
Gwalior news:मध्यप्रदेश भर में आम जनता की सेहत से खिलवाड़ करने वाले मिलावटखोरों पर नकेल कसने के प्रशासनिक दावे हवा-हवाई साबित हो रहे हैं। खाद्य सुरक्षा प्रशासन अभियान चलाकर सैंपल भरता है। अमानक आने पर मामला न्याय निर्णय अधिकारी एडीएम कोर्ट के पास पहुंचता है और भारी-भरकम जुर्माना भी ठोकते हैं, लेकिन असली पेच वसूली पर फंस जाता है। आलम यह है कि बीते ढाई साल के दौरान पूरे मध्य प्रदेश में मिलावटखोरों पर 20.67 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया गया, लेकिन सरकारी खजाने में अब तक सिर्फ 6.74 करोड़ रुपए ही आ सके हैं।
वसूली का यह आंकड़ा कुल पेनल्टी का एक-तिहाई करीब 32.6 फीसदी भी नहीं है। खाद्य सुरक्षा विभाग ने ये आंकड़े एक याचिका की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट में पेश किए हैं। जांच और जब्ती की प्रक्रिया में खाद्य सुरक्षा विभाग के अफसरों द्वारा बरती जाने वाली लापरवाहियां मिलावटखोरों के लिए वरदान साबित हो रही हैं। लंबे समय तक यह कार्रवाई से बचे रहते हैं। जब व्यापारी जिला कोर्ट में एडीएम कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील दायर करते हैं, तो विभाग की कमजोर कागजी कार्रवाई और लचर पैरवी की वजह से केस टिक नहीं पाते। नतीजा यह निकल रहा है कि कोर्ट में अपील के दौरान लाखों रुपए के जुर्माने घटकर 40 हजार रुपए से भी नीचे आ रहे हैं, जिससे मिलावटखोर बेखौफ होकर बच निकलते हैं।
राजधानी से लेकर चंबल-ग्वालियर अंचल तक स्थिति कमोबेश एक जैसी है। अकेले ग्वालियर जिले की बात करें तो बीते डेढ़ साल में मिलावट और अमानक खाद्य सामग्री पाए जाने पर 90 लाख रुपए से अधिक का जुर्माना लगाया गया। हालांकि, यहां भी अफसरों की सुस्ती के चलते वसूली की रफ्तार रेंग रही है। विभाग अब लाइसेंस निलंबित करने जैसे सख्त कदम उठाने का दावा तो कर रहा है, लेकिन ठोस रिकवरी और मजबूत अदालती पैरवी के अभाव में अभियान रस्म अदायगी बनकर रह गया है।
खाद्य सुरक्षा विभाग के कार्य की जो रिपोर्ट तैयार की थी, उसमें सुधार की जरूरत बताई थी। कानून में जो बदलाव किया गया है, अमानक खाद्य पदार्थ पाए जाने पर जुर्माने का प्रावधान है, पर कड़ी सजा नहीं है। जुर्माना वसूली पर सख्ती होना चाहिए। - बीएम शर्मा, सेवा निवृत्त आइएएस
-दुकानदार किराए के मकान में कारोबार करता है। जुर्माना लगने पर वह संस्थान बंद कर जाते हैं।
-भू-राजस्व संहिता के तहत आरआरसी जारी करने लंबी प्रक्रिया है, जिससे मिलावटखोर को समय मिल जाता है।
-कई कारोबारी एडीएम कोर्ट द्वारा जुर्माना तय किए जाने के बाद राज्य खाद्य सुरक्षा अपीलीय अधिकरण या हाईकोर्ट में अपील दायर कर देते हैं।