MP News: विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चेदानी निकालने के इन कुल मामलों में से लगभग 70 प्रतिशत ऑपरेशन सर्वाइकल कैंसर के कारण हो रहे है।
HPV vaccine: गुना जिले में महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर एक बेहद डरावनी और चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। जिला अस्पताल के आंकडे तस्दीक कर रहे हैं कि सर्वाइकल कैंसर अब महज एक बीमारी नहीं, बल्कि एक विकराल स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है। जिले में हर महीने औसतन 30 से 40 महिलाओं की बच्चेदानी (यूटरस) निकालने के लिए मेजर सर्जरी की जा रही है। साल भर का यह आंकड़ा 400 के पार जा रहा है। यह स्वास्थ्य विभाग के लिए खतरे की घंटी है। विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चेदानी निकालने के इन कुल मामलों में से लगभग 70 प्रतिशत ऑपरेशन सर्वाइकल कैंसर के कारण हो रहे है।
जिला अस्पताल में रोजाना पहुंच रहे केस यह साफ संकेत दे रहे कि बीमारी गंभीर रूप ले चुकी है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि शुरुआती दौर में यह कैंसर बिना किसी खास तकलीफ के पनपता है। महिलाएं जागरूकता की कमी और मामूली लक्षणों को नजरअंदाज करने के कारण समय पर जांच नहीं करातीं। नतीजा यह होता है कि जब तक बीमारी पकड़ में आती है, तब तक सर्जरी और अंग को शरीर से अलग करना ही एकमात्र रास्ता बचता है। (MP News)
चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय पर जांच और टीकाकरण करा लिया जाए तो 90 प्रतिशत मामलों को सर्जरी की नौबत आने से पहले ही रोका जा सकता है। सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम के लिए एचपीवी टीका सबसे अचूक सुरक्षा कवच है। 14 से 15 वर्ष की उम्र में लगाया यह टीका भविष्य में कैंसर की आशंकाओं को जड़ से खत्म कर सकता है। सरकारी आंकड़ों के अलावा निजी अस्पतालों की स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही है, जहां बड़ी संख्या में महिलाएं इस समस्या से जूझ रही हैं।
हर साल 400 से अधिक बच्चेदानी के ऑपरेशन हो रहे हैं, जिनमें करीब 70 फीसदी मामले ग्रामीण अंचलों से हैं। इसकी मुख्य वजह समय पर इलाज न कराना और जांच में देरी है। वहीं शहरी इलाकों में जागरूकता के चलते महिलाएं शुरुआती स्तर पर इलाज करा लेती हैं।
भारत सरकार के एचपीवी टीकाकरण अभियान के तहत जिले में 14 वर्ष की लगभग 16 हजार बालिकाओं को चिह्नित किया गया है। यदि इस उम्र में इन किशोरियों का टीकाकरण पूर्ण कर लिया जाए, तो जिले को भविष्य में सर्वाइकल कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से मुक्त किया जा सकता है। वर्तमान में स्वास्थ्य विभाग द्वारा इन किशोरियों को तेजी से सुरक्षा कवच देने का प्रयास किया जा रहा है ताकि सैकड़ों महिलाओं को भविष्य में होने वाले मेजर ऑपरेशन और जान के जोखिम से बचाया जा सके।
पहला केस- शहर की एक कॉलोनी में रहने वाली 29 वर्षीय कमरून (परिवर्तित नाम) जब बात करने बैठीं तो आवाज कांप रही थी। बार-बार यही कहती रहीं कि मेरा नाम अखबार में नहीं आना चाहिए। 20 साल की उम्र में सर मण ने ऐसा घेरा कि जान बचाने के लिए बच्चेदानी निकालनी पड़ी। आज यह कई मास्टर डिग्रियां कर चुकी हैं, आत्मनिर्भर हैं, पर शादी का सपना टूट-टूटकर बिखरता है। हर साल रिश्ते आते हैं। पसंद भी करते हैं। बात आगे बढ़ती है और जैसे ही ऑपरेशन की सच्चाई सामने आती है, रिश्ता खत्म। कहा जाता है कि शादी मतलब संतान। इस अस्वीकार के बीच कमरून अकेलेपन तनाव और धिड़षिड्यन से रोज जूझती हैं। उच्च शिक्षित होकर भी एक अभकहा दर्द ढो रही है। अब तक 22 रिश्ते आ चुके हैं, लेकिन बच्चेदानी न होने की वजह से शादी से इंकार कर देते हैं।
दूसरा केस- बमोरी की भूरी बाई (परिवर्तित नाम) की जिंदगी घरेलू जिम्मेदारियों में उलझी रही। शुरुआती संर मण को उन्होंने मामूली समझकर टाल दिया। दूरी समय और मजबूरियों के बीच जांच टलती रही। तीन साल इलाज चला। कभी दवाइयां, कभी जांच, कभी अस्पताल की कतारें। हर बार उम्मीद जगी, हर बार टूटी। आखिरकार चिकित्सकों ने कहा कि अब ऑपरेशन ही रास्ता है। 35 की उम्र में बच्चेदानी निकल गई। दर्द कम हुआ पर खालीपन बस गया। वह बताती हैं कि आज वह जल्दी थक जाती हैं। कमजोरी रहती है, नींद टूट-टूटकर आती है। हामौन बिगड़े तो मन चिड़चिड़ा हो गया। खुद को अधूरा महसूस करती रहती हैं। (MP News)