ग्वालियर

सरकारी संपत्ति न किसी अफसर की, न मुख्य सचिव, वे सिर्फ ट्रस्टी, इन रक्षा का दायित्व है , स्वयं मालिक समझने लगे तो दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति बनेगी

हाईकोर्ट की एकल पीठ ने शासकीय भूमि से जुड़े गंभीर मामले में झूठा व लापरवाह हलफनामा प्रस्तुत करने को लेकर भिंड कलेक्टर की भूमिका पर कड़ी टिप्पणी की है। शासकीय भूमि किसी अधिकारी या सरकार की निजी संपत्ति नहीं है। मुख्य सचिव और राज्य सरकार केवल ट्रस्टी हैं, जिनका कर्तव्य सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना […]

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Jan 21, 2026
मुख्य सचिव द्वारा दी गई प्रशासनिक चेतावनी को भिंड कलेक्टर की सेवा-पुस्तिका में दर्ज किया जाए, इस आदेश की प्रति भी सेवा अभिलेख का हिस्सा बने

हाईकोर्ट की एकल पीठ ने शासकीय भूमि से जुड़े गंभीर मामले में झूठा व लापरवाह हलफनामा प्रस्तुत करने को लेकर भिंड कलेक्टर की भूमिका पर कड़ी टिप्पणी की है। शासकीय भूमि किसी अधिकारी या सरकार की निजी संपत्ति नहीं है। मुख्य सचिव और राज्य सरकार केवल ट्रस्टी हैं, जिनका कर्तव्य सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना है। यदि अधिकारी स्वयं को मालिक समझने लगें, तो यह गंभीर और दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। इस मामले में तत्कालीन कलेक्टर भिंड केएल मीणा द्वारा तथ्य सत्यापित किए बिना न्यायालय के समक्ष गलत बयान देने को अदालत ने गंभीर लापरवाही माना। अदालत ने कलेक्टर केएल मीणा की ओर से प्रस्तुत बिना शर्त माफी को देखते हुए उदारता दिखाते हुए अवमानना की कार्यवाही शुरू नहीं करने का निर्णय लिया। इसके साथ ही यह निर्देश दिया कि मुख्य सचिव द्वारा दी गई प्रशासनिक चेतावनी को सेवा-पुस्तिका में दर्ज किया जाए और इस आदेश की प्रति भी सेवा अभिलेख का हिस्सा बने। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में इस चेतावनी को यह कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकेगा कि अधिकारी ने दोबारा ऐसी गलती नहीं की।

मामला क्या है

आदेश के अनुसार वर्ष 2007 में तहसीलदार भिंड द्वारा दंदरौआ सरकार पब्लिक ट्रस्ट को 46 खसरा नंबरों की कुल 55.43 हेक्टेयर सरकारी भूमि पौधरोपण (प्लांटेशन) के उद्देश्य से पट्टे पर दी गई थी। इस आवंटन के खिलाफ अपील हुई, जिसके बाद कलेक्टर भिंड ने 25 अप्रैल 2011 को लीज निरस्त कर दी। आयुक्त चंबल संभाग ने भी कलेक्टर के फैसले को बरकरार रखा, लेकिन 15 जनवरी 2015 को राजस्व मंडल ने कलेक्टर और आयुक्त के आदेश पलटते हुए ट्रस्ट के पक्ष में फैसला दे दिया। राजस्व मंडल के आदेश के खिलाफ शासन ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई की। इसकी जानकारी मांगी, लेकिन प्रशासन ने कार्रवाई नहीं की तो याचिका खारिज हो गई। याचिका को फिर से सुनवार्ई में लाने के लिए आवेदन लगाया। भिंड कलेक्टर केएल मीणा ने गलत जानकारी दी।

कोर्ट ने अहम टिप्पणी

-झूठ बोलना गंभीर अपराध: कोर्ट ने सरकार के उस तर्क को खारिज कर दिया कि यह मामला औपचारिक दंड देने लायक गंभीर नहीं था। कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक अधिकारियों के सामने झूठ बोलना कानून-व्यवस्था के लिए खतरनाक है। यह गंभीर अपराध है।

सर्कुलर का लाभ नहीं मिलेगा: 1981 के एक सरकारी सर्कुलर के अनुसार, सुधार होने पर प्रशासनिक चेतावनी को नजरअंदाज किया जा सकता है, लेकिन कोर्ट ने आदेश दिया कि कलेक्टर मीणा के मामले में यह छूट लागू नहीं होगी।

-कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत हलफनामे में कलेक्टर केएल मीणा ने यह दर्शाया कि कार्रवाई आयुक्त, चंबल संभाग के स्तर पर लंबित है, जबकि वास्तविकता यह थी कि प्रस्ताव आवश्यक दस्तावेजों के अभाव में दो बार वापस भेजा गया था। इस तथ्य को छिपाने पर कोर्ट ने नाराजगी जताई और इसे न्यायालय को गुमराह करने वाला आचरण बताया। मुख्य सचिव द्वारा की गई जांच में भी यह निष्कर्ष निकला कि कलेक्टर ने आयुक्त कार्यालय अथवा राजस्व विभाग से समन्वय किए बिना हलफनामा दायर किया, जो अस्वीकार्य है।

Updated on:
21 Jan 2026 11:17 am
Published on:
21 Jan 2026 11:12 am
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