दशकों से गोरखपुर लोकसभा सीट पर दोनों जातियां राजनैतिक वर्चस्व के लिए आमने-सामने होती रही
गोरखपुर। लोकसभा उपचुनाव में दशकों बाद ठाकुर-ब्राह्मण एकसाथ मिलकर चुनाव मैदान में उतरे। वर्चस्व की सालों पुरानी लड़ाइयों को भुलाकर दोनों बिरादरी मंच पर कई दशक बाद एकसाथ दिखी लेकिन जनता ने नकार दिया।
पूर्वांचल का गोरखपुर क्षेत्र दशकों पूर्व से ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्चस्व की लड़ाई देखता रहा है। शायद ही कोई चुनाव यहां हुआ हो जहां राजनैतिक वर्चस्व की लड़ाई में दोनों जातियों के क्षत्रपों ने अपनी-अपनी बिसात न बिछाई हो। लेकिन बदलते राजनैतिक माहौल में इस बार ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिला। बीजेपी ने दोनों जातियों को साधते हुए इस बार इस जंग को विराम सा लगा दिया था। क्षत्रियों के अगुवा माने जाने वाले योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाने के बाद उनको ही गोरखपुर उपचुनाव का सारा दारोमदार दे दिया। वहीं दूसरी ओर प्रत्याशी के रूप में ब्राह्मण बिरादरी से ताल्लुक रखने वाले उपेंद्र दत्त शुक्ल चुनावी मैदान में उतार दिया।
यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि मुख्यमंत्री के रूप में सूबे की कमान संभाल रहे योगी आदित्यनाथ ने यह सीट खाली की थी। चुनाव जीतना उनके लिए प्रतिश्ठा का भी सवाल था। जबकि प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरे उपेंद्र दत्त शुक्ल भले ही संगठन की पसंद हो लेकिन वह योगी विरोधी खेमे में पूर्व में माने जाते रहे हैं। हालांकि, विगत कुछ सालों से दोनों पक्षों का यह विरोध कभी भी सामने नहीं आ सका और सभी एक मंच पर दिखते रहे।
सबसे महत्वपूर्ण यह कि उपचुनाव में बीजेपी ने ब्राह्मण प्रत्याशी उतारकर एक जाति की नाराजगी दूर की ही साथ ही यहां दशकों से देखी जा रही ब्राह्मण-क्षत्रिय वर्चस्व को भी विराम लगा दी। पूरे चुनाव भर दोनों जातियों के लोग एकमंच पर जीत का मंत्र फूंकते दिखे। इस उपचुनाव में दोनों जातियों के लोग किसी भी सूरत में एक दूसरे केखिलाफ इस वजह से भी नहीं जा सके क्योंकि योगी आदित्यनाथ के सीधे जुड़े होने की वजह से ठाकुर विरोध नहीं कर पाया, वहीं स्वजातीय प्रत्याशी उतारे जाने से ब्राह्मण किसी भी सूरत में अलग होने की नहीं सोचा। ऐसे में दोनों जातियों के लोग इस चुनावी जंग को जीतने की कोशिश में लगे रहे।
उपचुनाव में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद कमान संभाले हुए थे। उन्होंने अपने चुनाव में जितनी सभाएं नहीं की थी, उससे कहीं अधिक जनसभाएं उपेंद्रदत्त शुक्ल की जीत के लिए की थी। इनके अलावा योगी खेमा पूरी तरह इस चुनाव में जुटा हुआ दिखा। उधर, बीजेपी संगठन और आरएसएस की ओर से बूथ स्तर पर रणनीति गई। यही नहीं सारा कामधाम छोड़कर केंद्रीय वित्त मंत्री शिव प्रताप शुक्ल भी पूरी तन्मयता से प्रचार में लगे रहे। भाजपा विधायक डाॅ.राधा मोहन दास अग्रवाल भी काफी सक्रियता के साथ दिखे। तो ब्राह्मण राजनीति का प्रमुख केंद्र पूर्व मंत्री पंडित हरिशंकर तिवारी का खेमा भी इस बार विरोध की बजाय चुप रहा।
दोनों जातियों के वर्चस्व का केंद्र रहा है 'मंदिर' और 'हाता'
पूर्वान्चल में ठाकुर व ब्राह्मण जाति के वर्चस्व का केंद्र 'मंदिर' और 'हाता' रहा है। दशकों पहले से पूर्वान्चल विशेषकर गोरखपुर और आसपास के जिलोंइ ब्राह्मण राजनीति का केंद्र हाता यानी पूर्व मंत्री हरिशंकर तिवारी व ठाकुर राजनीति का केंद्र माफिया वीरेंद्र प्रताप शाही के बाद मंदिर के आसपास रहा। सीधे तौर पर तो नहीं लेकिन हर चुनाव में दोनों तरफ जबरदस्त धु्रवीकरण देखने को मिलता रहा। छोटे से लेकर बड़े चुनाव में दोनों धु्रवों के आशीर्वाद से ही प्रत्याशी उतरते रहे और मतों का धु्रवीकरण भी देखने को मिलता रहा है। लेकिन गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव कई दशक बाद पहला चुनाव रहा जब वर्चस्व की जंग छोड़ दोनों जातियों के लोग एक प्रत्याशी को जीताने में जुटे रहे। पर परिणाम जब आया तो दोनों जातियों की एका धरी की धरी रह गई। जनता ने दोनों के वर्चस्व को तोड़ दिया था।
उपचुनाव में निषाद जाति से ताल्लुक रखने वाले प्रवीण निषाद को गोरखपुर का सांसद बनाने के साथ ही यह संदेश भी जनता ने दिया कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वाेपरि है।