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FIR दर्ज होने पर निरस्त नहीं हो सकता ‘बंदूक लाइसेंस’, ग्वालियर हाइकोर्ट का आदेश

High Court Order: प्रशासन के इन फैसलों को याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी दी थी। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की और से पैरवी करते के हुए सरकारी वकील ने प्रशासन फैसले का बचाव किया।
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High Court Order:ग्वालियर हाइकोर्ट का आदेश (Photo Source - Patrika)

High Court Order:ग्वालियर हाइकोर्ट का आदेश (Photo Source - Patrika)

Gwalior High Court Order: मध्यप्रदेश में ग्वालियर हाईकोर्ट ने हथियार लाइसेंस निरस्त करने के मामलों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि केवल किसी आपराधिक मामले में नामजद होने मात्र से किसी भी व्यक्ति का आर्म्स लाइसेंस रद्द या निलंबित नहीं किया जा सकता है। याचिकाकर्ता अनीस हुसैन के पास एक 315 बोर बंदूक का लाइसेंस था। वर्ष 2022 में उनके खिलाफ पड़ाव थाने में धारा 307 सहित अन्य गंभीर धाराओं के तहत एक एफआइआर दर्ज की गई थी।

इस एफआइआर के आधार पर जिला मजिस्ट्रेट, ग्वालियर ने बिना किसी कारण बताओ नोटिस या सुनवाई का अवसर दिए, 2 फरवरी 2022 को उनका हथियार लाइसेंस रद्द कर दिया था। इसके खिलाफ जब कमिश्नर ग्वालियर संभाग के पास अपील की गई, तो उन्होंने भी 12 मई 2023 को जिला मजिस्ट्रेट के आदेश की पुष्टि करते हुए अपील को खारिज कर दिया था।

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में दी चुनौती

प्रशासन के इन फैसलों को याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी दी थी। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की और से पैरवी करते के हुए सरकारी वकील ने प्रशासन फैसले का बचाव किया। उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ गंभीर धाराओं में आपराधिक मामला दर्ज हुआ था। ऐसी स्थिति में इस बात की पूरी आशंका थी कि वह अपने लाइसेंसी हथियार का दुरुपयोग कर सकता है, जिससे सार्वजनिक शांति और सुरक्षा को खतरा पैदा हो सकता था। इसलिए लोकहित में लाइसेंस रद्द करने की कार्रवाई बिल्कुल सही थी।

सुनाया गया फैसला

कोर्ट ने आर्म्स एक्ट, 1959 की धारा 17(3) का विस्तृत उल्लेख करते हुए कहा कि कानून में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि सिर्फ एफआइआर दर्ज होने से लाइसेंस स्वतः ही रद्द माना जाएगा। जिस एफआइआर को आधार बनाकर यह पूरी कार्रवाई की गई थी, उसे हाईकोर्ट पहले ही 11 मई 2023 को एक अन्य मामले में पूरी तरह से खारिज कर चुका था। यानी जब कमिश्नर ने अपील पर फैसला सुनाया, तब याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई मामला ही अस्तित्व में नहीं था।

नहीं होगा मालिकाना हक

एक अन्य मामले में हाइकोर्ट ने फैसला सुनाया कि मकान मालिक और किराएदार के विवाद से जुड़े एक अहम मामले में एमपी के ग्वालियर हाईकोर्ट की सिंगल बैच ने निचली अदालतों के फैसले को सही ठहराते हुए किराएदार की अपील खारिज कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बेदखली के मामले में किराएदार को मकान मालिक के स्वामित्व की गहराई से जांच कराने का कोई विधिक अधिकार नहीं है। इसके साथ ही न्यायालय ने किराएदार के मालिकाना हक (प्रतिकूल कब्जे) के दावे को भी सिरे से खारिज कर दिया।