनने का सफर आज से करीब तीन दशक पहले साल 1991 में शुरू हुआ था। उस साल गांव के एक साधारण बुनकर के बेटे जितेंद्र कुमार ने तमाम अभावों के बावजूद पहली बार IIT-JEE की परीक्षा पास की और IIT-BHU में एडमिशन लिया। इसके बाद वे अमेरिका की एक बड़ी कंसल्टेंसी फर्म में काम करने चले गए। जितेंद्र की इस कामयाबी ने पटवा टोली के दूसरे बच्चों के भीतर एक नई अलख जगा दी।

बच्चों के पढ़ने के लिए 24 घंटे खुली रहती है लाइब्रेरी

इस गांव की सफलता का सबसे बड़ा राज यहां का कम्युनिटी-ड्रिवन सपोर्ट सिस्टम है। गांव के ही सीनियर आईआईटी ग्रेजुएट्स और इंजीनियरों ने मिलकर 'Vriksh - Be the Change' नाम का एक संगठन बनाया है। चंद्रकांत पटेश्‍वरी द्वारा साल 2013 में औपचारिक रूप से शुरू किया गया यह संस्थान आर्थिक रूप से कमजोर, बुनकरों और मजदूरों के बच्चों को मुफ्त कोचिंग, इंजीनियरिंग की किताबें और बेहतरीन मेंटरशिप देता है। संकरी गलियों और पावरलूम की आवाजों के बीच यहां एक दोमंजिला इमारत में 'वृक्ष पाठशाला' चलती है। यह एक ऐसी लाइब्रेरी है जो छात्रों के लिए 24 घंटे और सातों दिन खुली रहती है, जहां छात्र दिन-रात पढ़ाई करते हैं।

अब हर घर में है एक इंजीनियर

करीब 20,000 की आबादी वाले पटवा टोली को 'बिहार का मैनचेस्टर' भी कहा जाता है, जहां लगभग 8,000 पावरलूम और कुछ हैंडलूम हैं। पारंपरिक रूप से यहां का मुख्य व्यवसाय कपड़ा बुनाई ही रहा है, लेकिन जब इस काम में मंदी आई और आर्थिक तंगी बढ़ी, तो यहां के लोगों ने अपनी तकदीर बदलने के लिए शिक्षा को जरिया बनाया। साल 1998 से लेकर अब तक इस छोटे से बुनकर समाज ने अकेले IITs में 300 से अधिक छात्र भेजे हैं। इसके अलावा हजारों छात्र NITs और देश के अन्य प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेजों में पढ़ाई कर रहे हैं। आज हालत यह है कि पटवा टोली के लगभग हर एक घर में एक इंजीनियर मिल जाएगा।

बेटियों ने भी रचा इतिहास

'वृक्ष' संस्थान ने इस शैक्षिक क्रांति में लड़कियों की भागीदारी पर भी विशेष काम किया है। संस्थान द्वारा छात्राओं के लिए अलग से रहने और पढ़ने की सुरक्षित व्यवस्था की गई। यही वजह है कि पारंपरिक बंधनों को पीछे छोड़ते हुए यहां की बेटियां अब लगातार आगे बढ़ रही हैं। इस साल भी JEE Main पास करने वाले 31 बच्चों में 14 बेटियां शामिल हैं, जो इस बात का सबूत हैं कि अब पटवा टोली की लड़कियां भी इंजीनियरिंग और देश की अन्य कठिन परीक्षाओं में लड़कों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं।

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Updated on:
01 Jun 2026 01:27 pm
Published on:
01 Jun 2026 01:19 pm
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