100 crore temple land case: ग्वालियर के जगनापुरा की मंदिर की 10.10 बीघा जमीन पर हाईकोर्ट ने सरकार की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि फैसला बदलने का कोई आधार नहीं। (MP News)
MP News: मध्य प्रदेश ग्वालियर के जगनापुरा स्थित 100 करोड़ से अधिक की मंदिर की 10.10 बीघा जमीन राज्य शासन हार गया है। हाईकोर्ट की एकल पीठ ने उसकी पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। राज्य शासन ने हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एनके मोदी के पक्ष में हुए फैसले पर पुनर्विचार की मांग की थी। कोर्ट ने कहा कि राज्य शासन व सरकारी अधिवक्ता ने समीक्षा का कोई ऐसा आधार नहीं बताया, जिसके आधार पर आदेश वापस लिया जा सके। इसलिए इस न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश की समीक्षा करने का कोई कारण नहीं दिखता। याचिका की सुनवाई मिलिंद रमेश फड़के ने की। (100 crore temple land case)
कोर्ट ने कहा कि अभिलेख में कोई त्रुटि नहीं दिखाई देती है। शासन ने तर्क दिया है कि रिट न्यायालय के समक्ष उत्तर दाखिल करने का कोई अवसर दिए बिना ही आदेश दिया गया, जो अवैध है। कोर्ट ने कहा कि अंतिम आदेश पारित करते समय राज्य की ओर से उपस्थित सरकारी अधिवक्ता ने दलीलों का जोरदार तरीके से उत्तर दिया था, जो आदेश से ही स्पष्ट है। उन्होंने उत्तर दाखिल करने के लिए समय नहीं मांगा था, जो यह दर्शाता है कि उस समय राज्य को उत्तर दाखिल करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। अब, जब कुछ निष्कर्ष दिए गए हैं व राज्य को निर्देश जारी किए गए हैं, तो राज्य के पास पहले से उपलब्ध तथ्य को इस समीक्षा के माध्यम से अभिलेख पर लाने का प्रयास किया जा रहा है। इस आड़ में कि उत्तर दाखिल करने का कोई अवसर नहीं दिया गया, जो अस्वीकार्य है। इसलिए आक्षेपित आदेश में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। पुनर्विचार याचिका में राज्य शासन का पत्र शासकीय अधिवक्ता साकेत उदैनिया ने रखा।
जगनापुरा के सर्वे क्रमांक 183, 187, 402 से 407, 402, 404, 400,503, 524 की भूमि रामजानकी राधाकृष्ण मंदिर के नाम से थी। बाद में यह जमीन निजी लोगों के नाम हो गई। इसको लेकर तत्कालीन संभागायुक्त दीपक सिंह ने कलेक्टर को पत्र लिखा। जमीन को फिर से माफी औकाफ यानी मंदिर के नाम करने का आदेश दिया, लेकिन दीपक सिंह के आदेश को सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जज एनके मोदी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने दीपक सिंह का आदेश निरस्त कर दिया। इस याचिका की जब सुनवाई की गई थी, शासकीय अधिवक्ता ने जवाब पेश करने के लिए समय नहीं मांगा। इस कारण आदेश शासन को बिना सुने हो गया। शासन ने अपने पक्ष रखने के लिए पुनर्विचार याचिका दायर की, जिसमें पुराना रिकॉर्ड दायर किया।