
Gwalior High Court Order: मकान मालिक और किराएदार के विवाद से जुड़े एक अहम मामले में एमपी के ग्वालियर हाईकोर्ट की सिंगल बैच ने निचली अदालतों के फैसले को सही ठहराते हुए किराएदार की अपील खारिज कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बेदखली के मामले में किराएदार को मकान मालिक के स्वामित्व की गहराई से जांच कराने का कोई विधिक अधिकार नहीं है। इसके साथ ही न्यायालय ने किराएदार के मालिकाना हक (प्रतिकूल कब्जे) के दावे को भी सिरे से खारिज कर दिया।
मामला शहर के लश्कर स्थित शिंदे की छावनी तिराहा के एक मकान (पुरानी नगर निगम संख्या 25/95, नई संख्या 36/1657) से जुड़ा है। मकान मालिक पवन कुमार पाठक ने किराएदार सुरेश चतुर्वेदी के खिलाफ कोर्ट में बेदखली का मुकदमा दायर किया था। मकान मालिक का कहना था कि सुरेश चतुर्वेदी को वर्ष 1986 में 300 रुपए मासिक किराए पर यह परिसर दिया गया था। बाद में किराएदार ने खुद का एक बड़ा मकान खरीद लिया और सपरिवार वहां रहने लगा, लेकिन इस दुकान/दफ्तर वाले हिस्से को खाली नहीं कर रहा था और किराए का भुगतान भी बंद कर दिया था।
इस मामले में ग्वालियर की निचली सिविल अदालत और जिला अदालत पहले ही मकान मालिक के पक्ष में बेदखली का डिक्री आदेश जारी कर चुकी थीं। इस फैसले को किराएदार ने हाई कोर्ट में चुनौती दी दी थी। थी। किराएदार का तर्क था कि कि जिस शांति देवी ने उन्हें किराए पर रखा था, वह मकान की असली मालिक नहीं थीं और वर्तमान मकान मालिक पवन कुमार पाठक के गोद लेने (दत्तक पुत्र) का मामला भी अभी कोर्ट में लंबित है, इसलिए उन्हें केस दायर करने का अधिकार नहीं है।
हाई कोर्ट ने मामले के दस्तावेजों और गवाहों का अध्ययन करने के बाद पाया कि मूल मकान मालिक हीरालाल पाठक और उनकी पत्नी केसर देवी के निधन के बाद पवन कुमार पाठक ही उनके विधिक दत्तक पुत्र हैं। कोर्ट ने माना कि लिखित रेंट एग्रीमेंट और पूर्व में जारी किराए की रसीदें यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि दोनों के बीच किराएदार और मकान मालिक का संबंध रहा है।
वहीं दूसरी ओर इंदौर शहर में हाइकोर्ट की खंडपीठ ने एक अहम फैसला सुनाया। धार्मिक पहचान छिपाकर विवाह करने और उसके बाद धर्म परिवर्तन की हिंसा के मामले में फैसला आ गया है। कोर्ट ने पीड़िता उसकी नाबालिग पुत्री को 20 हजार रुपए प्रतिमाह भरण पोषण देने का आदेश दिया है। अपने आदेश में जस्टिस गजेंद्र सिंह की कोर्ट ने कहा, यदि किसी महिला से धार्मिक पहचान छिपाकर विवाह किया गया हो और उससे संतान भी उत्पन्न हुई हो तो केवल विवाह की वैधता के आधार पर उसे भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता।